Contents
- 1. आदिकाल की पृष्ठभूमि | Background of the Adikal (Early Period)
- राजनीतिक परिस्थितियाँ | Political Conditions
- सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ | Social & Cultural Conditions
- धार्मिक परिस्थितियाँ | Religious Conditions
- आदिकालीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ | Major Trends of Adikalin Literature
- 2. चंदबरदाई का जीवन-परिचय | Life of Chandbardai
- जन्म, स्थान और पारिवारिक परिचय | Birth, Place & Family Background
- पृथ्वीराज चौहान से संबंध | Relationship with Prithviraj Chauhan
- रचनात्मक योगदान | Literary Contribution
- 3. पृथ्वीराज रासो: सामान्य परिचय | Prithviraj Raso: General Introduction
- रासो काव्य-परंपरा | The Raso Poetic Tradition
- रचना-शैली और विषयवस्तु | Style & Subject Matter
- रासो के संस्करण और रूपांतर | Recensions of the Raso
- भाषा और छंद-विधान | Language & Metre
- रचना-काल और प्रामाणिकता का विवाद | The Authenticity & Dating Debate
- संपादित पाठ (हजारीप्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह) | The Edited Text
- 4. बानबेध समय: कथा-सार और संदर्भ | Banbedh Samay: Story Summary & Context
- प्रसंग की पृष्ठभूमि | Background of the Episode
- घटनाक्रम का सार | Summary of Events
- 5. पाठ-विश्लेषण (भावार्थ और व्याख्या) | Text Analysis (Meaning & Explanation)
- कवित्त (10–11): भावार्थ और व्याख्या | Kavitt (10–11)
- दूहा (20–33, 49): भावार्थ और व्याख्या | Duha (20–33, 49)
- पद्धरी (50–53): भावार्थ और व्याख्या | Paddhari (50–53)
- कवित्त (54, 55, 56): भावार्थ और व्याख्या | Kavitt (54–56)
- 6. काव्य-सौंदर्य | Poetic Beauty & Craft
- रस-निरूपण (वीर, अद्भुत, करुण) | Rasa Analysis
- भाषा-शैली | Language & Style
- छंद और अलंकार | Metre & Figures of Speech
- ऐतिहासिकता बनाम काव्यात्मकता | Historicity vs. Poetic Imagination
- 7. हिंदी साहित्य में चंदबरदाई का महत्व | Chandbardai’s Importance in Hindi Literature
- 8. समकालीन प्रासंगिकता | Contemporary Relevance
- 9. संक्षिप्त सारांश | Key Takeaways (English)
- निष्कर्ष | Conclusion
- University of Delhi Previous Year Questions
- Frequently Asked Questions (FAQs)
- बानबेध समय क्या है?
- पृथ्वीराज रासो के रचयिता कौन हैं?
- पृथ्वीराज रासो में कितने समय हैं?
- “चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण” का अर्थ क्या है?
- क्या बानबेध की घटना ऐतिहासिक रूप से सही है?
- पृथ्वीराज रासो प्रामाणिक है या अप्रामाणिक?
- चंदबरदाई किस भाषा में लिखते थे?
- DU में बानबेध समय किस पुस्तक से पढ़ाया जाता है?
- बानबेध समय में मुख्य रस कौन-सा है?
- रासो शब्द का क्या अर्थ है?
- संदर्भ ग्रंथ और स्रोत | References
बानबेध समय पृथ्वीराज रासो का अंतिम और सबसे मार्मिक समय (सर्ग) है, जिसमें रासो की कथा के अनुसार गजनी में बंदी पृथ्वीराज चौहान, कवि-मित्र चंदबरदाई के संकेत पर, शब्दभेदी बाण से मुहम्मद गौरी का वध करते हैं और फिर दोनों मित्र आत्म-बलिदान कर देते हैं। यह प्रसंग दिल्ली विश्वविद्यालय (DU) के हिंदी कविता (आदिकाल एवं निर्गुण भक्ति काव्य) के Unit 1 में चंदबरदाई की रचना के रूप में निर्धारित है। पाठ्यक्रम में पृथ्वीराज रासो का संक्षिप्त संपादित पाठ (संपादक: हजारीप्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह, साहित्य भवन, प्रयाग) लगा है।
इस लेख में आपको एक ही जगह मिलेगा: आदिकाल की पृष्ठभूमि, चंदबरदाई का जीवन-परिचय, रासो की परम्परा-भाषा-छंद, प्रामाणिकता और रचना-काल का विवाद, बानबेध समय का कथा-सार, पाठ का भावार्थ, काव्य-सौंदर्य, हिंदी साहित्य में चंदबरदाई का महत्व, परीक्षा-उपयोगी प्रश्न और FAQs।
अध्ययन-सुझाव: प्रामाणिकता, रचनाकार और तिथियों के मामले में विद्वानों में मतभेद हैं। परीक्षा में मतभेद वाले बिंदु पर हमेशा “परम्परा के अनुसार” या “अमुक विद्वान के अनुसार” लिखें, और अंत में अपना निष्कर्ष दें।

1. आदिकाल की पृष्ठभूमि | Background of the Adikal (Early Period)
राजनीतिक परिस्थितियाँ | Political Conditions
आदिकाल को समझने के लिए पहले उसका राजनीतिक माहौल देखना जरूरी है। हर्षवर्धन के बाद उत्तर भारत में कोई बड़ी केंद्रीय सत्ता नहीं बची थी। देश छोटे-छोटे राज्यों में बँट गया था। कन्नौज, दिल्ली, अजमेर, बुंदेलखंड, मेवाड़ जैसे कई राजपूत राज्य आपस में ही लड़ते रहते थे।
इस दौर की सबसे बड़ी कमजोरी थी केंद्रीय सत्ता का अभाव (Lack of Central Power)। हर राजा अपने राज्य को ही सब कुछ समझता था। इसीलिए पृथ्वीराज चौहान और जयचंद जैसे शक्तिशाली राजा भी एक साथ नहीं आ सके। परीक्षा में यह बिंदु अक्सर पूछा जाता है: राजपूतों की आपसी फूट (Mutual Conflict) विदेशी आक्रमणों की सफलता का एक प्रमुख कारण मानी जाती है।
दूसरी बड़ी बात थी सामंतवादी व्यवस्था (Feudal System) का मजबूत होना। राजा अपने अधीन छोटे-छोटे सामंतों को जमीन देता था। ये सामंत अपनी छोटी सेना रखते थे और मौके पर राजा का साथ देते थे, पर भीतर से स्वतंत्र रहना चाहते थे।
इसी समय उत्तर-पश्चिम से विदेशी आक्रमण शुरू हो गए। पहले महमूद गजनवी, फिर मुहम्मद गौरी। गौरी की भारत में रुचि केवल लूट तक सीमित नहीं थी, वह अपना शासन स्थापित करना चाहता था; तराइन के दूसरे युद्ध (1192) के बाद उत्तर भारत में तुर्क-सत्ता की नींव पड़ी। लगातार युद्धों का माहौल था, इसी कारण इस समय के साहित्य में तलवार, घोड़े और युद्ध का बखान इतना ज्यादा है। कवि या तो राजा के दरबार में रहते थे या युद्ध के मैदान में।
- राजनीतिक अस्थिरता: कोई स्थायी शांति नहीं।
- युद्धवादी संस्कृति: वीरता ही सबसे बड़ा गुण मानी गई।
- आश्रयदाता की जरूरत: कवियों को राजाओं की प्रशंसा करनी पड़ती थी, क्योंकि वही उनके संरक्षक थे।
सामाजिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ | Social & Cultural Conditions
ऊपर से राजा-महाराजा लड़ रहे थे और नीचे समाज जकड़ता जा रहा था। इस काल में जाति-व्यवस्था (Caste System) बहुत कठोर हो गई थी। छुआछूत और ऊँच-नीच की भावना बढ़ गई। लोग अपनी जाति और कुल को ही सब कुछ मानने लगे।
सामान्य जनता की हालत ठीक नहीं थी। सामंत और उनके सैनिक गाँवों से कर वसूलते थे। आम आदमी दोहरी मार झेल रहा था: एक राजा के युद्धों की और दूसरी सामंती शोषण की।
स्त्रियों की स्थिति को लेकर दो तरह की बातें दिखती हैं। एक तरफ रानियाँ जौहर (Jauhar) और सती जैसी प्रथाओं के लिए मजबूर थीं, तो दूसरी तरफ दरबारी संस्कृति में स्त्री को अक्सर भोग-विलास की वस्तु के रूप में देखा जा रहा था। नारी के प्रति यह दोहरा दृष्टिकोण आदिकालीन कविता में साफ दिखता है।
सांस्कृतिक रूप से यह समय उत्सव और वीरता के प्रदर्शन का था। तलवार की पूजा, घोड़े की पूजा, युद्ध से पहले देवी की आराधना आम थी। मनोरंजन के साधन भी युद्ध-केंद्रित थे, जैसे आखेट (Hunting) और शस्त्र-कौशल का प्रदर्शन।
- दरबारी संस्कृति (Court Culture) हावी थी: साहित्य आम जनता के लिए कम, राजा को प्रसन्न करने के लिए ज्यादा लिखा जाता था।
- वीरता और शृंगार साथ-साथ: एक तरफ युद्ध का जोश, दूसरी तरफ रनिवास में शृंगारिक वर्णन।
- लोक-जीवन से दूरी: जो साहित्य दरबार में लिखा गया, उसका गाँव-किसान के जीवन से सीधा संबंध कम था।
धार्मिक परिस्थितियाँ | Religious Conditions
धार्मिक माहौल भी उलझा हुआ था। इस समय तक बौद्ध धर्म (Buddhism) अपने मूल स्वरूप से भटक चुका था और उसमें तंत्र-मंत्र, चमत्कार जैसी बातें आ गई थीं। जनता का भरोसा उस पर से उठ रहा था। इसी खाली जगह को भरने के लिए कई मत-पंथ सामने आए:
- नाथ पंथ (Nath Panth) और सिद्ध संप्रदाय (Siddha Sampradaya): गोरखनाथ जैसे योगियों ने हठयोग, वैराग्य और भीतर की साधना पर जोर दिया। इनकी भाषा आम जनता के करीब थी।
- जैन धर्म (Jainism): राजस्थान और गुजरात में जैन साधुओं ने अपभ्रंश (Apabhramsha) में खूब नीति और धर्म का साहित्य लिखा। इनकी रचनाओं में अहिंसा और त्याग की बात है।
- वैष्णव और शैव मत: दक्षिण में शंकराचार्य के अद्वैत (Advaita) का असर था, पर उत्तर में भक्ति का वह रूप अभी नहीं आया था जो बाद में सूर-तुलसी में दिखता है।
- इस्लाम (Islam) का भारत में प्रवेश: आक्रमणकारियों के साथ इस्लाम आया। शुरुआती दौर में सत्ता-संघर्ष के कारण हिंदू और मुस्लिम समाज के बीच टकराव और दूरी बनी रही।
कुल मिलाकर धर्म जनता को जोड़ने की जगह कई खेमों में बाँट रहा था। इसी धार्मिक उथल-पुथल ने आगे चलकर भक्ति आंदोलन के लिए जमीन तैयार की।
आदिकालीन साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियाँ | Major Trends of Adikalin Literature
अब इन सब परिस्थितियों का असर साहित्य पर कैसे पड़ा, यह सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है।
- वीर रस की प्रधानता (Dominance of Veer Rasa): यह इस साहित्य की मुख्य पहचान है। लगभग हर बड़ी रचना में किसी राजा की वीरता, उसके युद्ध और उसकी विजय का बखान है। पृथ्वीराज रासो (Prithviraj Raso) इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।
- आश्रयदाताओं की प्रशंसा (Praise of Patrons): कवि चारण (Charan) और भाट (Bhat) थे। उनका काम राजा का यश गाना था। इसलिए कई बार इतिहास के साथ अतिशयोक्ति (Exaggeration) भी जुड़ गई। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि रासो ग्रंथों को पूरी तरह ऐतिहासिक क्यों नहीं मान सकते, यही कारण है।
- शृंगार और वीरता का मेल: युद्ध के वर्णन के बीच-बीच में राजा-रानी के प्रेम, नख-शिख वर्णन और विलास की बातें भी खूब आती हैं। इसे वीर और शृंगार का संयोग कहते हैं।
- भाषा की विविधता: इस काल में एक भाषा नहीं थी। तीन रूप मुख्य थे:
- डिंगल (Dingal): राजस्थानी वीर काव्य की भाषा, कर्कश और ओजस्वी।
- पिंगल (Pingal): ब्रज मिश्रित (राजस्थानी-ब्रज) भाषा, थोड़ी कोमल।
- अपभ्रंश (Apabhramsha): जैन और सिद्ध साहित्य की भाषा।
- साहित्य के रूप: मुख्यतः दो रूप मिलते हैं: प्रबंध काव्य (Prabandha Kavya) जैसे रासो ग्रंथ, और मुक्तक काव्य (Muktak Kavya) जैसे खुसरो की पहेलियाँ या सिद्धों के दोहे। रचना का उद्देश्य इतिहास लिखना कम, मनोरंजन और यशगान ज्यादा था।
- राष्ट्रीयता का अभाव: कवि पूरे भारत की बात नहीं करता था, अधिकतर अपने आश्रयदाता राजा के राज्य को ही देश समझता था।
| प्रवृत्ति | मुख्य लक्षण | उदाहरण |
|---|---|---|
| वीर काव्य / रासो | वीर रस, आश्रयदाता-प्रशंसा, प्रबंध रूप | पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो |
| सिद्ध-नाथ साहित्य | रहस्यवाद, हठयोग, मुक्तक/दोहा | सरहपा, गोरखनाथ |
| जैन साहित्य | नीति, अहिंसा, अपभ्रंश | जैन मुनियों के रास और चरित काव्य |
| लौकिक साहित्य | लोकजीवन, पहेलियाँ, मुक्तक | अमीर खुसरो |
Quick Summary (English): Adikal emerged in a time of political fragmentation, feudal wars and early foreign invasions. Society was caste-rigid and court-centred, while religion was divided among Naths, Siddhas, Jains and incoming Islam. Its literature is thus dominated by Veer Rasa, patron-praise, a mix of Veerta and Shringara, and uses Dingal, Pingal and Apabhramsha languages.
2. चंदबरदाई का जीवन-परिचय | Life of Chandbardai
जन्म, स्थान और पारिवारिक परिचय | Birth, Place & Family Background
चंदबरदाई के जीवन का कोई ठोस समकालीन ऐतिहासिक प्रमाण बहुत कम मिलता है। जो कुछ पता चलता है, वह पृथ्वीराज रासो के भीतर दिए गए संकेतों और बाद की जनश्रुतियों पर आधारित है। इसलिए हर तथ्य के साथ थोड़ा विवाद जुड़ा हुआ है।
जन्म-स्थान: परम्परा के अनुसार चंदबरदाई का जन्म लाहौर में माना जाता है। दिल्ली-अजमेर के शासक पृथ्वीराज से जुड़ने के बाद उनका अधिकांश जीवन दिल्ली-अजमेर क्षेत्र में बीता। परीक्षा में जन्म-स्थान के लिए “लाहौर (परम्परागत मत)” लिखना सुरक्षित है।
जन्म-तिथि: यहाँ भी मतभेद है। कुछ स्रोत लगभग 1148 ई. (विक्रम संवत् 1205 के आसपास) बताते हैं, जबकि परीक्षा-सामग्री में उनका समय वि.सं. 1225-1249 (लगभग 1168-1192 ई.) भी दिया जाता है। इसलिए किसी एक तिथि को अंतिम सत्य न मानें, “लगभग 12वीं सदी” लिखना ठीक रहता है।
परिवार: कहा जाता है कि वे भाट (Bhat) / चारण (Charan) परम्परा के जगात गोत्र में जन्मे थे। भाट का काम राजाओं का यश गाना और वंशावली याद रखना था। रासो में उन्हें षड्भाषा के ज्ञाता (Knower of Six Languages) और व्याकरण, काव्य, पुराण, ज्योतिष आदि का पंडित कहा गया है।
ध्यान दें: कुछ स्रोतों में पृथ्वीराज के समकालीन ग्रंथ पृथ्वीराज विजय (जयानक) में चंद का उल्लेख “पृथ्वीभट्ट” नाम से माना गया है, पर यह पहचान भी विद्वानों में विवादित है।
पृथ्वीराज चौहान से संबंध | Relationship with Prithviraj Chauhan
चंदबरदाई का नाम पृथ्वीराज चौहान के बिना अधूरा है। रासो की परम्परा में इनके लिए तीन शब्द एक साथ आते हैं: सखा, सामंत और राजकवि (Friend, Feudatory and Court Poet)।
रासो के अनुसार चंद और पृथ्वीराज बचपन के साथी थे। जब पृथ्वीराज दिल्ली-अजमेर के शासक बने, तो चंद उनके सबसे करीबी सलाहकार बन गए। वे युद्ध में साथ जाते थे, संधि-वार्ता में शामिल होते थे और राजकाज में सलाह भी देते थे। यानी कवि होने के साथ-साथ वे योद्धा और राजनीतिज्ञ की भूमिका में भी दिखाए गए हैं।
इनके संबंध की सबसे मार्मिक कथा अंत से जुड़ी है। रासो की कथा के अनुसार, जब मुहम्मद गौरी पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले गया, तो चंदबरदाई भी वहाँ पहुँचे और उन्होंने बानबेध प्रसंग रचा, जिसमें दृष्टिहीन पृथ्वीराज ने शब्दभेदी बाण से गौरी को मारा। ऐतिहासिक स्रोत इस कथा का समर्थन नहीं करते (विस्तार Section 6 में)। साहित्यिक दृष्टि से यह मित्रता और स्वामी-भक्ति का सबसे बड़ा उदाहरण बन गई है।
परीक्षा में आप लिख सकते हैं कि चंदबरदाई का पृथ्वीराज से संबंध केवल कवि-आश्रयदाता का नहीं, बल्कि जीवन-मरण के साथी का था।
रचनात्मक योगदान | Literary Contribution
चंदबरदाई की पहचान मुख्य रूप से एक ही ग्रंथ से है: पृथ्वीराज रासो (Prithviraj Raso)।
- यह ग्रंथ हिंदी का प्रथम महाकाव्य (First Epic) माना जाता है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने चंद को हिंदी का प्रथम महाकवि माना।
- यह रासो काव्य परम्परा (Raso Tradition) का सबसे प्रसिद्ध ग्रंथ है।
- रासो की विशालता: वृहद् रूपांतर में 69 समय (सर्ग/Cantos) हैं। हर समय किसी घटना पर केंद्रित है, जैसे आदिपर्व समय, कनवज्ज समय और अंतिम बानबेध समय।
- भाषा: पिंगल (राजस्थानी-ब्रज मिश्रित) भाषा, जिस पर डिंगल और अपभ्रंश का असर है।
- छंद: लगभग 68 प्रकार के छंद मिलते हैं। मुख्य छंद कवित्त (छप्पय), दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या हैं।
इनका योगदान सिर्फ कविता नहीं, इतिहास-बोध और सांस्कृतिक दस्तावेज के रूप में भी है। भले ही इतिहास के तौर पर रासो में अतिशयोक्ति हो, पर उस काल की वीरता, दरबारी संस्कृति और भाषा को समझने के लिए यह एक बड़ा स्रोत है।
लेखकत्व का प्रश्न: परम्परा के अनुसार रासो के उत्तरार्ध (अंतिम भाग) को चंद के पुत्र जल्हण (Jalhan) ने पूरा किया। कुछ परीक्षा-स्रोतों में चंद के 59 और जल्हण के 10 समय बताए जाते हैं। इस हिसाब से बानबेध (अंतिम समय) चंद की मृत्यु का वर्णन भी करता है, जो स्वयं कवि द्वारा अपनी मृत्यु का वर्णन होगा, इसलिए यह जल्हण-अंश माना जाता है। परीक्षा में यह बिंदु लिखने से उत्तर की गहराई बढ़ती है।

Quick Summary: Chandbardai, traditionally from Lahore and of Bhat/Charan lineage (Jagat gotra), was, according to the Raso, the childhood friend, feudatory and court poet of Prithviraj Chauhan. His principal work, Prithviraj Raso (69 Samays in the longest recension, including Banbedh Samay), is regarded as the first epic of Hindi, written in Pingal with Dingal influence. Tradition holds that his son Jalhan completed the last part.
3. पृथ्वीराज रासो: सामान्य परिचय | Prithviraj Raso: General Introduction
रासो काव्य-परंपरा | The Raso Poetic Tradition
रासो शब्द की व्युत्पत्ति पर विद्वानों में शुरू से मतभेद रहा है, और परीक्षा में यह प्रश्न सीधा पूछा जाता है। तीन प्रमुख मत बताए जाते हैं:
- रासक (Rasak) से: नृत्य-गान वाला गेय रूपक। हजारीप्रसाद द्विवेदी ने रासो को अपभ्रंश की रासक शैली से जोड़ा है।
- रसायण (Rasayan) से: युद्ध-कथा या सेना का वर्णन।
- राजसूय / राजयश (Rajsuya / Rajyash) से: राजा के यश का ग्रंथ।
जो भी अर्थ लें, बात एक ही पर आती है: रासो काव्य का मतलब है वीर राजा की जीवन-कथा को ओज के साथ गाना। यह चारण और भाट कवियों की परम्परा है। इस परम्परा में पृथ्वीराज रासो अकेला ग्रंथ नहीं है:
- खुमान रासो (Khuman Raso): चित्तौड़ के खुमान पर
- बीसलदेव रासो (Bisaldev Raso): नरपति नाल्ह द्वारा
- परमाल रासो (Parmal Raso) / आल्हा: महोबा के परमर्दिदेव (परमाल) की परम्परा से जुड़ा
इन सबकी कुछ साझा प्रवृत्तियाँ हैं: इतिहास और कल्पना का मेल, युद्धों का अतिशयोक्तिपूर्ण वर्णन, और अपने आश्रयदाता को नायक बनाकर पेश करना। पृथ्वीराज रासो इस पूरी परम्परा का सबसे बड़ा, सबसे प्रसिद्ध और सबसे विवादित ग्रंथ है।
रचना-शैली और विषयवस्तु | Style & Subject Matter
पृथ्वीराज रासो प्रबंध काव्य (Prabandha Kavya) है, यानी एक लंबी कथा जो कई भागों में बँटी है। इसे महाकाव्य का दर्जा दिया जाता है, हालांकि शास्त्रीय महाकाव्य के नियम यहाँ पूरे नहीं मिलते (नरोत्तम स्वामी जैसे विद्वान इसे मुक्तक काव्य भी कहते हैं)। ढाँचा समय (Samay) पर आधारित है, जो सर्ग या अध्याय जैसा है।
विषयवस्तु: पृथ्वीराज चौहान का जीवन-चरित: जन्म, संयोगिता से प्रेम और विवाह, कन्नौज के जयचंद से दुश्मनी, मुहम्मद गौरी से युद्ध, और अंत में गजनी में बंदी जीवन और बानबेध। रासो में पृथ्वीराज के अनेक विवाहों की कथा भी आती है (जैसे पद्मावती और संयोगिता के प्रसंग)।
रासो में तीन चीजें घुली-मिली हैं:
- ऐतिहासिक घटनाएँ, जैसे गौरी से युद्ध
- दरबारी शृंगार, जैसे महल, नख-शिख वर्णन, विवाह-उत्सव
- अलौकिक और अतिशयोक्ति, जैसे एक ही दिन में कई युद्ध जीत लेना, देवताओं का आना
इसलिए इसकी शैली में वीर रस (Veer Rasa) मुख्य है और शृंगार रस (Shringar Rasa) उसका सहायक बनकर चलता है।
रासो के संस्करण और रूपांतर | Recensions of the Raso
रासो की सैकड़ों पांडुलिपियाँ मिलती हैं और उनका पाठ एक-सा नहीं है। इसलिए मूल रासो कौन-सा है, यह प्रश्न विवाद का बड़ा कारण है। परीक्षा-साहित्य में प्रचलित वर्गीकरण:
| रूपांतर | आकार | विशेष |
|---|---|---|
| वृहद् (Brihat) | 69 समय, लगभग 16,306 छंद | श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित; नागरी प्रचारिणी सभा, काशी से 1905 में प्रकाशित |
| मध्यम (Madhyam) | लगभग 7,000 छंद | अप्रकाशित प्रति, 17वीं सदी की मानी जाती है |
| लघु (Laghu) | 19 समय, लगभग 3,500 छंद | अप्रकाशित प्रति (बीकानेर) |
| लघुत्तम (Laghuttam) | लगभग 1,300 छंद | दशरथ शर्मा द्वारा संपादित; वे इसे मूल के निकट मानते हैं |
सावधानी: अलग-अलग स्रोतों में इन आँकड़ों में थोड़ा अंतर मिलता है। परीक्षा में “लगभग” लिखें। “1 लाख छंद” जैसा कोई आँकड़ा विश्वसनीय स्रोत में नहीं मिलता, इसे न लिखें।
भाषा और छंद-विधान | Language & Metre
रासो की भाषा को भाषा-शास्त्री पिंगल (Pingal) कहते हैं, जो राजस्थानी-मिश्रित ब्रजभाषा है, और उस पर डिंगल (Dingal) का असर है। दशरथ शर्मा इसे प्राचीन राजस्थानी के निकट मानते हैं। चंदबरदाई को षड्भाषा का ज्ञाता कहा गया है, इसलिए संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश, डिंगल, पिंगल और ब्रज के शब्द मिलते हैं। कहीं-कहीं अरबी-फारसी शब्द भी आते हैं, जैसे सुल्तान, खान।
छंद-विधान रासो की सबसे बड़ी ताकत है। रासो में लगभग 68 प्रकार के छंद मिलते हैं; मुख्य छंद कवित्त (छप्पय), दूहा, तोमर, त्रोटक, गाहा और आर्या हैं। छप्पय को ही आधुनिक युग में कवित्त कहा गया। शिवसिंह सेंगर ने रासो को “छंदों का अजायबघर” कहा, और रामस्वरूप चतुर्वेदी ने चंद को “छप्पय सम्राट” कहा।
- युद्ध-वर्णन के लिए कवित्त और छप्पय, क्योंकि इनमें जोश और ओज है।
- नीति या सूक्ति की बात के लिए दूहा, क्योंकि यह छोटा और मारक है।
- कथा को आगे बढ़ाने के लिए गाहा और आर्या जैसे प्राकृत-अपभ्रंश छंद।
अलंकारों में अनुप्रास और यमक प्रमुख हैं, और अतिशयोक्ति भी बहुत मिलती है।
रचना-काल और प्रामाणिकता का विवाद | The Authenticity & Dating Debate
यह हिंदी साहित्य के इतिहास का सबसे चर्चित विवाद है। सवाल है: क्या पृथ्वीराज रासो चंदबरदाई ने 12वीं सदी में लिखा था, या यह बाद में जोड़ा-बढ़ाया गया ग्रंथ है?
विवाद की शुरुआत: डॉ. बूलर (Bühler) ने 1875 में जयानक कृत पृथ्वीराज विजय (समकालीन संस्कृत काव्य) को आधार बनाकर रासो को अप्रामाणिक माना। रासो में तिथियाँ और घटनाएँ इतिहास से मेल नहीं खातीं।
परीक्षा-साहित्य में प्रचलित तीन वर्ग:
| वर्ग | प्रमुख विद्वान | तर्क |
|---|---|---|
| प्रामाणिक (Authentic) | श्यामसुंदर दास, मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या, मिश्रबंधु, दशरथ शर्मा (लघुत्तम रूपांतर के संदर्भ में), अयोध्याप्रसाद सिंह ‘हरिऔध’ | भाषा की गड़बड़ी लिपिकारों की भूल है; पंड्या ने संवतों की संगति के लिए “आनंद संवत्” की कल्पना की |
| अर्द्ध-प्रामाणिक (Semi-authentic) | हजारीप्रसाद द्विवेदी, मुनि जिनविजय, सुनीतिकुमार चटर्जी, अगरचंद नाहटा | मूल कथा चंद की है, पर बाद के भाटों ने बहुत कुछ जोड़ दिया। द्विवेदी के अनुसार रचना शुक-शुकी संवाद शैली में हुई थी; जिन सर्गों में यह शैली नहीं मिलती, उन्हें प्रक्षिप्त मानना चाहिए |
| अप्रामाणिक (Unauthentic) | डॉ. बूलर, रामचंद्र शुक्ल, गौरीशंकर हीराचंद ओझा, कविराजा श्यामलदास, मुरारिदान | भाषा 12वीं सदी की नहीं लगती; ऐतिहासिक गलतियाँ बहुत हैं। शुक्ल ने इसे “जाली ग्रंथ” कहा |

सावधानी: विद्वानों के वर्गीकरण अलग-अलग पुस्तकों में थोड़े भिन्न मिलते हैं। परीक्षा में मुख्य नाम लिखें: श्यामसुंदर दास (प्रामाणिक), द्विवेदी (अर्द्ध-प्रामाणिक), बूलर, शुक्ल, ओझा (अप्रामाणिक)।
रचना-काल पर आधुनिक शोध: अधिकांश आधुनिक विद्वान रासो को पृथ्वीराज के समय (12वीं सदी) की रचना नहीं मानते। इसकी भाषा बाद के काल की ओर संकेत करती है, और वर्तमान पाठ में 13वीं सदी के राजा समरसिंह (समर सिंह) का उल्लेख पृथ्वीराज के समकालीन के रूप में मिलता है, जो कालक्रम की गड़बड़ी है। रासो की सबसे पुरानी उपलब्ध प्रतियाँ 16वीं सदी की हैं। नामवर सिंह, नरोत्तम स्वामी और सिंथिया टैलबोट जैसे विद्वान इसे 16वीं सदी (अकबर के काल) के आसपास का मानते हैं, जबकि आर.वी. सोमानी जैसे विद्वान मूल रासो का काल लगभग 1235 ई. मानते हैं।
आज सबसे व्यापक निष्कर्ष यह है कि रासो में कोई पुरानी मूल परत हो सकती है, पर वर्तमान रूप में बाद की कई परतें (प्रक्षिप्त अंश/Interpolations) जुड़ चुकी हैं और इसे इतिहास-स्रोत की तरह नहीं पढ़ा जा सकता।
संपादित पाठ (हजारीप्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह) | The Edited Text
विवाद और पाठ-भेदों के कारण छात्रों के लिए संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो तैयार किया गया, जिसके संपादक हजारीप्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह हैं (साहित्य भवन, प्रयाग)। DU के Unit 1 में इसी संपादित पाठ से बानबेध समय का अंश पढ़ाया जाता है। संपादित पाठ का उद्देश्य विशाल और विवादित ग्रंथ में से विद्यार्थियों के लिए पठनीय और साहित्यिक दृष्टि से महत्वपूर्ण अंश उपलब्ध कराना है।
परीक्षा-सुझाव: संपादन-पद्धति के बारे में (कौन-से अंश किस आधार पर चुने गए) केवल उतना ही लिखें जितना आपकी पाठ्य-पुस्तक की भूमिका में दिया है। नामवर सिंह की एक अलग पुस्तक पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य भी है, जिसमें डिंगल-पिंगल तत्वों का भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण है।
Quick Summary: Prithviraj Raso belongs to the Raso tradition of eulogistic warrior poetry alongside Khuman Raso and Bisaldev Raso. Written in Pingal with Dingal influence and in varied metres (Kavitt/Chhappay, Duha, Tomar, Trotak, Gaha, Arya), it exists in four recensions from about 1,300 to about 16,300 verses. Scholars divide into authentic, semi-authentic (Dwivedi) and unauthentic (Bühler, Shukla, Ojha) camps; most modern scholars date the present text much later than the 12th century. DU prescribes the abridged edited text by Hazariprasad Dwivedi and Namvar Singh.
4. बानबेध समय: कथा-सार और संदर्भ | Banbedh Samay: Story Summary & Context
कथा का स्रोत: नीचे का कथा-सार रासो की कथा के अनुसार है। इतिहासकारों के स्रोतों में यह घटना इस रूप में नहीं मिलती।
प्रसंग की पृष्ठभूमि | Background of the Episode
बानबेध समय रासो का अंतिम और सबसे मार्मिक समय है। इसे समझने के लिए पहले यह देखना होगा कि इसके ठीक पहले क्या हुआ।
दिल्ली-अजमेर के शासक पृथ्वीराज चौहान और गजनी-गोर के शासक मुहम्मद गौरी के बीच कई बार युद्ध होता है। पहली लड़ाई (1191) में पृथ्वीराज जीतते हैं, पर अगले वर्ष तराइन के दूसरे युद्ध (1192) में उनकी हार होती है। रासो की कथा में इस हार का एक कारण कन्नौज के जयचंद की दुश्मनी और आपसी फूट भी बताया जाता है।
रासो की कथा के अनुसार हार के बाद पृथ्वीराज को बंदी बनाकर गजनी ले जाया जाता है, वहाँ उन्हें अंधा कर दिया जाता है और कारागार में डाल दिया जाता है। यहाँ एक महान वीर राजा का जीवन सबसे अंधेरे मोड़ पर पहुँच जाता है।
इतिहास क्या कहता है: ऐतिहासिक स्रोतों के अनुसार तराइन (1192) के बाद पृथ्वीराज पकड़े गए और कुछ समय बाद मार दिए गए। कहा जाता है कि उन्हें कुछ समय के लिए अजमेर में घुरी-अधीनता के अंतर्गत शासन करने दिया गया। गजनी में अंधे किए जाने और बानबेध की कथा इन स्रोतों में नहीं मिलती।
अब चंदबरदाई की भूमिका शुरू होती है। रासो के अनुसार, जब चंद को पता चलता है कि उनका सखा और स्वामी गजनी में बंदी है, तो वे किसी तरह गजनी पहुँचते हैं। बानबेध की पूरी पृष्ठभूमि अपमान और प्रतिशोध पर टिकी है: एक तरफ दृष्टिहीन किया गया भारतीय सम्राट, दूसरी तरफ विजय के घमंड में बैठा गौरी, और बीच में एक कवि की चतुराई।
घटनाक्रम का सार | Summary of Events
- कवि का प्रवेश: गजनी पहुँचकर चंदबरदाई गौरी के दरबार में अपनी काव्य-प्रतिभा दिखाते हैं। गौरी प्रसन्न होता है।
- प्रस्ताव: चंद धीरे से बताते हैं कि उनके मित्र पृथ्वीराज शब्दभेदी बाण (Shabd-bhedi Ban) के ज्ञाता हैं, यानी वे बिना देखे, केवल आवाज सुनकर निशाना लगा सकते हैं।
- गौरी की उत्सुकता: गौरी को यह बात अजीब भी लगती है और कौतूहल भी होता है। वह यह कला देखना चाहता है। सभा लगती है और पृथ्वीराज को कारागार से लाया जाता है।
- संकेत: गौरी एक ऊँचे स्थान पर बैठता है। चंद कविता के बहाने पृथ्वीराज को गौरी की दिशा और दूरी का संकेत देते हैं। रासो परम्परा में यह संकेत “चार बांस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता ऊपर सुलतान है, मत चूके चौहान” जैसे दोहे में मिलता है।
- बानबेध: गौरी के बोलने पर उसकी आवाज सुनकर पृथ्वीराज बाण छोड़ते हैं और गौरी मारा जाता है।
- आत्म-बलिदान: रासो की कथा के अनुसार इसके बाद पृथ्वीराज और चंदबरदाई एक-दूसरे को कटार मारकर प्राण दे देते हैं, ताकि शत्रु के हाथों और अपमानित न होना पड़े। यहीं रासो की कथा समाप्त होती है।
| बिंदु | रासो की कथा | ऐतिहासिक स्रोत |
|---|---|---|
| तराइन का दूसरा युद्ध | पृथ्वीराज की हार | हार, 1192 ई. (सर्वमान्य) |
| पृथ्वीराज का अंत | गजनी में बंदी, अंधा किया जाना, बानबेध, आत्म-बलिदान | पकड़े जाने के बाद मारे गए (अजमेर में कुछ समय घुरी-अधीन शासन की चर्चा) |
| गौरी की मृत्यु | पृथ्वीराज के बाण से, गजनी में | 1206 ई. में हत्या; हमलावरों के बारे में मतभेद |
| कवि की भूमिका | चंद की चतुराई से यह सब संभव हुआ | ऐसा कोई समकालीन प्रमाण नहीं |
परीक्षा के लिए याद रखिए: यह प्रसंग वीरता, मित्रता और स्वामी-भक्ति का चरम उदाहरण है, भले ही ऐतिहासिक रूप से इस पर प्रश्नचिह्न लगे हों।

Quick Summary: In the Raso’s narrative, after Prithviraj’s defeat at the Second Battle of Tarain and his blinded captivity in Ghazni, Chandbardai reaches Ghazni and arranges a demonstration of Prithviraj’s Shabd-bhedi Ban skill. Guided by Chand’s poetic signal, the blind Prithviraj kills Ghori, and both friends sacrifice their lives. Historical sources do not corroborate this account.
5. पाठ-विश्लेषण (भावार्थ और व्याख्या) | Text Analysis (Meaning & Explanation)
पाठ के बारे में: नीचे दिए गए पद और उनकी व्याख्या सामान्य भावार्थ पर आधारित हैं। पाठ-भेद के कारण शब्दों की वर्तनी और कहीं-कहीं अर्थ अलग-अलग संस्करणों में भिन्न हो सकते हैं। परीक्षा में अपनी पाठ्य-पुस्तक के पाठ को ही आधार बनाएँ।
कवित्त (10–11): भावार्थ और व्याख्या | Kavitt (10–11)
पद:
प्रथम मुक्कि दरबार । लज्ज संर सुरतानी।। किहि थान लोइ संभरि घनी । कहौ सुबत्त लज्जौ न लजि।।
यह बानबेध समय का शुरुआती हिस्सा है, जहाँ चंदबरदाई गजनी के दरबार में पहली बार प्रवेश करते हैं।
भावार्थ: चंद एक चतुर कूटनीतिज्ञ की तरह बात शुरू करते हैं। वे सीधे यह नहीं कहते कि वे अपने बंदी राजा से मिलने आए हैं। वे सुल्तान से निर्भय होकर बात कहने की अनुमति माँगते हुए “संभरि घनी” (सांभर के स्वामी, अर्थात् पृथ्वीराज) का प्रसंग छेड़ते हैं। पृथ्वीराज को “सांभर का स्वामी” इसलिए कहा गया क्योंकि चौहान वंश की एक शाखा शाकंभरी (सांभर) से जुड़ी थी।
विशेष: यहाँ चंद की वाक्-चतुरता (Verbal Cleverness) परीक्षा के लिए महत्वपूर्ण है। वे गौरी को उकसाते भी हैं और अपनी बात के लिए जगह भी बनाते हैं। कवित्त छंद का ओज दरबार के वातावरण को गंभीर बनाता है।
दूहा (20–33, 49): भावार्थ और व्याख्या | Duha (20–33, 49)
पद:
हम अबुद्धि सुरतान इह । भट्ट भाष सुष काज।। प्रथम राज पासहु गयौ। जब रुक्कयौ दह हथ्थ।। चवै चंद बरदाइ इम। सुति मीरन सुनतान।। दे कमान चौहान कौं। साहि दियै कछु दान।।
और इसी प्रसंग का सबसे प्रसिद्ध संकेत-वाला दूहा, जो लोक में सबसे अधिक उद्धृत होता है:
चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण। ता ऊपर सुलतान है, मत चूके चौहान।।

भावार्थ: पहले दूहे में चंद स्वयं को विनम्र बताते हुए (“हम अबुद्धि”) सुल्तान से निवेदन करते हैं। दूसरे में वे गौरी से आग्रह करते हैं कि चौहान को कमान दी जाए, और बहाने के रूप में सुल्तान की उदारता का हवाला देते हैं। असली उद्देश्य दूसरा है।
प्रसिद्ध दूहे “चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण” में सामान्य व्याख्या के अनुसार चंद पृथ्वीराज को दूरी और ऊँचाई का संकेत दे रहे हैं: सुल्तान इतनी दूरी और इतनी ऊँचाई पर बैठा है। “मत चूके चौहान” में मित्रता, भरोसा और आदेश तीनों हैं।
परीक्षा में लिखिए: एक ही दोहे के दो श्रोता हैं। गौरी के लिए यह कविता है और पृथ्वीराज के लिए दिशा-निर्देश। यही इस प्रसंग का सबसे बड़ा काव्य-चमत्कार है। (यह दूहा लोक में इतना प्रसिद्ध है कि इसके पाठ-भेद भी मिलते हैं।)
पद्धरी (50–53): भावार्थ और व्याख्या | Paddhari (50–53)
पद:
संगहें पान कम्मान राज। उभ्भरे अंग अंतर विराज।। निसुरत्ति आनि दिय साहि हथ्थ। तरकस्स तीर गोरी गुरथ्थ।।
पद्धरी (Paddhari) एक तीव्र लय वाला छंद है। जब कथा में गति और तनाव दोनों बढ़ाने हों, तब इसका प्रयोग उपयुक्त लगता है।
भावार्थ: पहली पंक्ति के सामान्य अर्थ में राजा (पृथ्वीराज) धनुष को थामते हैं और उनके अंग-अंग में एक नई आभा जाग उठती है: दृष्टिहीन होने पर भी धनुष हाथ में आते ही उनका पुराना राज-तेज लौट आता है। दूसरी पंक्ति में धनुष-बाण के गौरी (या साहि) के हाथ से दिए जाने और तरकश-तीर की तैयारी का संकेत है। इसके शब्दार्थ (विशेषकर अंतिम पद) पाठ-भेद के कारण कठिन हैं, इसलिए शब्द-दर-शब्द अर्थ के लिए अपनी पाठ्य-पुस्तक की टीका देखें।
विशेष: यहाँ शारीरिक अंधत्व और मानसिक एकाग्रता (Physical Blindness vs Mental Concentration) का विरोध है। पृथ्वीराज देख नहीं सकते, पर सुन सकते हैं, यानी आवाज ही उनकी आँख बन जाती है। वीर रस के साथ करुण रस की छाया भी है, क्योंकि पाठक जानता है कि यह अंतिम बाण है। लिखिए: यह प्रसंग केवल युद्ध-कौशल नहीं, आत्म-सम्मान की पुनर्प्राप्ति है।
कवित्त (54, 55, 56): भावार्थ और व्याख्या | Kavitt (54–56)
पद:
ग्रहिय तीर गोरिस्स । कीन बिन इच्छ अप्प कर ।। श्रृगांर वीर करूना विभछ । भय अद्भुत इसंत सम ।।
और लोक में प्रचलित समापन-पंक्तियाँ:
अबकी चढ़ी कमान, को जाने कब फिर चढ़ै। जनि चुक्कै चौहान, इक्के मारिय इक्क सर।।
भावार्थ: पहली पंक्ति सामान्य अर्थ में बाण के ग्रहण किए जाने और निशाने के संकल्प का संकेत देती है। दूसरी पंक्ति में रसों की सूची जैसी पदावली मिलती है (शृंगार, वीर, करुण, वीभत्स, भय, अद्भुत, शांत), जिसकी व्याख्या पाठ-भेद और टीका पर निर्भर करती है। परीक्षा में इस पंक्ति के आधार पर इतना लिखना सुरक्षित है कि इस अंश में वीर, अद्भुत और करुण रस की प्रधानता दिखाई देती है।
अंतिम कवित्तों में बाण छूटता है, गौरी की आवाज सुनते ही पृथ्वीराज निशाना लगाते हैं और गौरी गिरता है। रासो की कथा के अनुसार फिर दोनों मित्र जानते हैं कि अब बचना असंभव है, इसलिए एक-दूसरे को कटार मारकर आत्म-बलिदान कर देते हैं। इसलिए यह समापन केवल वीरता की जीत नहीं, मित्रता और स्वामी-धर्म की पराकाष्ठा है। इसी कारण बानबेध समय को रासो का सबसे मार्मिक समय कहा जाता है।
Quick Summary: Kavitt 10-11 shows Chand’s clever entry; Duha 20-33 and the famous “Char bans chaubis gaj” doha carry the coded signal for the Shabd-bhedi Ban; Paddhari 50-53 depicts Prithviraj regaining vigour on touching the bow; Kavitt 54-56 build to the fatal shot and mutual sacrifice, blending Veer, Adbhut and Karun Rasa. Word-level readings vary across editions, so students should follow their prescribed text.
6. काव्य-सौंदर्य | Poetic Beauty & Craft
रस-निरूपण (वीर, अद्भुत, करुण) | Rasa Analysis
बानबेध समय में एक साथ कई रस मिलते हैं, पर सबका केंद्र पृथ्वीराज का आत्म-सम्मान है।
| रस | स्थान | आधार |
|---|---|---|
| वीर (प्रधान) | धनुष हाथ में आने पर पृथ्वीराज में तेज का लौटना; बाण का संधान | उत्साह (स्थायी भाव) |
| अद्भुत (सहायक) | दृष्टिहीन का केवल आवाज से लक्ष्य-भेदन; “चार बाँस चौबीस गज” का संकेत | विस्मय |
| करुण (पर्यवसान) | बाण के बाद दोनों मित्रों का आत्म-बलिदान | शोक |
- वीर रस (Veer Rasa): अंधा होने के बाद भी जब पृथ्वीराज कमान माँगते हैं, तो उत्साह का भाव जागता है। “संगहें पान कम्मान राज। उभ्भरे अंग अंतर विराज” में तेज का लौटना वीर रस का संचारी रूप है।
- अद्भुत रस (Adbhut Rasa): शब्दभेदी बाण स्वयं में चमत्कार है। बिना आँखों के आवाज सुनकर निशाना लगाना दरबार को ही नहीं, पाठक को भी चकित करता है। प्रसिद्ध दोहा इसी अद्भुत को व्यावहारिक संकेत का रूप देता है।
- करुण रस (Karun Rasa): दोनों मित्र जानते हैं कि बचना नहीं है। यह वीरता की जीत है, पर कीमत जीवन देकर चुकानी पड़ती है।
- शृंगार: पूरे रासो में वीर और शृंगार दोनों प्रधान हैं (कनवज्ज और पद्मावती जैसे प्रसंगों में), पर बानबेध समय में शृंगार गौण है। यहाँ का भाव-सौंदर्य मुख्यतः सखा-भाव (मित्रता) का है, जो शृंगार रस नहीं, बल्कि भक्ति/सख्य-भाव के निकट है।
परीक्षा में लिखिए: बानबेध में वीर मुख्य है, अद्भुत सहायक, और करुण में उसका पर्यवसान होता है।
भाषा-शैली | Language & Style
बानबेध समय की भाषा मुख्यतः पिंगल (Pingal) है, जिस पर डिंगल (Dingal) का गहरा रंग है। चंद को षड्भाषा का ज्ञाता कहा गया है, इसलिए संस्कृत, प्राकृत और फारसी के शब्द भी सहज आ जाते हैं, जैसे सुल्तान, मीर, कमान, तरकस।
शैली की दो बड़ी खासियत हैं:
- संकेत-शैली (Allusive Style): चंद सीधे नहीं कहते, वे कविता में नाप-जोख छुपा देते हैं। “ता ऊपर सुलतान है” सुनने में कविता है, पर पृथ्वीराज के लिए एक संकेत है।
- संवाद-प्रधान शैली (Dialogic Style): पूरा समय दरबार में संवादों से चलता है, कभी चंद गौरी से बोलते हैं, कभी पृथ्वीराज से। इससे नाटकीयता बनी रहती है।
“दे कमान चौहान कौं। साहि दियै कछु दान” जैसी पंक्ति में भाषा सीधी है, पर अर्थ गहरा। यही कारण है कि इसे चारण शैली (Charan Style) का अच्छा उदाहरण कहा जाता है।
छंद और अलंकार | Metre & Figures of Speech
बानबेध समय में छंद केवल लय नहीं, अर्थ भी बदलता है। तीन छंद मुख्य हैं:
| छंद | कब प्रयुक्त | बानबेध में उदाहरण/भूमिका |
|---|---|---|
| कवित्त (Kavitt) | जोश, तनाव और वर्णन के लिए | दरबार-प्रवेश और अंतिम प्रसंग; लंबी लय से गंभीरता |
| दूहा (Duha) | गहरी, सांकेतिक बात दो पंक्तियों में | “चार बाँस चौबीस गज” वाला दोहा; याद रखने और संकेत छुपाने दोनों के लिए उपयुक्त |
| पद्धरी (Paddhari) | कथा की गति तेज करने के लिए | धनुष उठाने का प्रसंग; तेज चाल से पृथ्वीराज की फुर्ती |
अलंकार (Alankar):
- अनुप्रास (Anupras): ध्वनि की आवृत्ति, जैसे “संगहें पान कम्मान राज” में ध्वनियों की लय।
- अतिशयोक्ति (Atishayokti): अंधे व्यक्ति का इतना सटीक निशाना काव्य-सत्य है, इतिहास-सत्य नहीं।
- व्यंग्य / अर्थ-गोपन: चंद गौरी की प्रशंसा के बहाने उसे ऊँचे आसन पर बैठाते हैं और दोहे में दो अर्थ छुपाते हैं।
परीक्षा में याद रखिए: छंद-वैविध्य (Variety of Metres) और अर्थ-गोपन ही बानबेध का मुख्य शिल्प है।
ऐतिहासिकता बनाम काव्यात्मकता | Historicity vs. Poetic Imagination
यह सबसे संवेदनशील बिंदु है और अक्सर 10 अंक के प्रश्न में पूछा जाता है: क्या बानबेध सच में हुआ था?
इतिहास की दृष्टि से: तराइन के दूसरे युद्ध (1192) के बाद पृथ्वीराज की मृत्यु मानी जाती है, जबकि गौरी की मृत्यु 1206 में हुई। दोनों तिथियों में लगभग 14 वर्ष का अंतर है, इसलिए गजनी में पृथ्वीराज के हाथों गौरी-वध ऐतिहासिक रूप से प्रमाणित नहीं माना जाता। बूलर, श्यामलदास जैसे विद्वानों ने ऐसी ही असंगतियों के कारण रासो को अप्रामाणिक कहा।
काव्य की दृष्टि से: यह घटना काव्यात्मक न्याय (Poetic Justice) है। एक महान वीर को इतिहास में हार मिली, पर कवि ने कल्पना में उसे अंतिम जीत दिलाई। कवि का उद्देश्य इतिहास लिखना नहीं, बल्कि नायक का गौरव बचाना था।
| इतिहास देता है | काव्य देता है |
|---|---|
| हार, कैद, अपमान | शब्दभेदी विद्या, मित्र की चतुराई, अंतिम प्रतिशोध और आत्म-बलिदान |
द्विवेदी जैसे आलोचक रासो को अर्द्ध-प्रामाणिक कहते हैं: मूल भाव पुराना हो सकता है, पर रूप बाद में सजाया गया। परीक्षा में लिखिए: बानबेध समय को इतिहास की कसौटी पर नहीं, काव्य के प्रयोजन की कसौटी पर परखना चाहिए। यह भारतीय मन का वह सपना है जहाँ वीर हारकर भी नहीं हारता।

Quick Summary: Banbedh excels in Rasa with Veer as dominant, Adbhut through the Shabd-bhedi skill, and Karun in the final sacrifice. Its language is Pingal with Dingal influence, in a dialogic, coded style. Metres (Kavitt, Duha, Paddhari) change with mood and are enriched by Anupras and Atishayokti. Historically doubtful, the episode succeeds as poetic justice and an idealisation of friendship and honour.
7. हिंदी साहित्य में चंदबरदाई का महत्व | Chandbardai’s Importance in Hindi Literature
क्या एक ही ग्रंथ लिखने वाला कवि इतना महत्वपूर्ण हो सकता है कि हिंदी साहित्य के इतिहास की चर्चा उसी से शुरू हो? इसका जवाब ही चंद का महत्व है।
- प्रथम महाकवि: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने चंदबरदाई को हिंदी का प्रथम महाकवि और पृथ्वीराज रासो को हिंदी का प्रथम महाकाव्य माना। शुक्ल जी रासो के वर्तमान रूप की प्रामाणिकता पर संदेह करते थे, फिर भी वीरगाथा काल की चर्चा में इसे केंद्र में रखते हैं। मिश्रबंधु ने भी चंद को हिंदी का प्रथम वास्तविक महाकवि कहा।
- रासो परम्परा का शिखर: रासो केवल युद्ध की कथा नहीं, चारण कवियों की पूरी शैली है। इस शैली को भाषा, छंद और रस, तीनों दृष्टि से समृद्ध करने का श्रेय रासो को दिया जाता है। नामवर सिंह ने चंद को “छंदों का राजा” कहा है।
- भाषा का सेतु: चंद ने डिंगल की ओजस्विता और पिंगल की कोमलता को साधा। अपभ्रंश से हिंदी की ओर आने की कड़ी में रासो की भाषा विशेष महत्व रखती है, इसलिए नामवर सिंह की पुस्तक पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य में इसका भाषा-वैज्ञानिक विश्लेषण मिलता है।
- सांस्कृतिक दस्तावेज (Cultural Document): रासो में राजपूत दरबार, युद्ध-नीति, विवाह-परम्परा, नारी की स्थिति और सामंती जीवन का चित्र मिलता है। नामवर सिंह ने रासो को उस युग की सांस्कृतिक परिस्थितियों का बृहद्कोश और मध्ययुगीन भारतीय समाज का काव्यात्मक इतिहास कहा है। अतिशयोक्ति के बावजूद उस काल की मानसिकता समझने के लिए यह मूल्यवान स्रोत है।
- नैतिक आदर्श: बानबेध समय हिंदी में मित्रता और स्वामी-भक्ति का सबसे ऊँचा आदर्श बन गया। “चार बाँस चौबीस गज…” वाला दोहा आज भी लोक-जीवन में उद्धृत होता है।
परीक्षा में चार बिंदु जरूर लिखिए: हिंदी के प्रथम महाकाव्य के रचयिता, रासो परम्परा के शिखर कवि, डिंगल-पिंगल के माध्यम से भाषा-सेतु का निर्माण, और वीर रस के स्थायी प्रतिमान की स्थापना।
Quick Summary: Chandbardai is regarded as Hindi’s first epic poet, and the Raso as a key text of early Hindi literary history. He carried the Raso tradition to its peak, bridged Apabhramsha and Hindi through Dingal-Pingal, and preserved the culture of the early medieval Rajput court. Banbedh Samay remains an enduring ideal of friendship, loyalty and Veer Rasa.
8. समकालीन प्रासंगिकता | Contemporary Relevance
बानबेध का दोहा और चंदबरदाई-पृथ्वीराज की कथा आज भी लोक-स्मृति, मंच और सिनेमा में जीवित है। 2022 में प्रदर्शित हिंदी फ़िल्म सम्राट पृथ्वीराज को पृथ्वीराज रासो पर आधारित बताया गया। इसी दौर में सोशल मीडिया पर “चार बाँस” के नाप (बाँस और गज की लंबाई, दूरी की गणना) को लेकर बहसें भी चलीं।
छात्रों के लिए इसका सबक यह है कि लोकप्रिय स्मृति और आलोचनात्मक अध्ययन अलग चीजें हैं। दोहे की गणित (कितने गज, कितने बाँस) पर बहस उतनी उपयोगी नहीं, जितना यह समझना कि:
- यह पद संकेत-शैली का उदाहरण है, जहाँ कविता में सूचना छुपाई गई है;
- रासो की प्रामाणिकता संदिग्ध है, इसलिए दोहे को ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं, काव्यात्मक सत्य की तरह पढ़ना चाहिए;
- परीक्षा में उत्तर का आधार आलोचकों के मत और पाठ का विश्लेषण होगा, फ़िल्म या सोशल मीडिया की व्याख्या नहीं।
9. संक्षिप्त सारांश | Key Takeaways (English)
This unit covers DU DSC-1: Hindi Poetry (Adikal and Nirgun Bhakti), focusing on Chandbardai’s Prithviraj Raso: Banbedh Samay.
- Background of Adikal: Political fragmentation, feudalism, Rajput conflicts and early Turkish invasions; a caste-rigid, court-centred society; religion divided among Nath-Siddha, Jain, remnants of Buddhism and incoming Islam. Literature: Veer Rasa-dominant, patron-praise, Dingal-Pingal-Apabhramsha languages.
- Life of Chandbardai: Traditionally born in Lahore (dates disputed: c. 1148 / 1168 CE), of Bhat/Charan tradition, Jagat gotra. According to the Raso he was Prithviraj’s friend, feudatory and court poet. Tradition credits his son Jalhan with completing the last part.
- Prithviraj Raso: Raso tradition (with Khuman Raso, Bisaldev Raso); Prabandha Kavya / Mahakavya; 69 Samays in the longest recension (about 16,300 verses), shorter recensions of about 7,000, 3,500 and 1,300 verses; Pingal language with Dingal influence; about 68 metres. Authenticity: authentic (Shyamsundar Das and others), semi-authentic (Dwivedi and others), unauthentic (Bühler, Shukla, Ojha and others). Most modern scholars date the present text much later than the 12th century. DU prescribes the abridged edited text (Dwivedi and Namvar Singh).
- Banbedh Samay: In the Raso’s narrative, after the defeat at the Second Battle of Tarain (1192), the blinded Prithviraj is taken to Ghazni; guided by Chand’s coded doha (“Char bans chaubis gaj…”), he kills Ghori with a sound-directed arrow, and both friends sacrifice their lives. Historical sources do not support this account (Ghori died in 1206).
- Poetic craft: Veer dominant, Adbhut auxiliary, Karun as culmination; dialogic and allusive style; Kavitt, Duha and Paddhari; Anupras and Atishayokti; historically doubtful but strong as poetic justice.
- Importance: First epic of Hindi (Shukla), summit of the Raso tradition, a language bridge from Apabhramsha to Hindi, and an enduring ideal of friendship and honour.
निष्कर्ष | Conclusion
बानबेध समय की सबसे बड़ी शक्ति उसकी काव्य-योजना है: संकेत में छुपा अर्थ, छंदों का बदलता तेवर और वीर-अद्भुत-करुण का संगम। इतिहास की कसौटी पर यह प्रसंग कमजोर है, पर काव्य की कसौटी पर यह हिंदी के आदिकाल का एक अत्यंत प्रभावशाली अंश है। परीक्षा में सफलता के लिए तीन चीजें साथ रखें: पाठ की सटीक व्याख्या, प्रामाणिकता के विवाद में अलग-अलग मत, और “काव्यात्मक न्याय” जैसा स्पष्ट निष्कर्ष।
University of Delhi Previous Year Questions
University of Delhi Previous Year Questions
Section A — Short Answer Questions (5–7 अंक)
1 बानबेध समय में चंदबरदाई की चतुराई पर टिप्पणी लिखिए। +
Hint: संकेत-शैली, दोहे के दो श्रोता, गौरी के सामने “कविता”।
Answer Focus: “चार बाँस चौबीस गज” वाला दोहा; कवि की दोहरी भूमिका; अर्थ-गोपन। Probable
2 रासो काव्य परम्परा में पृथ्वीराज रासो का स्थान निर्धारित कीजिए। +
Hint: रासो शब्द के मत, अन्य रासो ग्रंथ, महाकाव्यत्व।
Answer Focus: खुमान रासो, बीसलदेव रासो, परमाल रासो से तुलना; चारण शैली का शिखर। Probable
3 चंदबरदाई के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डालिए। +
Hint: जीवन-तथ्यों में मतभेद, षड्भाषा, सखा-सामंत-राजकवि।
Answer Focus: व्यक्तित्व (जन्मस्थान परम्परा, परिवार), कृतित्व (रासो, 69 समय, भाषा-छंद), जल्हण का उल्लेख। Probable
4 पृथ्वीराज रासो की भाषा पर टिप्पणी लिखिए। +
Hint: पिंगल बनाम डिंगल।
Answer Focus: राजस्थानी-ब्रज मिश्रण, अपभ्रंश और अरबी-फारसी शब्द, छंद-वैविध्य। Probable
5 “संपादित पाठ” से क्या तात्पर्य है? पृथ्वीराज रासो के संदर्भ में स्पष्ट कीजिए। +
Hint: पांडुलिपियों/रूपांतरों की विविधता; संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो।
Answer Focus: चार रूपांतर; द्विवेदी-नामवर सिंह का संपादित संस्करण; संपादन की आवश्यकता। Probable
6 बानबेध में करुण रस का स्वरूप स्पष्ट कीजिए। +
Hint: अंतिम बाण, आत्म-बलिदान।
Answer Focus: वीर से करुण में पर्यवसान; पाठक की पूर्व-सूचना से बढ़ी करुणा। Probable
Section B — Long Answer Questions (10–14 अंक)
1 “बानबेध समय” का प्रतिपाद्य स्पष्ट कीजिए। +
Hint: तीन स्तर: राजनीतिक, नैतिक, काव्यात्मक।
Answer Focus: प्रस्तावना; हारे राजा का अंतिम सम्मान; मित्रता और स्वामी-भक्ति; काव्यात्मक न्याय; निष्कर्ष। Probable
2 “बानबेध समय” के काव्य-सौंदर्य की समीक्षा कीजिए। +
Hint: रस, भाषा, छंद, अलंकार चारों का क्रम।
Answer Focus: वीर-अद्भुत-करुण; पिंगल-डिंगल; कवित्त-दूहा-पद्धरी; अनुप्रास, अतिशयोक्ति; संकेत-शैली। Probable
3 पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता-अप्रामाणिकता पर विचार कीजिए। +
Hint: तीन वर्ग + आधुनिक शोध।
Answer Focus: बूलर, शुक्ल, ओझा (अप्रामाणिक); द्विवेदी (अर्द्ध); श्यामसुंदर दास, पंड्या (प्रामाणिक); 16वीं सदी की प्रतियाँ; निष्कर्ष। Probable
4 एक महाकाव्य के रूप में पृथ्वीराज रासो का मूल्यांकन कीजिए। +
Hint: महाकाव्य के लक्षण बनाम रासो की कमियाँ।
Answer Focus: विशाल कथा, धीरोदात्त नायक, रस-विविधता; इतिहास-कल्पना का मेल; अर्द्ध-प्रामाणिकता। Probable
5 बानबेध समय को इतिहास और काव्य की कसौटी पर परखिए। +
Hint: तिथियाँ (1192, 1206), काव्यात्मक न्याय।
Answer Focus: ऐतिहासिक असंगतियाँ; कवि का प्रयोजन; लोक-स्मृति में स्थान। Probable
Frequently Asked Questions (FAQs)
बानबेध समय क्या है?
बानबेध समय पृथ्वीराज रासो का अंतिम समय है, जिसमें रासो की कथा के अनुसार गजनी में दृष्टिहीन पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण से मुहम्मद गौरी को मारते हैं और फिर चंदबरदाई के साथ आत्म-बलिदान करते हैं।
पृथ्वीराज रासो के रचयिता कौन हैं?
परम्परा के अनुसार चंदबरदाई। प्रचलित मत है कि उत्तरार्ध उनके पुत्र जल्हण ने पूरा किया, और आधुनिक विद्वान वर्तमान पाठ में बाद की कई परतें मानते हैं।
पृथ्वीराज रासो में कितने समय हैं?
वृहद् रूपांतर में 69 समय (सर्ग) हैं। छोटे रूपांतरों में समयों की संख्या कम है (जैसे लघु रूपांतर में 19)।
“चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमाण” का अर्थ क्या है?
सामान्य व्याख्या के अनुसार यह दोहा पृथ्वीराज को गौरी की दूरी और ऊँचाई का संकेत देता है। “मत चूके चौहान” में लक्ष्य न चूकने का आग्रह है। गौरी के लिए यह केवल कविता है।
क्या बानबेध की घटना ऐतिहासिक रूप से सही है?
ऐतिहासिक स्रोत इसका समर्थन नहीं करते। पृथ्वीराज की मृत्यु 1192 के बाद मानी जाती है, जबकि गौरी की हत्या 1206 में हुई। इसे काव्यात्मक न्याय की तरह पढ़ा जाता है।
पृथ्वीराज रासो प्रामाणिक है या अप्रामाणिक?
विद्वानों में तीन मत हैं: प्रामाणिक (श्यामसुंदर दास आदि), अर्द्ध-प्रामाणिक (हजारीप्रसाद द्विवेदी आदि) और अप्रामाणिक (बूलर, शुक्ल, ओझा आदि)। अधिकांश आधुनिक शोध वर्तमान पाठ को बाद की परतों वाला मानते हैं।
चंदबरदाई किस भाषा में लिखते थे?
रासो की भाषा को पिंगल कहा जाता है: राजस्थानी-मिश्रित ब्रजभाषा, जिस पर डिंगल और अपभ्रंश का प्रभाव है।
DU में बानबेध समय किस पुस्तक से पढ़ाया जाता है?
संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो के संपादित पाठ से, जिसके संपादक हजारीप्रसाद द्विवेदी और नामवर सिंह हैं (साहित्य भवन, प्रयाग)।
बानबेध समय में मुख्य रस कौन-सा है?
वीर रस प्रधान है; अद्भुत सहायक है और करुण में इसका पर्यवसान होता है।
रासो शब्द का क्या अर्थ है?
तीन प्रमुख मत हैं: रासक (गेय रूपक) से, रसायण से, और राजसूय/राजयश से। सभी का सार वीर राजा के यश-गान से जुड़ता है।
संदर्भ ग्रंथ और स्रोत | References
मूल और संपादित पाठ
- संक्षिप्त पृथ्वीराज रासो, सं. हजारीप्रसाद द्विवेदी, नामवर सिंह, साहित्य भवन, प्रयाग: DU में निर्धारित पाठ।
- पृथ्वीराज रासो, नागरी प्रचारिणी सभा, काशी (श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित वृहद् संस्करण, 1905)।
आलोचना और इतिहास
- रामचंद्र शुक्ल, हिंदी साहित्य का इतिहास (वीरगाथा काल)।
- हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य की भूमिका; हिंदी साहित्य का आदिकाल।
- नामवर सिंह, पृथ्वीराज रासो: भाषा और साहित्य।
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