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तीसरी कसम और चीफ़ की दावत (रेणु, भीष्म साहनी): सारांश, पात्र, शिल्प और DU परीक्षा-नोट्स | DU BA Hindi Hons DSC-3 Unit 2

Contents

पाठ्यक्रम: BA (Hons.) Hindi, Semester 1 · DSC-3 “हिन्दी कहानी” · Unit 2 · University of Delhi

अगर आप DU के BA (Hons.) Hindi के पहले सेमेस्टर में DSC-3 “हिन्दी कहानी” पढ़ रहे हैं, तो Unit 2 में आपके सामने दो कहानियाँ हैं: फणीश्वरनाथ रेणु की ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ और भीष्म साहनी की ‘चीफ़ की दावत’। दोनों स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी की दो बिल्कुल अलग दिशाएँ हैं। एक तरफ़ बैलगाड़ी, मेला, नौटंकी और लोकगीत की खुली दुनिया है; दूसरी तरफ़ शहर के एक घर की बंद, बनावटी शाम।

दोनों कहानियाँ पाँच-पाँच पंक्तियों में:

  • तीसरी कसम: हीरामन चालीस साल का गाड़ीवान है। चोरबाज़ारी के माल और बाँस की लदनी के बाद वह दो कसमें खा चुका है। चंपानगर के मेले से वह नौटंकी की अभिनेत्री हीराबाई को फारबिसगंज मेले तक ले जाता है। रास्ते के गीतों, कथाओं और सम्मान-भरे व्यवहार से दोनों के बीच एक अनकहा, निश्छल रिश्ता बनता है। हीराबाई लौट जाती है और कहानी के अंत में हीरामन के होंठ तीसरी कसम की तरफ़ हिलते दिखाई देते हैं।
  • चीफ़ की दावत: मिस्टर शामनाथ अपने अमरीकी चीफ़ को घर पर दावत देते हैं ताकि तरक़्क़ी का रास्ता खुले। सबसे बड़ी अड़चन उनकी बूढ़ी माँ हैं, जिन्हें वे बरामदे में बिठाकर “सलीक़े” सिखाते हैं। दावत में माँ खर्राटे लेती पकड़ी जाती हैं, पर चीफ़ को गाँव, लोकगीत और फुलकारी में रुचि निकल आती है। रात को शामनाथ माँ को गले लगाते हैं, लेकिन तब भी उनकी नज़र अपनी तरक़्क़ी पर ही टिकी है।

ध्यान दीजिए: ये नोट्स पढ़ने के बाद एक बार मूल कहानी ज़रूर पढ़िए। DU की परीक्षा में पाठ के ब्योरे (नाम, स्थान, प्रसंग) पर ही अंक मिलते हैं, और बहुत-से गाइड/नोट्स में कहानी के ब्योरे गड़बड़ मिलते हैं।

इस यूनिट में क्या पढ़ें | What You Will Learn

क्रमविषयइस लेख में कहाँ
1नई कहानी और स्वातंत्र्योत्तर कहानी की प्रवृत्तियाँखंड 1
2रेणु और भीष्म साहनी: जीवन और रचनाएँखंड 2
3दोनों कहानियों का परिचयखंड 3
4कथानक, पात्र-चरित्र, आंचलिकता / सामाजिक यथार्थ, केंद्रीय संवेदना और शीर्षक की सार्थकताखंड 4
5भाषा, संवाद, कथा-शिल्प, वातावरण और तुलनात्मक अध्ययनखंड 5
6हिन्दी कहानी में रेणु और साहनी का योगदानखंड 6
7त्वरित सारांश (English)खंड 7
8DU-pattern प्रश्न, उत्तर लिखने की रूपरेखा और FAQsखंड 8
9संदर्भ ग्रंथखंड 9

1. पृष्ठभूमि | Background

नयी कहानी का संदर्भ | Context of Nayi Kahani

स्वतंत्रता के बाद हिन्दी कहानी एक नए मोड़ पर आ गई। अब कहानी का केंद्र गाँव का पंच या कोई बड़ा आदर्श नहीं रहा; वह शहर के अकेले, बेचैन आदमी की तरफ़ मुड़ने लगी। इसी मोड़ को हम नई कहानी (Nayi Kahani) आंदोलन कहते हैं। ध्यान दीजिए, यह किसी एक दिन में शुरू नहीं हुई।

समय और कारण। नई कहानी की शुरुआत के बारे में आलोचकों और पाठ्य-सामग्री में थोड़ा मतभेद मिलता है। आम तौर पर इसका आरंभ 1956 से माना जाता है, जब भैरव प्रसाद गुप्त के संपादन में ‘नई कहानी’ विशेषांक निकला; कुछ सामग्री इसकी चर्चा 1954-55 के आसपास से शुरू होती बताती है। परीक्षा में आप सुरक्षित ढंग से लिख सकते हैं: “1950 के दशक के मध्य से, विशेष रूप से 1956 के बाद।”

कारण साफ़ थे। आज़ादी के बाद लोगों को लगा कि जो सपने देखे थे वे पूरे नहीं हुए, यानी मोहभंग हुआ। गाँव से शहरों की तरफ़ पलायन बढ़ा। प्रगतिवाद का नारा पुराना पड़ने लगा। अब लेखक को लगा कि कहानी को नारे से नहीं, व्यक्ति के भीतर के सच से जुड़ना चाहिए।

सूत्रधार कौन थे? यह नाम परीक्षा के लिए याद रखिए: मोहन राकेश, राजेन्द्र यादव और कमलेश्वर, जिन्हें नई कहानी की त्रयी कहा जाता है। इनके साथ निर्मल वर्मा, कृष्णा सोबती, मन्नू भंडारी, अमरकांत और भीष्म साहनी जैसे कथाकार भी इसी दौर से जुड़े माने जाते हैं। कमलेश्वर ने ‘नई कहानियाँ’ पत्रिका के संपादन (भैरव प्रसाद गुप्त के बाद) और बाद में ‘सारिका’ के ज़रिए इस धारा को आगे बढ़ाया। इस विषय पर पढ़ने के लिए DU के संदर्भ-ग्रंथों में नामवर सिंह की कहानी: नई कहानी, कमलेश्वर की नई कहानी की भूमिका और राजेन्द्र यादव की एक दुनिया समानांतर शामिल हैं (देखें खंड 9)।

इनका ज़ोर इस पर था कि कहानी में अब घटना (Event) से ज़्यादा अनुभूति (Experience) और संवेदना (Sensibility) महत्त्वपूर्ण है।

मुख्य विशेषताएँ

  • व्यक्ति-केंद्रितता: समाज की बड़ी बातों की जगह अकेले व्यक्ति का अकेलापन और संबंधों का बिखराव।
  • शिल्प में बदलाव: सीधे-सपाट वर्णन की जगह संकेत (Symbol), बिंब (Image) और मनोविश्लेषण (Psychoanalysis) का प्रयोग।
  • शहरी मध्यम वर्ग: गाँव की जगह शहर, दफ़्तर और घर के ड्रॉइंग-रूम की कहानियाँ।

आपके सिलेबस की दोनों कहानियाँ इसी पृष्ठभूमि से जुड़ती हैं। रेणु की ‘तीसरी कसम’ आंचलिक कहानी का सबसे जाना-पहचाना उदाहरण है, फिर भी उसकी संवेदना (अनकहा प्रेम, हाशिए के पात्रों की गरिमा) कई आलोचकों को नई कहानी के दौर से जोड़ती है। भीष्म साहनी की ‘चीफ़ की दावत’ नई कहानी की शहरी, मध्यवर्गीय संवेदना का क्लासिक उदाहरण मानी जाती है।

Exam Point: “नई कहानी का आरंभ” पूछे जाने पर 1956 (भैरव प्रसाद गुप्त का विशेषांक), तीन प्रमुख नाम (राकेश, यादव, कमलेश्वर) और तीन विशेषताएँ (व्यक्ति-केंद्रितता, संकेत-बिंब वाला शिल्प, शहरी मध्यम वर्ग) लिख दीजिए।

स्वातंत्र्योत्तर कहानी की प्रवृत्तियाँ | Trends in Post-Independence Kahani

1947 के बाद हिन्दी कहानी बहुत तेज़ी से बदली। अब एक ही धारा नहीं रही, कई धाराएँ एक साथ बहने लगीं। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि नई कहानी के बाद कौन-कौन सी प्रवृत्तियाँ आईं। इन्हें टेबल से समझना आसान रहेगा।

प्रवृत्तिसमय (मोटे तौर पर)मुख्य बातप्रमुख लेखक / उदाहरण
आंचलिक कहानी (Aanchalik Kahani)1950 का दशकगाँव-अंचल की मिट्टी, बोली, लोकगीत और स्थानीय रंगफणीश्वरनाथ रेणु: तीसरी कसम, पंचलाइट, लाल पान की बेगम
नई कहानी (Nayi Kahani)1950 के मध्य से 1960 के आसपासशहरी व्यक्ति, संबंधों का तनाव, अकेलापन, अनुभव की प्रामाणिकतामोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, कमलेश्वर, निर्मल वर्मा; भीष्म साहनी: चीफ़ की दावत
अकहानी (Akahani)1960 का दशकनई कहानी के विरोध में उभरी; फ़्रांस के ‘एंटी-स्टोरी’ आंदोलन से प्रभावित; अजनबीपन, निरर्थकता-बोध और परंपरा का नकारदूधनाथ सिंह (रीछ), रवींद्र कालिया (नौ साल छोटी पत्नी), गंगा प्रसाद विमल, ज्ञानरंजन
सचेतन कहानी (Sachetan Kahani)1960 के दशक का मध्यजीवन के प्रति सजग, सकारात्मक दृष्टिमहीप सिंह के साथ जोड़ी जाती है (तिथि पर स्रोतों में एकरूपता नहीं)
समांतर कहानी (Samantar Kahani)1970 के दशक का आरंभआम आदमी का जीवन-संघर्ष; सामंती, पूँजीवादी और सांप्रदायिक शक्तियों की पोलकमलेश्वर (‘सारिका’ के माध्यम से), कामतानाथ, इब्राहीम शरीफ़
जनवादी कहानी1970-80 का दौरसर्वहारा के शोषण का विरोधअसगर वजाहत जैसे कथाकार
आंचलिक, नई कहानी, अकहानी, सचेतन, समांतर और जनवादी कहानी की टाइमलाइन
कहानी-आंदोलनों का क्रम (मोटे तौर पर)

सावधानी: कई गाइडों में निर्मल वर्मा को अकहानी के साथ जोड़ दिया जाता है। आलोचना में निर्मल वर्मा और उनकी ‘परिंदे’ नई कहानी के दौर की रचना मानी जाती है, इसलिए हमने उन्हें नई कहानी की पंक्ति में रखा है।

अब देखिए, इनमें दो प्रवृत्तियाँ आपके लिए सबसे ज़्यादा ज़रूरी हैं।

1. आंचलिकता (Regionalism)। रेणु इसके सबसे बड़े नाम हैं। आंचलिकता का मतलब केवल गाँव का वर्णन नहीं है। इसका मतलब है कि पात्र अपनी मिट्टी से, अपनी बोली से पहचाना जाए। हीरामन गाड़ीवान और हीराबाई नर्तकी पूर्णिया-फारबिसगंज अंचल की बोली, लोकगीत (Folk Song) और मेले-नौटंकी की दुनिया के बिना अधूरे हैं। (ध्यान दें: रेणु का अंचल पूर्णिया-कोसी का इलाक़ा है। कुछ नोट्स में इसे “आरा-छपरा की बोली” कह दिया जाता है, जो ग़लत है; आरा-छपरा भोजपुरी पट्टी में पड़ते हैं।)

2. नई कहानी की शहरी संवेदना। भीष्म साहनी जैसे लेखकों ने मध्यम वर्ग (Middle Class) के पाखंड को दिखाया। ‘चीफ़ की दावत’ में शामनाथ अपनी माँ को चीफ़ की नज़र से बचाना चाहता है, क्योंकि उसे लगता है कि माँ उसकी “आधुनिक” दावत में फ़िट नहीं बैठती। यह पीढ़ी-अंतराल (Generation Gap) और दिखावे की संस्कृति नई कहानी की बड़ी पहचानों में से एक है।

तो याद रखिए, स्वातंत्र्योत्तर कहानी एक से अनेक की यात्रा है। वह अब केवल आदर्श या यथार्थ की कहानी नहीं रही; व्यक्ति, अंचल और आगे चलकर स्त्री और दलित अनुभव (आपकी चौथी इकाई में ओमप्रकाश वाल्मीकि की कहानी इसी का उदाहरण है) भी कहानी का विषय बने।

Quick Summary (English): Nayi Kahani is generally dated from 1956 (Bhairav Prasad Gupta’s special issue), though some sources point to 1954-55. Led by Mohan Rakesh, Rajendra Yadav and Kamleshwar, it shifted focus from social slogans to individual alienation and the urban middle class. Parallel and later trends include Aanchalik Kahani (Renu), Akahani, Sachetan, Samantar and Janvadi stories.


2. कहानीकार परिचय | Introduction to the Authors

रेणु: जीवन और व्यक्तित्व | Renu: Life and Personality

फणीश्वरनाथ रेणु को समझे बिना आंचलिकता समझ में नहीं आएगी। ये ऐसे लेखक हैं जो गाँव को बाहर से नहीं, भीतर से देखते हैं।

बिंदुविवरण
जन्म4 मार्च 1921, औराही हिंगना गाँव, तत्कालीन पूर्णिया ज़िला, बिहार (आज यह इलाक़ा अररिया ज़िले में पड़ता है)
पिताशिलानाथ मंडल, कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता
निधन11 अप्रैल 1977, पटना
प्रमुख आंदोलनभारत छोड़ो आंदोलन, नेपाल में राणाशाही-विरोधी आंदोलन, समाजवादी आंदोलन, जयप्रकाश नारायण का आंदोलन
पहली कहानी‘बट बाबा’ (27 अगस्त 1944 को प्रकाशित)
पहला उपन्यासमैला आँचल (1954)

जन्म और परिवार। रेणु का जन्म औराही हिंगना गाँव में हुआ। पिता कांग्रेस के सक्रिय कार्यकर्ता थे, इसलिए राजनीति और समाज-सेवा का माहौल घर से ही मिला। ग्रामीण जीवन उन्होंने बहुत क़रीब से देखा।

जीवन-संघर्ष। रेणु केवल कलम वाले लेखक नहीं थे। भारत छोड़ो आंदोलन में हिस्सा लेने के लिए उन्होंने पढ़ाई बीच में छोड़ दी। नेपाल में राणाशाही के ख़िलाफ़ आंदोलन में उन्होंने कोइराला परिवार के पक्ष का साथ दिया और इसी विषय पर रिपोर्ताज ‘नेपाली क्रांति कथा’ लिखा। वे समाजवादी आंदोलन से जुड़े और बाद में जयप्रकाश नारायण के आंदोलन के समर्थन में उन्होंने भारत सरकार से मिला पद्मश्री सम्मान लौटा दिया। यही कारण है कि उनके लेखन में केवल गाँव का रोमांस नहीं, गाँव का दर्द और राजनीति भी है। गाँव से उनका रिश्ता इतना गहरा था कि उन्होंने स्वयं एक जगह लिखा कि वे हर दूसरे-तीसरे महीने शहर से भागकर गाँव चले जाते हैं।

व्यक्तित्व। रेणु संवेदनशील, खुले स्वभाव के और लोक-संस्कृति के प्रेमी थे। लोकगीत, लोकनृत्य और बोली-बानी से उन्हें गहरा लगाव था। अपने अंचल की बोलियों के साथ-साथ बंगला और नेपाली परिवेश से भी उनका परिचय रहा, पर लेखन में उन्होंने अपने पूर्णिया-कोसी अंचल की बोली-बानी को ही सबसे ज़्यादा जगह दी।

रेणु की रचनाएँ | Works of Renu

परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि रेणु की पहली रचना कौन-सी है। कहानी के हिसाब से उनकी पहली प्रकाशित कहानी ‘बट बाबा’ (1944) बताई जाती है; उपन्यास के हिसाब से ‘मैला आँचल’ (1954)। उनका फलक बहुत बड़ा नहीं, पर बहुत गहरा है।

1. उपन्यास (Novels)

  • मैला आँचल (1954): मेरीगंज गाँव की कहानी। रेणु ने इसे “आंचलिक उपन्यास” कहा और आम तौर पर इसे हिन्दी का पहला सफल/प्रतिनिधि आंचलिक उपन्यास माना जाता है। (यह कथन थोड़ा विवादित है; देखें खंड 6।)
  • परती परिकथा (1957)
  • दीर्घतपा (1963)
  • जुलूस (1965)
  • कितने चौराहे (1966)
  • अन्य: कलंक-मुक्ति, पल्टू बाबू रोड

2. कहानी-संग्रह (Story Collections)

  • ठुमरी (1959): आपके सिलेबस की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ इसी संग्रह में संकलित है। इसी संग्रह में रसप्रिया, ठेस, पंचलाइट, लाल पान की बेगम जैसी कहानियाँ भी हैं।
  • आदिम रात्रि की महक (1967)
  • अग्निखोर, एक श्रावणी दोपहरी की धूप, अच्छे आदमी
  • प्रसिद्ध कहानियाँ: मारे गए गुलफ़ाम, पंचलाइट, संवदिया, लाल पान की बेगम, ठेस, तबे एकला चलो रे

रेणु की भाषा ही उनकी सबसे बड़ी रचना है। उन्होंने कथा-भाषा में लोकगीत, लोकधुन, मुहावरे और बोली की रंगत को पूरे साहित्यिक आत्मविश्वास के साथ जगह दी। इसी कारण उन्हें आंचलिकता का सबसे बड़ा कथाकार कहा जाता है। (उन्हें “आंचलिकता का जनक” कहना पूरी तरह निर्विवाद नहीं है, क्योंकि आंचलिक प्रवृत्ति के बीज उनसे पहले भी मिलते हैं; आगे खंड 6 देखें।)

भीष्म साहनी: जीवन और व्यक्तित्व | Bhisham Sahni: Life and Personality

भीष्म साहनी का नाम आते ही दो चीज़ें याद आती हैं: विभाजन (Partition) का दर्द और मध्यम वर्ग (Middle Class) का पाखंड।

बिंदुविवरण
जन्म8 अगस्त 1915, रावलपिंडी (अब पाकिस्तान)
निधन11 जुलाई 2003, दिल्ली
परिवारबड़े भाई प्रसिद्ध अभिनेता बलराज साहनी
शिक्षागवर्नमेंट कॉलेज, लाहौर से अंग्रेज़ी में एम.ए. (1937)
कार्यइप्टा (IPTA) से जुड़ाव; दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में अंग्रेज़ी के प्राध्यापक; मास्को में रहकर रूसी पुस्तकों का अनुवाद
प्रमुख सम्मान‘तमस’ पर साहित्य अकादमी पुरस्कार (1975)

जन्म और परिवार। भीष्म साहनी का जन्म रावलपिंडी में हुआ। बड़े भाई बलराज साहनी जाने-माने अभिनेता थे। विभाजन का दर्द उन्होंने ख़ुद झेला, यानी अपना शहर-घर छोड़कर भारत आना पड़ा। इसीलिए उनकी रचनाओं में विस्थापन और मानवीयता का भाव बहुत गहरा है।

शिक्षा और कार्य। उन्होंने लाहौर से अंग्रेज़ी में एम.ए. किया। वे प्रगतिशील लेखक संघ और इप्टा की दुनिया से जुड़े रहे, बाद में दिल्ली विश्वविद्यालय के ज़ाकिर हुसैन कॉलेज में पढ़ाया, और मास्को प्रवास के दौरान रूसी साहित्य का अनुवाद किया। इसी दौर और अनुभव का ब्योरा उनकी आत्मकथा ‘आज के अतीत’ में मिलता है।

व्यक्तित्व। बिल्कुल सादा, गंभीर और बेहद मानवीय। वे प्रगतिशील (Progressive) विचारधारा के थे, पर नारे से ज़्यादा मनुष्य में विश्वास करते थे। साम्प्रदायिक सौहार्द उनके लेखन का स्थायी स्वर है; उनका उपन्यास ‘तमस’ इसी का प्रमाण है।

परीक्षा में यह बिंदु अक्सर पूछा जाता है: भीष्म साहनी को नई कहानी के दौर का प्रमुख कथाकार माना जाता है, पर उनकी कहानियों में प्रगतिशील सामाजिक दृष्टि और नई कहानी की संवेदना का मेल दिखता है। (कुछ आलोचक उन्हें नई कहानी की मुख्य त्रयी से अलग, प्रगतिशील-यथार्थवादी धारा के क़रीब रखते हैं। उत्तर में “कई आलोचक” कहकर यह संकेत दे सकते हैं।)

भीष्म साहनी की रचनाएँ | Works of Bhisham Sahni

भीष्म साहनी ने उपन्यास, कहानी, नाटक और आत्मकथा, लगभग हर विधा में लिखा। पर वे मूलतः कहानीकार के रूप में याद किए जाते हैं।

1. उपन्यास (Novels)

  • झरोखे (1967)
  • कड़ियाँ
  • तमस (1974 में रचित/प्रकाशित): बँटवारे पर हिन्दी का सबसे चर्चित उपन्यास; इस पर 1975 में साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला।
  • बसंती (1980)
  • मय्यादास की माड़ी, कुंतो, नीलू नीलिमा नीलोफ़र

2. कहानी-संग्रह (Story Collections)

संग्रहवर्षटिप्पणी
भाग्यरेखा1953पहला कहानी-संग्रह माना जाता है
पहला पाठ1957‘चीफ़ की दावत’ इसी संग्रह में संकलित है
भटकती राख1966
पटरियाँ1973
वाङ्चू1978
शोभायात्रा, निशाचर, पाली, डायनबाद के संग्रह

अन्य प्रसिद्ध कहानियाँ: अमृतसर आ गया है, ओ हरामज़ादे, वाङ्चू, शोभायात्रा, पटरियाँ।

सावधानी: कई नोट्स ‘चीफ़ की दावत’ को ‘पटरियाँ (1973)’ संग्रह में बताते हैं। प्रकाशक की जानकारी और बहुत-से स्रोत इसे ‘पहला पाठ’ (1957) में रखते हैं, इसलिए परीक्षा में ‘पहला पाठ’ ही लिखिए। कहानी का रचना-काल 1956 बताया जाता है।

3. नाटक (Plays): हानूश (1977), कबिरा खड़ा बाज़ार में (1981), माधवी, मुआवज़े।

4. आत्मकथा: ‘आज के अतीत’।

भीष्म साहनी की भाषा सहज, व्यंग्यात्मक (Satirical) और शहरी मध्यम वर्ग की पोल खोलने वाली है। ‘चीफ़ की दावत’ में वे बिना किसी भारी शब्द के दिखावे की संस्कृति पर चोट करते हैं।

Quick Summary (English): Renu (1921-1977), from the Purnia region of Bihar, took part in the Quit India and Nepal movements and the socialist movement; his first novel Maila Aanchal (1954) and the collection Thumri (1959, containing Teesri Kasam) made him the best-known Aanchalik writer. Bhisham Sahni (1915-2003), born in Rawalpindi, brother of Balraj Sahni and a DU professor, witnessed Partition and won the Sahitya Akademi Award for Tamas; Chief Ki Dawat appears in his collection Pahla Path (1957).


3. पाठ परिचय | Introduction to the Prescribed Texts

तीसरी कसम: परिचय | Teesri Kasam: Introduction

इस कहानी का पूरा शीर्षक है ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’। आपको यह शीर्षक कई संस्करणों में उलटे क्रम (‘मारे गए गुलफ़ाम उर्फ़ तीसरी कसम’) में भी मिलेगा। परीक्षा में पूरा नाम लिखेंगे तो प्रस्तुति बेहतर लगेगी।

प्रकाशन और पृष्ठभूमि। यह कहानी रेणु के कहानी-संग्रह ‘ठुमरी’ (1959) में संकलित है। कहानी के रचना-काल और पहले प्रकाशन के वर्ष को लेकर स्रोतों में एकमत नहीं है: कहीं 1954, कहीं 1956 और कहीं 1957 में पहली बार छपना बताया जाता है। सुरक्षित उत्तर यह है: “1950 के दशक के मध्य की रचना, जो 1959 में ‘ठुमरी’ संग्रह में संकलित हुई।” संग्रह के नाम से रेणु की लोक-संगीत में रुचि का संकेत मिलता है (यह व्याख्या है, लेखक का कथन नहीं)। यह आंचलिक कहानी (Aanchalik Kahani) का सबसे जाना-पहचाना उदाहरण है। कहानी का भूगोल पूर्णिया-कोसी अंचल का है: चंपानगर और फारबिसगंज के मेले, नेपाल की सीमा (मोरंग) की तरफ़ जाते रास्ते, बैलगाड़ियाँ, नौटंकी का तंबू।

कहानी क्या है? हीरामन चालीस साल का गाड़ीवान है, बीस साल से बैलगाड़ी हाँक रहा है। बड़े भाई और भौजाई के साथ रहता है; बचपन में उसकी शादी हुई थी, पर गौने से पहले दुलहिन मर गई। हीरामन ने अपनी ज़िंदगी में दो कसमें खाई हैं: पहली, चोरबाज़ारी का माल गाड़ी पर नहीं लादेगा; दूसरी, बाँस की लदनी नहीं लादेगा।

मेला टूटने से पंद्रह दिन पहले आधी रात को उसे एक पर्दानशीं सवारी मिलती है। यह मथुरामोहन नौटंकी कंपनी में लैला बनने वाली अभिनेत्री हीराबाई है, जिसे चंपानगर के मेले से फारबिसगंज के मेले तक पहुँचना है। रास्ते में हीरामन उसे अपनी बोली के गीत और कथा ‘महुआ घटवारिन’ सुनाता है। हीराबाई उसे ‘मीता’, ‘उस्ताद’ और ‘गुरु जी’ कहने लगती है। फारबिसगंज के मेले में हीराबाई रौता संगीत कंपनी में काम करती है और हीरामन और उसके साथी गाड़ीवान उसकी नौटंकी देखते हैं। एक दिन हीराबाई रेलगाड़ी से लौट जाती है। हीरामन अकेला गाँव की ओर बैलगाड़ी मोड़ता है और कहानी के अंत में उसके होंठ हिलते हैं: “शायद वह तीसरी कसम खा रहा है।” यानी तीसरी कसम का पूरा वाक्य कहानी में लिखा नहीं गया; पाठक को उसे भरना पड़ता है।

यह कहानी केवल प्रेम-कहानी नहीं है; यह प्रेम की असफलता के बीच भी उसकी पवित्रता को बचाए रखने की कहानी है।

चीफ़ की दावत: परिचय | Chief Ki Daawat: Introduction

भीष्म साहनी की यह कहानी पढ़ते ही लगता है कि आप अपने ही किसी रिश्तेदार का घर देख रहे हैं। इसीलिए यह नई कहानी की सबसे चर्चित कहानियों में गिनी जाती है।

प्रकाशन। यह कहानी ‘पहला पाठ’ (1957) कहानी-संग्रह में संकलित है और इसका रचना-वर्ष 1956 बताया जाता है। इसकी पहली पत्रिका-प्रकाशन की जानकारी हम सत्यापित नहीं कर पाए, इसलिए उसे यहाँ नहीं दिया गया है। यह शहरी मध्यम वर्ग (Urban Middle Class) की कहानी है, जिसमें पंजाबी पारिवारिक परिवेश की झलक है (माँ का फुलकारी और टप्पे-जैसे गीत से जुड़ाव)।

पात्र और परिवेश। मुख्य पात्र है मिस्टर शामनाथ, जो अपने दफ़्तर के बड़े साहब (चीफ़) को घर पर दावत दे रहे हैं। चीफ़ अमरीकी है; कहानी उसका नाम नहीं बताती। शामनाथ की पत्नी, जिन्हें कहानी “श्रीमती” कहती है, तैयारियों में पूरी साझीदार हैं। घर में एक और सदस्य है: शामनाथ की बूढ़ी माँ।

समस्या क्या है? कहानी की शुरुआत ही इस सवाल से होती है: “माँ का क्या होगा?” शामनाथ और उनकी पत्नी आपस में यह बात अंग्रेज़ी में करते हैं, यानी माँ से छिपाकर, माँ के सामने। पत्नी सुझाव देती हैं कि माँ को रात भर के लिए पिछवाड़े उनकी सहेली के घर भेज दिया जाए। शामनाथ इसे नामंज़ूर करते हैं, क्योंकि वे नहीं चाहते कि उस घर में माँ का आना-जाना फिर शुरू हो, जिसे उन्होंने बड़ी मुश्किल से बंद कराया था। तय होता है कि माँ जल्दी खाना खाकर अपनी कोठरी के बाहर बरामदे में बैठी रहेंगी और बाद में ग़ुसलख़ाने के रास्ते अंदर चली जाएँगी। साथ में हिदायतें: कुर्सी पर ठीक से बैठना, नंगे पाँव या खड़ाऊँ पहनकर सामने न आना, सफ़ेद क़मीज़-सलवार पहनना।

परीक्षा के लिए केंद्रीय समस्या यह लिखिए: दिखावा (Show-off), तरक़्क़ी की भूख और पीढ़ी-अंतराल (Generation Gap)। शामनाथ बुरे बेटे के रूप में नहीं रचे गए; वे अपनी माँ के प्रति कठोर भी हैं और अपने ढंग से उनसे जुड़े भी हैं। फ़र्क यह है कि जहाँ माँ की उपयोगिता (फुलकारी, लोकगीत) चीफ़ को ख़ुश करने में काम आती है, वहाँ वे माँ को सँभालकर रखते हैं; जहाँ वह शर्मिंदगी का कारण बनती दिखती है, वहाँ वे उसे छिपाना चाहते हैं।

दावत के दौरान माँ बरामदे में कुर्सी पर बैठे-बैठे सो जाती हैं और खर्राटे लेने लगती हैं। मेहमान ठीक उसी समय वहाँ पहुँचते हैं। शामनाथ क्रोध और शर्म से भर उठते हैं। पर चीफ़ “पुअर डियर” कहकर बात सँभाल लेता है, उसे गाँव के लोग पसंद हैं, और वह माँ से गीत सुनाने को कहता है। माँ पंजाबी विवाह का पुराना गीत गाती हैं, तालियाँ बजती हैं, फिर चीफ़ पंजाब की दस्तकारी के बारे में पूछता है और उसकी रुचि फुलकारी में निकल आती है। शामनाथ वादा कर बैठते हैं कि माँ उसे नई फुलकारी बना देंगी।

कहानी का अंत सीधा सुखांत नहीं है। रात को माँ अपनी कोठरी में रोती हैं; आधी रात शामनाथ दरवाज़ा खटखटाकर उन्हें गले लगाते हैं (“तुमने तो आज रंग ला दिया”), और जब माँ हरिद्वार भेजे जाने की बात कहती हैं तो वे भड़क उठते हैं। अंत में माँ यह सुनकर कि बेटे की तरक़्क़ी इस फुलकारी पर टिकी है, कमज़ोर आँखों के बावजूद उसे बनाने को राज़ी हो जाती हैं। यह कहानी बिना किसी बड़े हादसे के, केवल एक बरामदे, एक कोठरी और एक दावत से आधुनिक समाज के खोखलेपन को उघाड़ देती है।

Quick Summary (English): Teesri Kasam (aka Mare Gaye Gulfam), collected in Thumri (1959), follows the middle-aged cart-driver Hiraman, who has already vowed never to carry black-market goods or bamboo, and who carries the nautanki actress Hirabai from the Champanagar fair to the Forbesganj fair; at the end he seems to be taking a third vow, left unspoken. Chief Ki Dawat, from Pahla Path (1957), shows Sham Nath planning a dinner for his American boss, treating his old mother as a problem to be managed; the Chief’s unexpected interest in village songs and phulkari ends with the mother agreeing to embroider one, for her son’s promotion.


4. कहानी विश्लेषण | Story Analysis

तीसरी कसम: कथानक | Teesri Kasam: Plot

रेणु की कहानियों का कथानक घटना से ज़्यादा यात्रा होता है। ‘तीसरी कसम’ का कथानक भी बैलगाड़ी की यात्रा जैसा है: धीमा, धूल-भरा, पर भीतर से संगीतमय।

कहानी की शुरुआत। कहानी हीरामन की “पीठ में गुदगुदी” से खुलती है। उसने बीस साल गाड़ी हाँकी है, पर ऐसी गुदगुदी पहले कभी नहीं लगी। यहीं से लेखक उसकी दो पुरानी कसमों की स्मृति में जाता है (फ़्लैशबैक):

  • पहली कसम (चोरबाज़ारी): “कंट्रोल के ज़माने” में हीरामन सीमा पार चोरबाज़ारी का माल (सीमेंट और कपड़े की गाँठें) ढोता रहा। पाँचवीं बार तराई में गाड़ी पकड़ी गई, जब उसमें एक महाजन का मुनीम छिपा हुआ था। दारोग़ा और मुनीम के बीच सौदेबाज़ी चल रही थी; इसी मौक़े पर हीरामन ने बैलों की रस्सियाँ खोलीं और रात भर बैलों के साथ जंगल में भागकर जान बचाई। गाड़ी वहीं छूट गई। होश में आने पर उसने कान पकड़कर कसम खाई कि अब ऐसी चीज़ों की लदनी नहीं लादेगा।
  • दूसरी कसम (बाँस की लदनी): बाँस लदी गाड़ी क़ाबू में नहीं रहती, क्योंकि उसका सिरा आगे-पीछे निकला रहता है। खरैहिया शहर में एक बार बाँस का ‘अगुआ’ पकड़े भाड़ेदार का नौकर लड़कियों के स्कूल की तरफ़ देखने लगा और मोड़ पर घोड़ागाड़ी से टक्कर हो गई। घोड़ागाड़ी वाले ने चाबुक से मारा और गालियाँ दीं। तब से हीरामन ने बाँस की ही नहीं, खरैहिया शहर की लदनी भी छोड़ दी।

इन दो कसमों से पता चलता है कि हीरामन “कमाने” से ज़्यादा “इज़्ज़त और जान” की क़ीमत पहचानता है, और यह भी कि दुनिया की चालाकियों से टकराकर वह हर बार थोड़ा और सँभला है।

मध्य भाग। चंपानगर के मेले में आधी रात को बक्सा ढोने वाला एक आदमी एक काली ओढ़नी में लिपटी औरत को हीरामन की गाड़ी में बिठाकर अँधेरे में ग़ायब हो जाता है। गाड़ी में चंपा के फूल जैसी महक फैल जाती है। हीरामन पहले उसे परी, फिर डाकिन-पिशाचिन समझकर चौंकता है; फिर चाँदनी में चेहरा देखकर कहता है: “ई तो परी है!” हीराबाई कहती है: “तब तो मीता कहूँगी, भैया नहीं। मेरा नाम भी हीरा है।” रास्ते की मुख्य घटनाएँ:

  1. दिन का पड़ाव (तेगछिया): हीरामन गाड़ी पर चादर का पर्दा डाल देता है ताकि कोई हीराबाई को न देख सके। कजरी नदी के किनारे तेगछिया में वह पास के गाँव से दही-चूड़ा-चीनी लाता है और दोनों साथ बैठकर खाते हैं।
  2. गीत-कथा: शाम को बेलीक सड़क पर हीरामन ‘सजन रे झूठ मति बोलो…’ गुनगुनाता है। हीराबाई उसकी अपनी बोली का गीत सुनना चाहती है, तब वह उसे ‘महुआ घटवारिन’ की लोककथा-गीत सुनाता है। यही प्रसंग दोनों को क़रीब लाता है।
  3. नननपुर और फारबिसगंज: नननपुर के हाट में हीरामन चाय लाता है; रात फारबिसगंज के मेले की रोशनी दिखती है।
  4. मेले में गाड़ीवानों का दल: अपने गाँव के लालमोहर, धुन्नीराम और पलटदास मिलते हैं। लोग “कंपनी की औरत” का नाम सुनकर चकित हैं और उसके बारे में तरह-तरह की बातें करते हैं। हीराबाई हीरामन को भाड़े के अलावा ‘दक्षिणा’ भी देती है और नौटंकी के पास भी दिलवाती है। हीरामन अपनी थैली उसके पास रख देता है।
  5. नौटंकी में मारपीट: नौटंकी के दौरान किसी ने हीराबाई को “रंडी” कहा तो हीरामन और उसके साथी भिड़ गए। दारोग़ा हंटर चलाता है, पर नौटंकी का मैनेजर “हीराबाई के आदमी” कहकर उन्हें छुड़ा देता है।
  6. दस दिन: दिन-भर भाड़ा ढोना, शाम को नगाड़ा सुनकर हीराबाई की पुकार याद करना: “भैया…मीता…हिरामन…उस्ताद गुरु जी!”

अंत। एक दिन लालमोहर से ख़बर मिलती है कि हीराबाई स्टेशन पर उसे ढूँढ़ रही है, वह जा रही है। स्टेशन पर वह हीरामन की थैली लौटाती है, कहती है कि वह फिर मथुरामोहन कंपनी में लौट रही है, “वनैली मेला आओगे न?”, और रुपए देकर कहती है कि एक गरम चादर ख़रीद लेना। हीरामन रुपए लेने से मना कर देता है। हीराबाई कहती है: “तुम्हारा जी बहुत छोटा हो गया है…महुआ घटवारिन को सौदागर ने ख़रीद जो लिया है, गुरु जी!” गाड़ी चली जाती है, प्लेटफ़ॉर्म ख़ाली हो जाता है, और हीरामन के लिए “दुनिया ही ख़ाली” हो जाती है। वह खाली टप्पर की तरफ़ उलटकर नहीं देख पाता; पीठ में आज भी गुदगुदी लगती है, चंपा का फूल उसकी गाड़ी में रह-रहकर खिल उठता है, और होंठ हिलते हैं, “शायद वह तीसरी क़सम खा रहा है।” कहानी उसी गीत की टूटी कड़ी पर समाप्त होती है।

तीसरी कसम में हीरामन की गाड़ी की यात्रा का रेखाचित्र
कहानी की यात्रा: चंपानगर से फारबिसगंज तक

Exam Point: तीसरी कसम का वाक्य (कंपनी की औरत की लदनी न लादने की प्रतिज्ञा) कहानी में खुला नहीं है; इसे ‘शायद’ और विराम-चिह्नों के साथ संकेतित किया गया है। उत्तर में लिखिए: “तीसरी कसम स्पष्ट घोषणा के बजाय संकेत में आती है, इससे कसम के पीछे का दर्द और गहरा हो जाता है।” (फ़िल्म में यह कसम खुलकर बोली गई है; कहानी और फ़िल्म को मत मिलाइए।)

ध्यान दीजिए: हीराबाई को “दूसरी कंपनी ने ख़रीद लिया” वाली बात कई नोट्स में लिखी मिलती है। पाठ में ऐसा नहीं है। वह मथुरामोहन कंपनी में लौटने की बात कहती है, और ‘सौदागर ने ख़रीद लिया’ महुआ घटवारिन के प्रसंग के सहारे कही गई एक सांकेतिक बात है।

तीसरी कसम: पात्र-चरित्र | Teesri Kasam: Characterization

इस कहानी में दो ही मुख्य पात्र हैं, पर दोनों हिन्दी कहानी के यादगार पात्र बन गए हैं।

1. हीरामन। वह पूर्णिया अंचल का चालीस वर्ष का, काला-कलूटा, हट्टा-कट्टा गाड़ीवान है, जिसकी दुनिया उसकी गाड़ी और उसके बैल हैं। परीक्षा में यह बिंदु ज़रूर लिखिए: हीरामन लोक-हृदय का प्रतीक है। वह भोला है, पर मूर्ख नहीं; दुनिया की चालाकी से टकराकर दो बार कसम खा चुका है। वह औरत को ‘माल’ नहीं, इंसान मानता है। उसकी ख़ासियतें:

  • संवेदनशीलता: बैलों से इस तरह बात करता है जैसे परिवार के सदस्यों से (“भैयन”)।
  • शालीनता: हीराबाई को ‘आप’ कहता है और रास्ते में दुनिया की निगाह से बचाने के लिए गाड़ी पर पर्दा डाल देता है।
  • भाभी का आदर और डर: बड़े भाई से बढ़कर भाभी की इज़्ज़त करता है और उससे डरता भी है। इसी वजह से “गाँव में बात न पहुँचे” इसकी चिंता भी उसे है।
  • गीत-प्रेम: छोकरा-नाच और विदेसिया की स्मृतियाँ उसके भीतर बसी हैं।

उसका प्रेम देह की कामना से अधिक रक्षा, श्रद्धा और सान्निध्य का है (निष्काम और निश्छल, Selfless and Innocent)। वह हीराबाई को नौटंकी की बदनामी से बचाना चाहता है। उसका चरित्र बाहरी खुरदुरेपन और भीतरी कोमलता का अद्भुत मेल है।

2. हीराबाई। वह मथुरामोहन नौटंकी कंपनी की प्रसिद्ध अभिनेत्री (लैला), मंच पर ‘मिस हीरादेवी’ और ‘गुलबदन’ की भूमिका में दिखने वाली कलाकार है। बाहर से मोहक और हँसमुख, भीतर से बँधी हुई, जिसकी इच्छा-स्वतंत्रता बाज़ार और समाज के हाथ में है। दुनिया उसे बुरी नज़र से देखती है (“कंपनी की औरत”)। हीरामन के सरल सम्मान में वह पहली बार ख़ुद को इंसान की तरह महसूस करती है। उसे गीत और कथा दोनों का शौक़ है; वह भाषा समझती है (“उबटन माने…जो देह में लगाते हैं”) और शास्त्र-पुराण की भी जानकार है। वह जानती है कि उसके और हीरामन के बीच कोई भविष्य नहीं; इसलिए चुपचाप जाने का फ़ैसला करती है और जाते-जाते हीरामन का हिसाब चुकाती है। उसका चरित्र बाज़ार में बिकती कला और स्त्री की पीड़ा का प्रतीक है।

चोरबाज़ारी, बाँस की लदनी और संकेतित तीसरी कसम का इन्फोग्राफ़िक
तीसरी कसम का वाक्य कहानी में अधूरा छोड़ा गया है

अन्य पात्र। लालमोहर, धुन्नीराम, पलटदास और लहसनवाँ आंचलिक वातावरण (Regional Atmosphere) को जीवंत बनाते हैं। लालमोहर ‘कचराही’ (कचहरी की) बोली बघारता है; धुन्नीराम शंकालु है; पलटदास वैष्णव कीर्तनिया है, जिसे हीराबाई में रामलीला की सिया सुकुमारी दिखती है; लहसनवाँ लालमोहर का सबसे छोटा नौकर है, जो अंत में नौटंकी कंपनी में ही जम जाता है। इन पात्रों के माध्यम से रेणु दिखाते हैं कि समाज एक साथ आकर्षित भी होता है और संदेह भी करता है। बक्सा ढोने वाला आदमी स्टेशन पर कोट-पतलून पहनकर “बाबू साहब” बन जाता है, जो हीराबाई के बदलते सामाजिक-बाज़ारी रिश्तों का संकेत है।

तीसरी कसम: आंचलिकता और लोक-जीवन | Teesri Kasam: Aanchalikta and Folk Life

अगर आपसे पूछा जाए कि ‘तीसरी कसम’ को आंचलिक कहानी क्यों कहते हैं, तो यह हिस्सा आपके उत्तर की जान होगा।

आंचलिकता का अर्थ केवल गाँव का वर्णन नहीं है। इसका अर्थ है कि कथा की आत्मा ही अंचल बन जाए। रेणु ने यही किया है।

1. भाषा और बोली। कहानी की भाषा पूर्णिया-फारबिसगंज अंचल की ग्रामीण बोली के रंग से भरी है। यहाँ तक कि कहानी में हीरामन की भाषा-समस्या भी दिखती है: बड़ों को ‘अहाँ’ (आप) कहकर संबोधित करने की उसकी बोली है, ‘कचराही बोली’ में दो-चार सवाल-जवाब चल सकते हैं, पर “दिल खोल गप तो गाँव की बोली में ही की जा सकती है।” साथ ही पात्र अपनी बोली के शब्द बोलते हैं: ‘इस्स!’, ‘धन्न है’, ‘लदनी’, ‘दुआली’, ‘बासा’, ‘टप्पर’।

2. लोकगीत और लोककथा। कहानी में अनेक लोक-रूप आते हैं: महुआ घटवारिन का गीत-कथा, विदेसिया नाच की सरस्वती-वंदना, छोकरा-नाच का ‘सजनवा बैरी हो गए हमारो’ गीत, ‘सजन रे झूठ मति बोलो, ख़ुदा के पास जाना है’ की गुनगुनाहट, तेगछिया गाँव के बच्चों की तुकबंदी ‘लाली-लाली डोलिया में लाली रे दुलहिनिया’, और नामलगर ड्योढ़ी का क़िस्सा। ये गीत सजावट नहीं हैं; ये पात्रों के मन की बात कहते हैं। विशेषकर ‘महुआ घटवारिन’ हीरामन और हीराबाई के संबंध को पढ़ने की कुंजी है, क्योंकि अंत में हीराबाई उसी के सहारे अपनी विवशता कहती है।

3. लोक-जीवन और लोक-संस्कृति (Folk Life and Folk Culture)। पूरी कहानी में बैलगाड़ी, चंपानगर और फारबिसगंज के मेले, गाड़ीवान-पट्टी का ‘बासा’, नौटंकी का कपड़घर (तंबू), ‘अठनिया दर्जा’, रेलवे स्टेशन का जीवंत चित्र है। हीरामन की गाड़ी में लगे रंगीन फुँदने, बैलों के गले के साज, सरकस कंपनी की बाघगाड़ी की पुरानी याद, ‘कंट्रोल के ज़माने’ की चोरबाज़ारी, आधीदारी जैसे श्रम-संबंध और गाड़ीवानों के विश्वास, टोने-टोटके और कसमें: सब कुछ कथा का हिस्सा हैं।

4. लोक-मानस। आंचलिकता केवल बाहर की नहीं, भीतर की भी है। ‘कंपनी की औरत’ के बारे में गाँव-समाज की शंका, भाभी से डर, “गाँव में बात पहुँचेगी तो बोली-ठोली कौन सुनेगा” जैसी चिंता, ये उस अंचल के लोगों का मनोविज्ञान (Psychology) हैं।

इसलिए यह कहानी केवल प्रेम-कहानी नहीं, कोसी-पूर्णिया अंचल के लोक-जीवन की जीवंत झाँकी है। रेणु की इसी कहानी पर 1966 में बासु भट्टाचार्य के निर्देशन और शैलेन्द्र के निर्माण में फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ बनी, जिसमें राज कपूर (हीरामन) और वहीदा रहमान (हीराबाई) ने अभिनय किया। पटकथा नबेंदु घोष ने लिखी और संवाद रेणु के थे।

तीसरी कसम: केंद्रीय संवेदना और शीर्षक | Teesri Kasam: Central Theme and Title

अब आते हैं कहानी की आत्मा पर। ऊपर से यह हीरामन और हीराबाई की अधूरी प्रेम-कहानी लगती है, पर भीतर से यह मानवीय संबंधों की पवित्रता और लोक-हृदय की चोट की कहानी है।

केंद्रीय संवेदना। हीरामन और हीराबाई दो अलग-अलग दुनियाओं से आते हैं: एक गाँव का गाड़ीवान, दूसरी नौटंकी की अभिनेत्री। समाज इन्हें एक-दूसरे के लिए अयोग्य ठहराता है। पर रेणु दिखाते हैं कि सम्मान और कोमलता के आधार पर भी एक पवित्र संबंध बन सकता है। हीरामन हीराबाई को वासना से नहीं, श्रद्धा से देखता है (“परी”, “देवी”)। इसीलिए जब हीराबाई चली जाती है तो हीरामन टूटकर बिखरता नहीं; वह चुपचाप अपने भीतर कसम और गीत की टूटी कड़ी के रूप में उस स्मृति को बसा लेता है। कहानी प्रेम की असफलता में भी उसकी गरिमा बचाए रखने की कहानी है।

शीर्षक की सार्थकता। शीर्षक ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ दोहरा है।

  • ‘मारे गए गुलफ़ाम’ एक गीत की “आधी कड़ी” है, जिसे नौटंकी में हीराबाई रोती हुई गाती है। हीरामन पूछता है, “कौन था यह गुलफ़ाम?”, और अंत में वही टूटी कड़ी गुनगुनाता लौटता है। (यह कथन कि ‘गुलफ़ाम’ हीराबाई का दूसरा नाम है, कई नोट्स में मिलता है, पर पाठ में ऐसा नहीं है; मंच पर उसकी भूमिका ‘गुलबदन’ की है।) कई पाठक हीरामन को ही कहानी का ‘गुलफ़ाम’ पढ़ते हैं, यानी वह जो प्रेम में “मारा गया”। यह व्याख्या है।
  • ‘तीसरी कसम’ कहानी का सार है। पहली दो कसमें बाहरी दुनिया की ठगी, ख़तरे और अपमान से जन्मीं; तीसरी कसम दिल के टूटने से। यह नफ़रत की कसम नहीं, अपने को फिर से आहत होने से बचाने की कसम है।

इसलिए शीर्षक पूरी तरह सार्थक है। यह केवल घटना नहीं, हीरामन के जीवन-अनुभव और जीवन-दर्शन (Life Philosophy) में आए बदलाव को दिखाता है। एक सूक्ष्म बात: तीसरी कसम का वाक्य अधूरा छोड़ देना शीर्षक को और भारी बना देता है, क्योंकि शीर्षक पाठक के सामने उस कसम को घोषित भी करता है और कहानी उसे खुलकर बोलती भी नहीं।

तीसरी कसम: महत्त्वपूर्ण प्रसंग | Key Scenes (संदर्भ–प्रसंग–व्याख्या)

(ये प्रसंग पाठ के आधार पर अपने शब्दों में लिखे गए हैं। परीक्षा में अपनी DU की प्रति से संबंधित पंक्ति उद्धृत करना बेहतर रहेगा।)

प्रसंग 1: तेगछिया पर दही-चूड़ा

  • संदर्भ: रेणु की कहानी ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’।
  • प्रसंग: दिन के पड़ाव पर हीरामन पास के गाँव से दही-चूड़ा-चीनी लाता है। हीराबाई कहती है कि वह तभी खाएगी जब हीरामन भी पत्तल बिछाकर साथ खाए।
  • व्याख्या: हीराबाई ने जीवन में “कंपनी की औरत” के रूप में बहुत-से रिश्ते देखे हैं; यहाँ पहली बार कोई उसकी देह से नहीं, उसकी ज़रूरत से सोचकर ख़िदमत कर रहा है। साथ खाना दोनों की बराबरी का संकेत है। हीरामन इसे “भगवती मैया भोग लगा रही हैं” की तरह देखता है, यानी श्रद्धा से।
  • विशेष: अंतरंगता घटना से नहीं, छोटे-छोटे व्यवहारों से बनती है; लोक-जीवन का सहज बिंब।

प्रसंग 2: महुआ घटवारिन का गीत

  • संदर्भ: वही कहानी, सफ़र की शाम।
  • प्रसंग: हीरामन लीक छोड़कर सुनसान रास्ते पर आता है और हीराबाई की माँग पर महुआ घटवारिन की कथा-गीत सुनाता है, जिसे सौतेली माँ ने सौदागर के हाथ बेच दिया।
  • व्याख्या: कथा में महुआ को ख़रीदा जाना और उसका नदी में कूदकर भागना हीराबाई के जीवन का दर्पण है। हीरामन गाते हुए ख़ुद को पीछा करने वाले सौदागर के नौकर की जगह रखकर महसूस करता है। अंत में हीराबाई इसी कथा को संकेत बनाकर अपने जाने की विवशता बताती है।
  • विशेष: लोककथा का प्रयोग कथा-रचना के भीतर ‘कथा-में-कथा’ और पूर्वसंकेत (Foreshadowing) के रूप में हुआ है।

प्रसंग 3: स्टेशन की विदाई

  • संदर्भ: कहानी का अंतिम भाग।
  • प्रसंग: हीराबाई थैली लौटाती है, रुपए देना चाहती है, हीरामन लेने से मना करता है, और ‘सौदागर ने ख़रीद जो लिया’ कहकर रेल में बैठ जाती है।
  • व्याख्या: दोनों के बीच जो संबंध जुड़ा, वह समाज और बाज़ार की जकड़न में टिक नहीं सकता। हीरामन की रुँधी हुई बोली “इस्स! हरदम रुपया-पैसा!” उसकी पीड़ा और आत्मसम्मान दोनों की अभिव्यक्ति है।
  • विशेष: ध्वनि (सीटी), दृश्य (बैंगनी साफ़ी हिलाना) और ख़ालीपन (ख़ाली प्लेटफ़ॉर्म, मालगाड़ी के डिब्बे) के बिंब से विदाई का दृश्य बहुत मार्मिक बन गया है।

तीसरी कसम: कठिन शब्दार्थ | Key Terms

शब्दअर्थ
गाड़ीवानबैलगाड़ी चलाने वाला
लदनीमाल लादने/ढुलाई का काम
चोरबाज़ारीकाला बाज़ार, तस्करी (कहानी में ‘कंट्रोल के ज़माने’ का संदर्भ)
आधीदारीबैल का मालिक और गाड़ीवान के बीच भाड़े का आधा-आधा बँटवारा
टप्परबैलगाड़ी के ऊपर का छाजन
बासापड़ाव/डेरा
दुआलीबैल हाँकने की छड़ी
कपड़घरनौटंकी का कपड़े का तंबू/रंगमंच
अठनिया दर्जाआठ आने का सबसे सस्ता दर्जा
कचराही बोलीकचहरी/शहरी ढंग की बोली
मीतामित्र जैसा आत्मीय संबोधन
छोकरा-नाचलोक-नाच, जिसमें किशोर लड़के स्त्री-वेश में नाचते-गाते थे
नौटंकीउत्तर भारत की लोक-रंगमंच परंपरा

कहानी और फ़िल्म: क्या अलग है | Story vs Film

कई विद्यार्थी फ़िल्म देखकर कहानी की तैयारी कर लेते हैं। बुरा विचार नहीं है, पर परीक्षा में मूल पाठ से ही लिखना है। दो अंतर याद रखिए: (1) कहानी में तीसरी कसम का वाक्य अधूरा छोड़ा गया है, जबकि फ़िल्म में हीरामन उसे स्पष्ट बोलता है; (2) फ़िल्म में नाटकीय मोड़, ज़मींदार का तनाव और गीतों (शैलेन्द्र) की भूमिका बढ़ाई गई है, जो कहानी के मूल रूप में उस तरह नहीं हैं।


चीफ़ की दावत: कथानक | Chief Ki Daawat: Plot

भीष्म साहनी की कहानियों का कथानक कसा हुआ होता है। ‘चीफ़ की दावत’ लगभग एक ही शाम और रात में, एक ही घर के भीतर घटती है, पर पूरे मध्यम वर्ग की पोल खोल देती है।

शुरुआत। कहानी का पहला वाक्य है कि आज मिस्टर शामनाथ के घर चीफ़ की दावत है। शामनाथ और उनकी पत्नी पसीना पोंछने की फ़ुर्सत के बिना तैयारी में लगे हैं: कुर्सियाँ, मेज़, तिपाइयाँ, नैपकिन, फूल बरामदे में पहुँच गए, ड्रिंक का इंतज़ाम बैठक में हुआ, घर का फ़ालतू सामान अलमारियों के पीछे और पलंगों के नीचे छिपाया जा रहा है। तभी शामनाथ के सामने अड़चन खड़ी होती है: माँ का क्या होगा?

बीच का द्वंद्व। पति-पत्नी अंग्रेज़ी में बात करते हैं। पत्नी का सुझाव है कि माँ को पिछवाड़े उनकी सहेली के घर भेज दिया जाए; शामनाथ मना करते हैं। तय होता है कि माँ जल्दी खाना खाकर बरामदे में कोठरी के बाहर बैठेंगी, फिर ग़ुसलख़ाने के रास्ते अंदर चली जाएँगी। पत्नी को डर है कि कहीं माँ सो गईं तो उनके खर्राटे दूर तक जाएँगे; माँ ख़ुद भी कहती हैं कि बीमारी के बाद वे नाक से साँस नहीं ले पातीं। शामनाथ माँ को हिदायतें देते हैं: टाँगें ऊपर चढ़ाकर न बैठना, नंगे पाँव या खड़ाऊँ में सामने न आना, सफ़ेद क़मीज़-सलवार पहनना। चूड़ियाँ पहनने की बात पर माँ कहती हैं कि सब ज़ेवर तुम्हारी पढ़ाई में बिक गए; शामनाथ इसे तीर की तरह महसूस करते हैं और चिढ़कर जवाब देते हैं। माँ दिल से सिर्फ़ यह चाहती हैं कि बेटे के बड़े साहब के सामने सब कुछ सुभीते से निबट जाए।

चरमोत्कर्ष (Climax)। दावत ड्रिंक के दौर में बहुत सफलता से चलती है, साढ़े दस बज जाते हैं। मेहमान खाने के लिए बरामदे में आते हैं तो शामनाथ ठिठक जाते हैं। माँ कुर्सी पर पाँव चढ़ाए, सिर झुलाती, गहरे खर्राटे ले रही हैं। देसी अफ़सरों की कुछ स्त्रियाँ हँस पड़ती हैं; चीफ़ धीरे से कहता है “पुअर डियर!” माँ हड़बड़ाकर उठ बैठती हैं। चीफ़ नमस्ते कहता है, फिर हाथ मिलाने के लिए दायाँ हाथ बढ़ाता है। माँ के दाएँ हाथ में माला है, घबराहट में वे बायाँ हाथ रख देती हैं और चीफ़ “हाउ डू यू डू” कहता रहता है। शामनाथ भीतर से जल जाते हैं।

अंत। चीफ़ को गाँव के लोग पसंद हैं; वह माँ से कोई गीत सुनाने को कहता है। बेटे के गंभीर आदेश-भरे “माँ!” के बाद माँ पंजाबी विवाह का पुराना गीत गाती हैं और तीन पंक्तियों के बाद रुक जाती हैं। तालियाँ गूँजती हैं और शामनाथ की खीज प्रसन्नता और गर्व में बदल जाती है। फिर चीफ़ पंजाब की दस्तकारी के बारे में पूछता है; वह दुकान की चीज़ नहीं, घरों में औरतों के हाथ की चीज़ चाहता है। माँ अपनी पुरानी फुलकारी लाती हैं, शामनाथ वादा कर देते हैं कि माँ नई बना देंगी। मेहमान खाने की मेज़ की ओर जाते हैं और माँ चुपचाप कोठरी में लौटकर देर तक रोती हैं।

आधी रात शामनाथ दरवाज़ा खटखटाते हैं, माँ को गले लगाकर कहते हैं कि तुमने तो आज रंग ला दिया। माँ आँसू पोंछकर कहती हैं कि मुझे हरिद्वार भेज दो। शामनाथ का झूमना रुक जाता है; वे कहते हैं कि तुम मुझे बदनाम करना चाहती हो। जब वे बताते हैं कि फुलकारी देने का वादा हो चुका है और साहब ख़ुश हुआ तो तरक़्क़ी मिलेगी, माँ का चेहरा बदलने लगता है, और वे कहती हैं “तो मैं बना दूँगी, बेटा, जैसे बन पड़ेगा।” वे दिल ही दिल में बेटे के उज्ज्वल भविष्य की कामना करने लगती हैं और शामनाथ लड़खड़ाते हुए अपने कमरे की ओर चले जाते हैं।

शामनाथ के घर की दावत की शाम से आधी रात तक की टाइमलाइन
बरामदा, बैठक और कोठरी: एक शाम की कहानी

ध्यान दीजिए (सुधार): कई नोट्स में चीफ़ का नाम “मिस्टर शुक्ला”, शामनाथ को “क्लर्क से बड़ा बाबू”, माँ को “ज़ोर से बोलने वाली, फटे कपड़े वाली” और माँ के गीत को “हम तो गाँव की बंजारिन” बताया जाता है, साथ ही अंत में शामनाथ के पश्चाताप का वर्णन मिलता है। मूल पाठ में इनमें से कुछ भी नहीं है। चीफ़ अमरीकी है और उसका नाम नहीं दिया गया; माँ संकोची और दब्बू हैं; और अंत में पश्चाताप के बजाय माँ का स्वयं को बेटे के स्वार्थ के लिए समर्पित कर देना है। यही अंत कहानी की सबसे बड़ी चोट है।

चीफ़ की दावत: पात्र-चरित्र | Chief Ki Daawat: Characterization

इस कहानी में पात्र कम हैं, पर हर पात्र किसी पूरे वर्ग का प्रतिनिधि (Representative) है।

1. शामनाथ। वह नई कहानी का शहरी मध्यवर्गीय नायक है: महत्त्वाकांक्षी, व्यवस्था-प्रिय (हर बात में “तरतीब” चाहने वाला) और तरक़्क़ी के लिए सब कुछ साधने को तैयार। वह माँ से कटु है, पर पूरी तरह निर्मम नहीं; दावत में जब माँ चीफ़ को पसंद आ जाती है तो वह उसे “अम्मी” कहकर गले लगाता है। उसकी बाधा यह है कि उसे माँ में अपना ही “देहातीपन” दिखता है, जिससे वह बचना चाहता है। उसका चरित्र आंतरिक द्वंद्व (ममता बनाम महत्त्वाकांक्षा/सामाजिक हैसियत) का उदाहरण है। परीक्षा में यह वाक्य काम का रहेगा: शामनाथ आज के आत्मकेंद्रित, तरक़्क़ी-परस्त मध्यम वर्ग का प्रतिनिधि है।

2. माँ। वह गाँव, परंपरा, श्रम और सहज मानवीयता की प्रतीक है: दुबली, अनपढ़, माला जपने वाली, डरी-सहमी। वह बेटे का हर हुक्म मानती है, पर उसके भीतर आत्मसम्मान की चोट बहुत गहरी है, जिसे हम उसके रोने में देखते हैं। उसके पास ज़ेवर नहीं बचे, क्योंकि वे बेटे की पढ़ाई में बिक गए। वह यह भी कहती है कि वह माँस-मछली वाली दावत में कुछ नहीं खाएगी, यानी उसके अपने नियम और संस्कार हैं। अंत में वह बेटे के उज्ज्वल भविष्य की कामना में अपना अपमान भी पी जाती है। यही उसकी ममता और उसकी विवशता दोनों है।

3. शामनाथ की पत्नी (श्रीमती)। वह भी मध्यवर्गीय मानसिकता की प्रतीक है। वह दावत की तैयारी में पति से पीछे नहीं, और माँ को सहेली के घर भेजने का सुझाव देने वाली वही है। जब शामनाथ उस पर आरोप डालते हैं तो वह साफ़ कहती है कि माँ-बेटे की बातों में वह क्यों बुरी बने। यानी वह स्वार्थी भी है और ज़िम्मेदारी से बचने वाली भी।

4. चीफ़। वह उच्च पद-सत्ता और बाहरी दुनिया का प्रतीक है, अमरीकी, शराब और दावत में दोस्ताना, दफ़्तर में रोब वाला। वह माँ के खर्राटों पर “पुअर डियर” कहता है, यानी करुणा से भी और बड़े-छोटे के भाव से भी। वह माँ की सहजता पर रीझता है, पर उसकी रुचि “गाँव के गीत” और “पंजाब की दस्तकारी” में एक आकर्षक, लगभग पर्यटक की निगाह से भरी है। इसलिए यह मान लेना जल्दबाज़ी होगी कि वह सबसे मानवीय पात्र है। लेखक दिखाता है कि माँ को “प्रदर्शन-वस्तु” बनाने में चीफ़ की भी भूमिका है।

5. देसी अफ़सर और उनकी स्त्रियाँ। वे समूह के रूप में आते हैं: चीफ़ के साथ हँसने, ताली बजाने और माँ के हाथ मिलाने पर क़हक़हे लगाने वाला वर्ग। उनकी हँसी बताती है कि सत्ता के सामने सब एक-सा व्यवहार करते हैं।

चीफ़ की दावत: सामाजिक यथार्थ | Chief Ki Daawat: Social Realism

भीष्म साहनी प्रगतिशील लेखक थे, इसलिए उनकी कहानियों में सामाजिक यथार्थ (Social Realism) बहुत गहरा होता है। ‘चीफ़ की दावत’ शहरी यथार्थ का एक सच्चा दस्तावेज़ है।

कैसा यथार्थ? यह गरीबी का नहीं, मध्यम वर्ग के मन का यथार्थ है। आज़ादी के बाद शहरों में नौकरीपेशा मध्यम वर्ग उभरा। उसके पास थोड़ा पैसा आया, थोड़ी अंग्रेज़ी आई, और साथ में आया हीन-भावना (Inferiority Complex) और दिखावे की भूख। शामनाथ इसी वर्ग का प्रतिनिधि है। कहानी में यह यथार्थ कई स्तरों पर दिखता है:

  • पहला रूप: पीढ़ी-अंतराल (Generation Gap)। माँ गाँव की परंपरा है, बेटा शहर की “आधुनिकता”। पर यहाँ अंतराल केवल उम्र का नहीं, मूल्य और हैसियत का भी है: बेटे की पढ़ाई माँ के ज़ेवर बेचने से हुई, और अब वही बेटा माँ को “सलीक़ा” सिखा रहा है।
  • दूसरा रूप: बॉस-संस्कृति और चापलूसी। चीफ़ को घर बुलाकर ख़ुश करना, घर को सजाना, पत्नी के साथ तैयारी: यह दफ़्तर की राजनीति का घर में घुस आना है। यहाँ तक कि माँ की उपयोगिता भी इसी तराज़ू पर तौली जाती है: “फुलकारी बनेगी तो तरक़्क़ी होगी।”
  • तीसरा रूप: औपनिवेशिक मानसिकता का असर। अमरीकी चीफ़ के सामने “देसी अफ़सर” और उनकी पत्नियाँ, अंग्रेज़ी में बात करना, व्हिस्की, पर्दे और सोफ़ा-कवर की तारीफ़ से ख़ुश होना: ये सब स्वतंत्रता के बाद भी बने रहे साहब-परस्त रवैये का संकेत हैं।
  • चौथा रूप: स्त्री-श्रम और स्त्री-पात्रों की अलग-अलग स्थितियाँ। माँ का श्रम और त्याग (बिके ज़ेवर, फुलकारी बनाने की माँग) अदृश्य है, जबकि पत्नी इस व्यवस्था में सहभागी है। यानी स्त्रियाँ एक-सी स्थिति में नहीं हैं और कहानी इन्हें सरल “शिकार-अपराधी” खाँचे में नहीं रखती।

भीष्म साहनी ने यह यथार्थ बिना किसी भाषण के, केवल एक शाम की दावत के दृश्य से दिखा दिया है। इसीलिए यह कहानी नई कहानी की सबसे सशक्त सामाजिक-यथार्थवादी कहानियों में गिनी जाती है।

चीफ़ की दावत: केंद्रीय संवेदना और शीर्षक | Chief Ki Daawat: Central Theme and Title

इस कहानी की केंद्रीय संवेदना (Central Theme) बहुत सीधी लगती है, पर चोट गहरी करती है।

केंद्रीय संवेदना। इस कहानी की आत्मा है आधुनिकता और तरक़्क़ी के नाम पर मानवीय संबंधों का विघटन और मध्यम वर्ग का आत्म-प्रवंचना (Self-Deception) में डूबे रहना। शामनाथ को लगता है कि वह आधुनिक हो गया है, पर वह अपनी ही जड़ से कट रहा है। जिस माँ ने उसे पढ़ाया, वही उसे “समस्या” लगती है। लेखक सीधे नहीं कहता, पर पाठक के भीतर यह सवाल उठता है: क्या तरक़्क़ी का मतलब माँ को छिपाना और फिर उसी माँ का इस्तेमाल करना है?

कहानी का सबसे विडंबनापूर्ण पहलू यह है कि अंत में माँ का “रंग लाना” भी बेटे की तरक़्क़ी के लिए ही है। माँ अपमान के बाद भी मान जाती हैं, और शामनाथ को उसका बोध नहीं होता। इसलिए इसे केवल “माँ के प्रति अपराध-बोध” की कहानी कहना अधूरा होगा; अपराध-बोध पाठक के भीतर जगता है, पात्र के भीतर नहीं।

शीर्षक की सार्थकता। शीर्षक ‘चीफ़ की दावत’ व्यंग्यात्मक (Ironic) है।

  • ऊपर से लगता है कि कहानी चीफ़ की मेहमाननवाज़ी की है।
  • पर असल में दावत सिर्फ़ मौक़ा है; असली विषय उस दावत की तैयारी में माँ को “मैनेज” करने की मानसिकता है। “चीफ़ की” शब्द ही दिखाता है कि सारा आयोजन चीफ़ के लिए है, घर की माँ के लिए नहीं।
  • शीर्षक में कहीं माँ का ज़िक्र नहीं, ठीक वैसे ही जैसे शामनाथ के घर के आयोजन में माँ का कोई स्थान नहीं।

अगर शीर्षक ‘माँ और बेटा’ होता तो कहानी भावुक लगती; ‘चीफ़ की दावत’ कहने से लेखक ने मध्यवर्गीय महत्त्वाकांक्षा और उसके बनावटीपन को एक ही वाक्य में समेट दिया है। इसीलिए यह शीर्षक सार्थक और व्यंग्यात्मक है।

चीफ़ की दावत: महत्त्वपूर्ण प्रसंग | Key Scenes (संदर्भ–प्रसंग–व्याख्या)

(प्रसंग पाठ के आधार पर अपने शब्दों में हैं; परीक्षा में अपनी प्रति की पंक्ति उद्धृत कीजिए।)

प्रसंग 1: बरामदे में कुर्सी पर माँ और हिदायतें

  • संदर्भ: भीष्म साहनी की कहानी ‘चीफ़ की दावत’।
  • प्रसंग: शामनाथ माँ को कुर्सी पर बिठाकर बताते हैं कि टाँगें ऊपर करके नहीं बैठते, नंगे पाँव न घूमना, सफ़ेद कपड़े पहनना।
  • व्याख्या: घर के भीतर अपने ही माँ को एक “प्रदर्शन-वस्तु” की तरह तैयार किया जा रहा है। हिदायतों की भाषा आदेश की है, भावना की नहीं। माँ का हर उत्तर “अच्छा, बेटा” है, जो उसकी आज्ञाकारिता और आत्म-क्षरण दोनों दिखाता है।
  • विशेष: संवादों की सहजता, व्यंग्य और करुणा का मिश्रण।

प्रसंग 2: हाथ मिलाना और गीत

  • संदर्भ: वही कहानी, दावत का केंद्रीय दृश्य।
  • प्रसंग: चीफ़ दायाँ हाथ बढ़ाता है, माँ माला वाले दाएँ हाथ की जगह बायाँ हाथ रख देती हैं; फिर बेटे के “माँ!” कहने पर गीत गाती हैं।
  • व्याख्या: माला और बायाँ हाथ गाँव, आस्था और संस्कार का प्रतीक है, जो शहरी “शिष्टाचार” में अटपटा ठहरता है। शामनाथ के शब्द “माँ!” में आदेश का वह ज़ोर है कि हाँ-ना का सवाल ही नहीं बचता। गाना माँ के लिए सहजता नहीं, मजबूरी है।
  • विशेष: दृश्य का बाहरी हास्य और भीतरी त्रासदी का मेल।

प्रसंग 3: आधी रात: कोठरी का दरवाज़ा

  • संदर्भ: कहानी का अंतिम भाग।
  • प्रसंग: शामनाथ माँ को गले लगाते हैं; माँ हरिद्वार भेजे जाने की बात करती हैं; शामनाथ तरक़्क़ी का हवाला देते हैं; माँ फुलकारी बनाने को मान जाती हैं।
  • व्याख्या: हरिद्वार एक वृद्ध की “घर में अपने लिए जगह न होने” का संकेत है। शामनाथ का गले लगाना प्यार नहीं, लाभ की ख़ुशी है। माँ का मान जाना ममता की जीत भी है और शोषण की भी।
  • विशेष: व्यंग्यात्मक अंत; विडंबना (Irony) का चरम।

चीफ़ की दावत: कठिन शब्दार्थ | Key Terms

शब्दअर्थ
चीफ़दफ़्तर का सबसे बड़ा अफ़सर/बॉस
देसी अफ़सरभारतीय अफ़सर (अमरीकी चीफ़ के संदर्भ में)
ड्रिंकशराब का दौर
फुलकारीपंजाब की फूलों-वाली कढ़ाई की ओढ़नी/चादर
टप्पेपंजाबी लोकगीत की एक विधा
कोठरीछोटा कमरा
खड़ाऊँलकड़ी की पादुका
ग़ुसलख़ानास्नानघर
हरिद्वारतीर्थ; वृद्धों के अंतिम आश्रय का प्रतीक
तरक़्क़ीपदोन्नति

5. कहानी-कला और शिल्प | Craft and Technique

भाषा, बोली और संवाद-योजना | Language, Dialect and Dialogue

कहानी की भाषा ही उसका प्राण होती है। रेणु और भीष्म साहनी की भाषा बिल्कुल अलग है, और यही अंतर उनकी शिल्प-कला (Craft) को समझाता है।

‘तीसरी कसम’ की भाषा-शैली

रेणु की भाषा आंचलिक भाषा (Aanchalik Language) है। ध्यान दीजिए, यह किताबी खड़ी बोली का सपाट रूप नहीं है।

  • बोली का प्रयोग: पूरी कहानी पूर्णिया-फारबिसगंज अंचल की बोली-बानी के रंग में लिखी गई है: ‘इस्स!’, ‘धन्न है’, ‘लदनी’, ‘बासा’, ‘दुआली’, ‘गुदगुदी’, ‘अजगुत-अजगुत’। हीरामन की भाषा-चेतना भी कहानी का हिस्सा है: बड़ों के लिए ‘अहाँ’ और दिल खोलकर बात करने के लिए “गाँव की बोली”।
  • लोकगीत और लोक-धुन: भाषा में लोकगीत घुले हुए हैं (महुआ घटवारिन, ‘सजन रे झूठ मति बोलो’, छोकरा-नाच का गीत, बच्चों की तुकबंदी)। ये पात्रों के मन की बात कहते हैं।
  • संवाद-योजना: संवाद छोटे, पर आत्मीय हैं। हीरामन हीराबाई को ‘आप’ कहता है, हीराबाई उसे ‘मीता’, ‘उस्ताद’, ‘गुरु जी’ कहती है। एक शब्द ‘मीता’ दोनों के संबंध की बराबरी को दिखा देता है। संवादों में बनावट नहीं, सहजता है।
  • ध्वनि और गंध के बिंब: ‘फेनूगिलासी’ बोली, चंपा के फूल की महक, अतर-गुलाब की गंध, नगाड़े की ताल: भाषा आँख से ज़्यादा कान और नाक को पकड़ती है।

‘चीफ़ की दावत’ की भाषा-शैली

भीष्म साहनी की भाषा शहरी, व्यंग्यात्मक और सहज मानक हिन्दी है, जिसमें उर्दू-फ़ारसी शब्द (‘फ़ेहरिस्त’, ‘मुकम्मल’, ‘ख़ुदा के वास्ते’) और अंग्रेज़ी के वाक्यांश (‘पुअर डियर’, ‘हाउ डू यू डू’, ‘ड्रिंक’, ‘चीफ़’) घुले-मिले हैं।

  • भाषा: आंचलिक शब्द नहीं हैं। भाषा दफ़्तरी और मध्यवर्गीय घर की हिन्दी है। अंग्रेज़ी शब्द और अंग्रेज़ी में की गई बातचीत ही मध्यम वर्ग के दिखावे को उजागर करते हैं। विशेष रूप से पति-पत्नी का माँ के बारे में बात अंग्रेज़ी में करना माँ को संवाद से बाहर कर देता है।
  • संवाद-योजना: संवाद काटने वाले और व्यंग्य-भरे हैं। माँ के लिए हर वाक्य निर्देश है: “यूँ नहीं, माँ!”, “दायाँ हाथ मिलाओ”। माँ का हर उत्तर छोटा और झुका हुआ है: “अच्छा, बेटा।” संवाद ही पीढ़ी-अंतराल और सत्ता-संबंध को सामने ला देते हैं।

परीक्षा में यह अंतर ज़रूर लिखिए: रेणु की भाषा मिट्टी से, लोकगीत से और अंचल से जोड़ती है; भीष्म साहनी की भाषा मुखौटा उतारती है, बनावट पर चोट करती है।

कथा-शिल्प और वातावरण-निर्माण | Narrative Craft and Atmosphere

कथा-शिल्प (Narrative Craft) से मतलब है कि लेखक ने कहानी को कैसे बुना है, और वातावरण-निर्माण (Atmosphere) से मतलब है कि पढ़ते हुए आँखों के सामने कैसा दृश्य बनता है।

‘तीसरी कसम’ का शिल्प और वातावरण

  • शिल्प: इसका शिल्प यात्रा-प्रधान और लोक-कथा जैसा (Folk Narrative) है। कहानी बैलगाड़ी के साथ चलती है, बीच में फ़्लैशबैक आता है (पुरानी दो कसमें) और अंत में वही “गुदगुदी” और “चंपा का फूल” लौट आता है, यानी कहानी एक तरह का वृत्ताकार (Circular) घेरा बनाती है। कहानी में नाटकीय मोड़ कम हैं; सब कुछ गीत की तरह धीरे-धीरे खुलता है। महुआ घटवारिन की कथा-में-कथा और गीत की टूटी हुई कड़ी, ये दोनों प्रयोग कहानी के आख़िरी असर को गहरा करते हैं।
  • वातावरण-निर्माण: वातावरण धूल-भरा, मेले-भरा और संगीतमय है। चंपानगर और फारबिसगंज के मेले, कजरी का किनारा, तेगछिया के तीन पेड़, बैलों के गले की घंटियाँ, नौटंकी का नगाड़ा, स्टेशन की सीटी: हर ब्योरा इतने प्यार से लिखा गया है कि पाठक ख़ुद को उसी गाड़ी में बैठा महसूस करता है। यह आंचलिक वातावरण अनुभव से आता है, किताब से नहीं।

‘चीफ़ की दावत’ का शिल्प और वातावरण

  • शिल्प: इसका शिल्प कसा हुआ और नाटकीय है। घटना लगभग एक ही शाम-रात में, एक घर के बरामदे, बैठक और कोठरी में घटती है, जिसे नाट्य-समीक्षा की भाषा में संकलन-त्रय (समय, स्थान और कार्य की एकता) के निकट कहा जा सकता है। कहानी पूर्वसंकेत (Foreshadowing) का प्रयोग करती है: पत्नी शुरू में ही चिंता करती है कि माँ सो गईं तो खर्राटे लेंगी; वही बाद में सचमुच होता है। इससे पाठक के मन में तनाव बना रहता है। अंत में विडंबना (Irony) कहानी को चोट देती है।
  • वातावरण-निर्माण: वातावरण घुटा हुआ, बनावटी और शहरी है। नए पर्दे, सोफ़ा-कवर, सेंट और पाउडर की महक, व्हिस्की का दौर, अंग्रेज़ी में बात करने की कोशिश: ये सब दिखावटी आधुनिकता का माहौल बनाते हैं। और उसी में माँ की माला, खड़ाऊँ और लोकगीत, यह विरोध (Contrast) ही कहानी का असली वातावरण है। एक तरफ़ इत्र-पाउडर और क़हक़हे, दूसरी तरफ़ कोठरी में रोती माँ।

तो एक कहानी में वातावरण खुला और गीतात्मक है, दूसरी में बंद और व्यंग्यात्मक।

दोनों कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन | Comparative Study of the Two Stories

अब दोनों कहानियों को साथ रखकर देखिए, तभी स्वातंत्र्योत्तर कहानी की दो बड़ी धाराएँ समझ में आएँगी।

तुलना का आधारतीसरी कसम (रेणु)चीफ़ की दावत (भीष्म साहनी)
प्रवृत्तिआंचलिक कहानी (नई कहानी के दौर से भी जुड़ी)नई कहानी / शहरी मध्यवर्गीय यथार्थ
भाषापूर्णिया-फारबिसगंज अंचल की बोली का रंग, लोकगीतमानक/दफ़्तरी-शहरी हिन्दी, उर्दू-फ़ारसी और अंग्रेज़ी वाक्यांश
शिल्पयात्रा-प्रधान, लोककथात्मक, फ़्लैशबैक, वृत्ताकारकसा हुआ, नाटकीय, एक शाम-रात, पूर्वसंकेत और विडंबना
वातावरणखुला, मेला-नौटंकी-रेल, गाँव-क़स्बाबंद, घर का बरामदा-बैठक-कोठरी, शहर
केंद्रीय पात्रगाड़ीवान और नौटंकी की अभिनेत्री (हाशिए के लोग)शहरी अफ़सर शामनाथ और उसकी बूढ़ी माँ
संवेदनानिश्छल प्रेम, सम्मान, विरहपाखंड, पीढ़ी-अंतराल, स्वार्थ, आत्म-प्रवंचना
अंतसंकेत में कसम, गीत की अधूरी कड़ीमाँ का फुलकारी बनाने को मान जाना; विडंबनापूर्ण समझौता
दोनों कहानियों की भाषा, शिल्प, वातावरण और संवेदना की तुलना का चार्ट
रेणु और भीष्म साहनी: एक नज़र में

परीक्षा में अगर पूछा जाए कि दोनों में क्या समानता है, तो यह लिखिए: दोनों ही स्वातंत्र्योत्तर कहानियाँ हैं, दोनों में उपेक्षित या हाशिए के पात्र केंद्र में हैं (गाड़ीवान-नर्तकी, और घर की बूढ़ी माँ), और दोनों मानवीय गरिमा (Human Dignity) का प्रश्न उठाती हैं।

पर अंतर ज़्यादा महत्त्वपूर्ण है: रेणु की कहानी मनुष्य को मनुष्य से, मिट्टी से और लोक-स्मृति से जोड़ती है; साहनी की कहानी मनुष्य के मुखौटे और दिखावे को तोड़ती है। एक में प्रेम असफल होकर भी पवित्र रहता है, दूसरी में तरक़्क़ी सफल होती दिखकर भी भीतर से शर्मिंदा करती है। विद्यार्थियों की सुविधा के लिए एक सूत्र: रेणु की कहानी में लोकगीत की धुन है, साहनी की कहानी में समाज का आईना। (यह सूत्र पढ़ाई की सुविधा के लिए है, किसी आलोचक का उद्धरण नहीं।)

Quick Summary (English): Teesri Kasam uses regional speech, folk songs, flashback and a circular, journey-based structure to build an open fair-and-road atmosphere; Chief Ki Dawat uses urban Hindi with English phrases, foreshadowing and irony within one evening and one house to build a closed, suffocating atmosphere. Renu’s dialogue shows respect and tenderness, Sahni’s shows command and hypocrisy; both centre on marginal figures and human dignity.


6. हिन्दी कहानी में योगदान | Contribution to Hindi Kahani

रेणु का योगदान | Renu’s Contribution

फणीश्वरनाथ रेणु ने हिन्दी कहानी को मिट्टी की महक और बोली का संगीत दिया।

1. आंचलिकता को साहित्यिक ऊँचाई देना। आंचलिक प्रवृत्ति के बीज रेणु से पहले भी मिलते हैं (आलोचना में अक्सर प्रेमचंद-युग के ग्रामीण यथार्थ और बाद के आंचलिक उपन्यासों का ज़िक्र होता है), इसलिए “आंचलिकता के जनक” जैसा निर्विवाद दावा करना ठीक नहीं। पर यह निर्विवाद है कि रेणु ने बोली, लोकगीत, ध्वनि और गंध को कथा की संरचना का हिस्सा बनाकर आंचलिकता को शिखर पर पहुँचाया। ‘मैला आँचल’ (1954) को उन्होंने ख़ुद “आंचलिक उपन्यास” कहा और इसे आम तौर पर हिन्दी का पहला सफल आंचलिक उपन्यास माना जाता है। ‘तीसरी कसम’, ‘पंचलाइट’, ‘ठेस’, ‘लाल पान की बेगम’ जैसी कहानियाँ आंचलिक कहानी की प्रतिनिधि रचनाएँ हैं। उन्होंने दिखाया कि साहित्य का विषय फारबिसगंज का मेला और कोसी का दियारा भी हो सकता है।

2. भाषा में नया प्रयोग। रेणु की सबसे बड़ी देन है भाषा (Language)। उन्होंने खड़ी बोली गद्य के भीतर बोली, लोकगीत (Folk Songs), लोक-नृत्य और मुहावरों की संभावनाएँ खोलीं और उन्हें इस तरह बुना कि वे सजावट नहीं, कथा के प्राण लगते हैं। हीरामन का गीत और महुआ घटवारिन इसके उदाहरण हैं।

3. हाशिए के पात्रों को केंद्र में लाना। रेणु ने गाड़ीवान, नौटंकी की अभिनेत्री, मेले-बाज़ार के लोगों को कहानी का केंद्र बनाया और दिखाया कि इनकी भी गरिमा (Dignity) और प्रेम की दुनिया है।

4. नई संवेदना। उनकी कहानियों में प्रेम रोमांटिक नहीं, मानवीय है। ‘तीसरी कसम’ में प्रेम असफल है, पर पवित्र है। यह नई कहानी की संवेदना से भी जुड़ता है, पर आंचलिक लहजे में।

भीष्म साहनी का योगदान | Bhisham Sahni’s Contribution

अगर रेणु ने हिन्दी कहानी को गाँव-अंचल की सुगंध दी, तो भीष्म साहनी ने उसे शहर का सच और विभाजन का दर्द दिया।

1. नई कहानी को सामाजिक-वैचारिक गहराई देना। उनकी नई कहानी केवल अकेलेपन की नहीं, सामाजिक यथार्थ (Social Realism) की भी है। उन्होंने मध्यम वर्ग (Middle Class) के पाखंड, दिखावे और पीढ़ी-अंतराल (Generation Gap) को जिस बेरहमी से दिखाया, वह ‘चीफ़ की दावत’ में सबसे साफ़ है। यह कहानी आज भी प्रासंगिक है।

2. विभाजन (Partition) की त्रासदी को स्वर देना। उनका सबसे बड़ा ऐतिहासिक योगदान ‘तमस’ है, जिस पर साहित्य अकादमी पुरस्कार मिला। उनकी कहानी ‘अमृतसर आ गया है’ विभाजन पर लिखी सबसे चर्चित कहानियों में है। उन्होंने हिन्दू-मुस्लिम संबंधों को नफ़रत से नहीं, मानवीयता से देखा।

3. भाषा और शिल्प में सादगी। उनकी भाषा सादी, साफ़ और व्यंग्यात्मक (Satirical) है। वे भारी शब्दों से नहीं, छोटे संवादों और स्थितियों से चोट करते हैं। उनका शिल्प कसा हुआ और नाटकीय है। रंगमंच से उनका संबंध (इप्टा, और नाटक ‘हानूश’, ‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’) इसमें झलकता है।

4. मानवीयता के लेखक। वे प्रगतिशील थे, पर नारेबाज़ी वाले लेखक नहीं। वे मनुष्य के भीतर के अच्छे को बचाए रखने के पक्षधर थे।

Quick Summary (English): Renu raised Aanchalik fiction to its peak by making dialect, folk song, sound and smell part of the story’s structure and by centring marginal people; calling him the “founder” of Aanchalikta is debatable because the tendency has earlier roots. Bhisham Sahni gave Nayi Kahani sharp social realism (middle-class hypocrisy, generation gap), wrote the Partition classic Tamas, and used a simple, satirical and dramatic craft rooted in humanism.


7. त्वरित सारांश | Quick Summary (English)

Background: Nayi Kahani is usually dated from 1956 (some sources say 1954-55). It was led by Mohan Rakesh, Rajendra Yadav and Kamleshwar and focused on individual alienation and urban experience. Aanchalik Kahani, associated with Renu, ran in parallel.

Authors: Phanishwarnath Renu (1921-1977), from the Purnia region of Bihar, took part in the Quit India, Nepal and socialist movements and wrote the Aanchalik novel Maila Aanchal (1954) and the collection Thumri (1959). Bhisham Sahni (1915-2003), born in Rawalpindi, was a DU professor and brother of Balraj Sahni; he witnessed Partition and won the Sahitya Akademi Award for Tamas.

Texts: Teesri Kasam aka Mare Gaye Gulfam follows the cart-driver Hiraman, who has vowed never to carry black-market goods or bamboo, and the nautanki actress Hirabai, from the Champanagar fair to Forbesganj. Their bond is built through songs, respect and the story of Mahua Ghatwarin; at the end he seems to take a third, unspoken vow. Chief Ki Dawat, from Pahla Path (1957), follows Sham Nath’s dinner for his American boss, where his old mother is both hidden and used.

Craft & Contribution: Renu contributed folk dialect, folk songs, marginal protagonists and a lyrical, circular craft. Sahni contributed urban middle-class realism, irony, the generation gap, Partition literature and a tight dramatic craft.


8. परीक्षा की तैयारी | Exam Preparation

University of Delhi Previous Year Questions

DU Previous Year Questions – DSC-3 Hindi Kahani | Unit 2

Frequently asked questions from DU exam papers on this topic. Tap a question to view a quick-answer guide. Source: Paper Code 3067 D (2023-25 NEP)

1 उसने कहा था कहानी के शीर्षक की सार्थकता पर विचार कीजिए। +
Answer Guide: शीर्षक ‘उसने कहा था’ सूबेदारनी के बचपन में कहे वाक्य से जुड़ा है – “मेरे पति और पुत्र की रक्षा करना”। यही वाक्य लहना सिंह के जीवन का लक्ष्य बन जाता है। शीर्षक में उत्सुकता, स्मृति और बलिदान तीनों भाव हैं। यह Flashback technique से कहानी को बांधता है।

Keywords: गुलेरी 1915, सरस्वती पत्रिका, वचन-पालन, बलिदान
Long Answer – 15 Marks
2 उसने कहा था कहानी में प्रेम और कर्तव्य का द्वंद्व लहना सिंह के चरित्र के माध्यम से स्पष्ट कीजिए। +
Answer Guide: लहना सिंह में एक तरफ बचपन का निश्छल प्रेम (सूबेदारनी के लिए) और दूसरी तरफ सैनिक का कर्तव्य है। वह सूबेदारनी के पति और पुत्र दोनों को बचाता है, खुद 85 जर्मनों को मारकर शहीद हो जाता है। प्रेम उसे कर्तव्य की ओर प्रेरित करता है, द्वंद्व नहीं बल्कि समन्वय है।

Structure: 1. प्रस्तावना 2. लहना सिंह का चरित्र 3. प्रेम-तत्व 4. कर्तव्य-तत्व 5. निष्कर्ष
Long Answer
3 प्रेमचंद की ‘कफन’ कहानी में दलित चेतना और सामाजिक यथार्थ का चित्रण कीजिए। +
Answer Guide: घीसू-माधव आलसी नहीं, व्यवस्था के सताए हुए हैं। जमींदार द्वारा बेगार, समाज द्वारा शोषण। कफन के पैसों से शराब पीना उनकी विद्रोह-वृत्ति है। प्रेमचंद ने यहाँ आदर्शवाद से यथार्थवाद की ओर प्रस्थान किया है। दलित केवल जाति नहीं, आर्थिक शोषण का प्रतीक है।

Keywords: 1936, यथार्थवाद, शोषण-तंत्र, मानवीय संवेदना
Long Answer – Most Repeated
4 उसने कहा था कहानी को हिंदी कहानी के विकास में मील का पत्थर क्यों कहा जाता है? +
Answer Guide: कारण – 1) पूर्वदीप्ति (Flashback) शैली का पहला सफल प्रयोग 2) प्रेम और युद्ध का अद्भुत संयोजन 3) स्वाभाविक संवाद और पंजाबी मिश्रित हिंदी 4) कहानी में नाटकीयता और पूर्वाभास (Foreshadowing)। आचार्य शुक्ल ने इसे श्रेष्ठ कहानी कहा था।

Line: “यह बूटों के धूल भरे होने का प्रमाण है कि…”
Long Answer
5 प्रेमचंद की कहानी-कला की विशेषताएँ ‘पूस की रात’ या ‘ईदगाह’ के आधार पर बताइए। +
Answer Guide: पूस की रात में – किसान-जमींदार संघर्ष, प्रकृति-चित्रण, हल्कू-जबरा का मानवीकरण। ईदगाह में – बाल-मनोविज्ञान, हामिद का त्याग, गरीबी में संवेदना। दोनों में प्रेमचंद की विशेषताएँ: सरल भाषा, सामाजिक उद्देश्य, पात्रों में जीवंतता, आदर्शोन्मुख यथार्थवाद।
Short Note
6 ‘कफन कहानी में घीसू-माधव मानवीय संवेदना से हीन नहीं हैं’ – इस कथन की समीक्षा कीजिए। +
Answer Guide: बुधिया की मौत पर उनका दुखी न होना संवेदनहीनता नहीं, भूख और गरीबी से उपजी जड़ता है। अंत में वे चिमटा-युक्त कफन की कल्पना करके हँसते हैं, पर शराब के नशे में वे व्यवस्था कोसते हैं – यह उनकी मानवीयता का ही दूसरा रूप है।
Critical Question – 10 Marks
7 उसने कहा था कहानी में फ्लैशबैक तकनीक और परिवेश का प्रयोग स्पष्ट कीजिए। +
Answer Guide: कहानी अमृतसर के बाजार से शुरू होकर युद्ध के मोर्चे पर जाती है, फिर बचपन में लौटती है। यह पूर्वदीप्ति शैली है। प्रथम विश्वयुद्ध का परिवेश, लुधियाना-फ्रांस का भूगोल, सैनिक जीवन का यथार्थ – सब मिलकर कहानी को ऐतिहासिक बनाते हैं।
Short Note

उत्तर लिखने का ढाँचा (टिप): (1) एक वाक्य में परिभाषा/मुद्दा, (2) पाठ का एक ठोस ब्योरा (नाम, स्थान, प्रसंग), (3) विश्लेषण, (4) निष्कर्ष। नोट्स के रटे हुए वाक्यों की जगह पाठ का ब्योरा दीजिएगा।

FAQs | अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

DU में हिन्दी कहानी DSC-3 की Unit 2 में कौन-सी कहानियाँ हैं?

BA (Hons.) Hindi Semester 1, DSC-3 “हिन्दी कहानी” की Unit 2 में रेणु की ‘तीसरी कसम’ और भीष्म साहनी की ‘चीफ़ की दावत’ निर्धारित हैं। (अंतिम पुष्टि के लिए DU की अधिसूचित पाठ्यक्रम-फ़ाइल देखें।)

हीरामन की तीसरी कसम कौन-सी है? क्या कहानी में वह साफ़ लिखी है?

नहीं। कहानी के अंत में सिर्फ़ इतना संकेत है कि शायद वह कंपनी की औरत की लदनी न लादने की कसम खा रहा है; वाक्य अधूरा छोड़ा गया है। फ़िल्म में कसम स्पष्ट बोली गई है।

‘तीसरी कसम’ किस संग्रह में संकलित है?

रेणु के कहानी-संग्रह ‘ठुमरी’ (1959) में। कहानी के पहली बार छपने का वर्ष स्रोतों में 1954, 1956 और 1957 के रूप में मिलता है; इसलिए “1950 के दशक के मध्य” लिखना सुरक्षित है।

‘चीफ़ की दावत’ किस संग्रह में है?

‘पहला पाठ’ (1957) में। कई नोट्स इसे ‘पटरियाँ’ में बताते हैं, जो ग़लत है।

‘चीफ़ की दावत’ का अंत सुखद है या नहीं?

ऊपर से सुखद दिखता है (चीफ़ ख़ुश, तरक़्क़ी की उम्मीद), पर असल में यह विडंबनापूर्ण है: माँ के आँसू, हरिद्वार जाने की माँग, और अंत में बेटे की तरक़्क़ी के लिए फुलकारी बनाने को मान जाना। शामनाथ का स्पष्ट पश्चाताप कहानी में नहीं मिलता।

क्या ‘मैला आँचल’ हिन्दी का पहला आंचलिक उपन्यास है?

इसे आम तौर पर पहला सफल/प्रतिनिधि आंचलिक उपन्यास माना जाता है और रेणु ने इसे “आंचलिक उपन्यास” कहा भी था। पर कुछ आलोचक आंचलिक प्रवृत्ति के शुरुआती रूप पहले की रचनाओं में भी देखते हैं। परीक्षा में “आम तौर पर माना जाता है” जोड़ दीजिए।

परीक्षा में आलोचकों के नाम कैसे लिखें?

DU के संदर्भ-ग्रंथों से: नामवर सिंह (कहानी: नई कहानी), कमलेश्वर (नई कहानी की भूमिका), राजेन्द्र यादव (एक दुनिया समानांतर), गोपाल राय (हिन्दी कहानी का इतिहास), देवीशंकर अवस्थी (नई कहानी: संदर्भ और प्रकृति)। जो वाक्य आप उद्धृत करें, उसका स्रोत पक्का करके ही लिखिए; अनुमान से कथन किसी आलोचक के नाम न लिखें।

क्या फ़िल्म ‘तीसरी कसम’ देखकर तैयारी हो सकती है?

फ़िल्म आंचलिक वातावरण समझने में मदद करती है, पर कहानी से कई जगह अलग है। परीक्षा में मूल कहानी के ब्योरे ही लिखिए।


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9. संदर्भ ग्रंथ | References

इस इकाई के लिए उपयोगी संदर्भ | Suggested References for this Unit

इस इकाई की तैयारी के लिए केवल कहानी पढ़ना काफ़ी नहीं है। नई कहानी, आंचलिकता और दोनों लेखकों पर अच्छी आलोचना भी देखिए।

1. मूल पाठ (Original Texts)

  • ठुमरी, फणीश्वरनाथ रेणु (1959): ‘तीसरी कसम उर्फ़ मारे गए गुलफ़ाम’ का संग्रह।
  • पहला पाठ, भीष्म साहनी (1957): ‘चीफ़ की दावत’ इसी संग्रह में है।
  • मैला आँचल (1954) और तमस (1974): लेखकों की बड़ी दुनिया समझने के लिए।
  • साहित्य अकादेमी के मोनोग्राफ़ (रेणु, भीष्म साहनी): DU के सिलेबस की अतिरिक्त सामग्री में सूचीबद्ध।

2. हिन्दी कहानी के इतिहास और नई कहानी के लिए (DU-सूची के अनुसार)

  • कहानी: नई कहानी: नामवर सिंह
  • नई कहानी की भूमिका: कमलेश्वर
  • एक दुनिया समानांतर: राजेन्द्र यादव
  • हिन्दी कहानी: अंतरंग पहचान: रामदरश मिश्र
  • हिन्दी कहानी का इतिहास: गोपाल राय
  • नई कहानी: संदर्भ और प्रकृति: देवीशंकर अवस्थी
  • हिन्दी कहानी का विकास: मधुरेश
  • हिन्दी कहानी: प्रक्रिया और पाठ: सुरेन्द्र चौधरी

3. पत्रिकाएँ और ई-सामग्री: पहल, हंस, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य; ई-पत्रिका हिंदी समय और गद्य कोश (DU की अतिरिक्त सूची के अनुसार)।

4. फ़िल्म: तीसरी कसम (1966), निर्देशक बासु भट्टाचार्य, निर्माता शैलेन्द्र: आंचलिक वातावरण समझने के लिए, पर पाठ से अलग।

परीक्षा में एक-दो आलोचकों (जैसे नामवर सिंह, गोपाल राय) का नाम लिख देंगे तो उत्तर अधिक प्रामाणिक लगेगा, बशर्ते आपने उनका संदर्भ ख़ुद पढ़ा हो।


निष्कर्ष | Conclusion

रेणु और भीष्म साहनी की ये दो कहानियाँ आमने-सामने रखने पर स्वातंत्र्योत्तर हिन्दी कहानी का पूरा विस्तार दिखा देती हैं: एक में खुली सड़क, लोकगीत और अनकहा प्रेम; दूसरी में बंद बरामदा, दिखावा और व्यंग्य। हीरामन की कसम इसलिए चुभती है कि वह कही ही नहीं गई; शामनाथ की दावत इसलिए चुभती है कि उसमें माँ मौजूद है और फिर भी “अनुपस्थित” रखी जाती है। परीक्षा के लिए तीन बातें पक्की कर लीजिए: पाठ के ब्योरे (नाम, स्थान, प्रसंग), दोनों की तुलना, और शीर्षक की सार्थकता का तर्क।

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About the Author

Sawan Chauhan is the Political Science and History content lead at Delhi Pathshala. He completed his BA and MA in Hindi (Honours) from the University of Delhi and prepares study notes aligned with the DU BA (Hons.) syllabus.

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