Contents
- इस यूनिट में क्या पढ़ें | What You Will Learn
- 1. आदिकाल का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश और साहित्यिक पृष्ठभूमि | Political, Social, Cultural Context and Literary Background of Adikal
- पृष्ठभूमि | Background
- आदिकाल : राजनीतिक परिवेश | Adikal: Political Context
- आदिकाल : सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश | Adikal: Social and Cultural Context
- आदिकाल : साहित्यिक पृष्ठभूमि | Adikal: Literary Background
- शुक्ल के बारह ग्रंथ : वीरगाथा काल का आधार | Shukla’s Twelve Texts and the ‘Veergatha’ Label
- 2. सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य | Siddha, Nath and Jain Literature
- सिद्ध, नाथ एवं जैन साहित्य | Siddha, Nath and Jain Sahitya
- सिद्ध साहित्य | Siddha Sahitya
- नाथ साहित्य | Nath Sahitya
- जैन साहित्य | Jain Sahitya
- तीनों धाराओं का तुलनात्मक अध्ययन | Comparative Study of the Three Traditions
- 3. रासो काव्य | Raso Kavya
- रासो काव्य | Raso Kavya
- रासो काव्य का स्वरूप और परंपरा | Nature and Tradition of Raso Kavya
- रासो काव्य की प्रवृत्तियाँ | Pravrittiyan of Raso Kavya
- 4. लौकिक साहित्य | Laukik Sahitya
- लौकिक साहित्य | Laukik Sahitya
- लौकिक साहित्य का स्वरूप | Nature of Laukik Sahitya
- लौकिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ | Pravrittiyan of Laukik Sahitya
- आदिकाल का साहित्यिक महत्व | Literary Significance of Adikal
- हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल का स्थान | Place of Adikal in Hindi Sahitya ka Itihas
- संक्षिप्त सार| Quick Summary
- निष्कर्ष | Conclusion
- घटनाक्रम तालिका | Timeline
- आगे पढ़ें | Continue Reading
- University of Delhi Previous Year Questions | DU में पूछे जाने वाले प्रश्न (अभ्यास)
- अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | FAQs
पाठ्यक्रम: BA (Hons.) Hindi, Semester 1 · DSC-2 “हिन्दी साहित्य का इतिहास (आदिकाल एवं मध्यकाल)” · University of Delhi · Unit 2: आदिकाल
अगर आप जानना चाहते हैं कि आदिकाल की परिस्थितियाँ कैसी थीं, सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य, रासो काव्य और लौकिक साहित्य में क्या फ़र्क़ है, और यह पूरा काल हिंदी साहित्य के इतिहास में क्यों ज़रूरी है, तो यह यूनिट इन्हीं सवालों के जवाब देती है। छोटा उत्तर यह है: आदिकाल एक संक्रमण-काल है। राजनीतिक बिखराव, सामंती समाज और धर्म की नई धाराओं के बीच यहाँ चार काव्य-परंपराएँ साथ-साथ चलती हैं: धर्माश्रित (सिद्ध-नाथ-जैन), दरबारी (रासो) और लोक-जीवन से जुड़ी (लौकिक)। इन्हीं के बीच अपभ्रंश धीरे-धीरे पुरानी हिंदी में ढलती है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल कहा, हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल।
इस यूनिट में क्या पढ़ें | What You Will Learn
- परिवेश: राजनीतिक अस्थिरता, सामंतवाद, स्त्रियों की स्थिति, धार्मिक-सांस्कृतिक धाराएँ
- साहित्यिक पृष्ठभूमि: आदिकाल की पाँच धाराएँ और शुक्ल के बारह ग्रंथ
- सिद्ध साहित्य: सरहपा, चर्यापद, संधा भाषा, सहज-शून्य
- नाथ साहित्य: गोरखनाथ, हठयोग, गोरखबानी (और गोरखनाथ के समय का विवाद)
- जैन साहित्य: हेमचंद्र, रास-फागु-चरितकाव्य और प्रमुख रचनाएँ
- रासो काव्य: शब्द की व्युत्पत्ति, ग्रंथ-सूची, प्रामाणिकता का विवाद, छह प्रवृत्तियाँ
- लौकिक साहित्य: खुसरो, विद्यापति, ढोला-मारू; स्वरूप और प्रवृत्तियाँ
- महत्व: हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल का स्थान
- अभ्यास: DU-pattern प्रश्न, FAQ, तुलना-तालिकाएँ
इस लेख में विवादित तथ्यों (जैसे रासो की व्युत्पत्ति, गोरखनाथ का समय, पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता) को “कुछ विद्वानों के अनुसार” के रूप में अलग-अलग मतों सहित दिया गया है। परीक्षा में भी यही तरीका अपनाइए। पाठ्यक्रम का आधिकारिक ढाँचा दिल्ली विश्वविद्यालय के Hindi UG पाठ्यक्रम पृष्ठ पर देखा जा सकता है।
1. आदिकाल का राजनीतिक, सामाजिक, सांस्कृतिक परिवेश और साहित्यिक पृष्ठभूमि | Political, Social, Cultural Context and Literary Background of Adikal
पृष्ठभूमि | Background
आदिकाल को समझने के लिए पहले यह देखना ज़रूरी है कि यह काल आया ही क्यों। हिंदी साहित्य का यह सबसे पहला पड़ाव है, और यहीं से हिंदी अपनी पहचान बनाना शुरू करती है।
समय को लेकर विद्वानों में एक राय नहीं है। आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे वीरगाथा काल (Veergatha Kaal) कहा और इसका समय विक्रम संवत 1050 से 1375 माना, यानी लगभग 993 ई. से 1318 ई.। वहीं हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसे आदिकाल (Adikal) कहना ज़्यादा सही समझा, और सामान्यतः इसे लगभग 1000 से 1400 ई. के बीच रखा जाता है। परीक्षा में यह बिंदु अक्सर पूछा जाता है कि किसने कौन-सा नाम दिया और क्यों। नामकरण की पूरी बहस के लिए हमारा हिंदी साहित्य इतिहास-लेखन, काल-विभाजन और नामकरण वाला Unit 1 लेख साथ-साथ पढ़िए।
ध्यान दीजिए, यह वह समय है जब अपभ्रंश (Apabhramsha) धीरे-धीरे पुरानी हिंदी में बदल रही थी। इसलिए इस काल की भाषा में अपभ्रंश की झलक साफ़ दिखती है। एक तरह से यह संक्रमण (Transition) का काल है। राजनीतिक टूट-फूट, सामाजिक जकड़न और धर्म के नए रूपों ने मिलकर इस काल के साहित्य को गढ़ा है। इस पृष्ठभूमि के बिना आप रासो काव्यों या सिद्ध-नाथों की वाणी को ठीक से नहीं समझ पाएँगे।
आदिकाल : राजनीतिक परिवेश | Adikal: Political Context
आदिकाल का राजनीतिक माहौल बहुत अस्थिर था। हर्षवर्धन की मृत्यु (647 ई.) के बाद उत्तर भारत में कोई बड़ा केंद्रीय शासन नहीं बचा था।
अब देखिए, पूरा देश छोटे-छोटे राजपूत राज्यों में बँट गया था: कन्नौज, अजमेर, दिल्ली, बुंदेलखंड, गुजरात। हर राजा खुद को बड़ा साबित करना चाहता था।
- आपसी फूट और अहंकार: राजपूत राजाओं में वंश का घमंड बहुत था। परंपरा में पृथ्वीराज चौहान और जयचंद की शत्रुता को इसका सबसे बड़ा उदाहरण माना जाता है। वे एक-दूसरे के खिलाफ़ लड़ने में अपनी शक्ति खत्म कर रहे थे। (परीक्षा-टिप: जयचंद की “गद्दारी” वाली कथा लोक-स्मृति और रासो-परंपरा से आई है; इतिहासकार इसे हर रूप में प्रमाणित नहीं मानते। इसलिए इसे “परंपरागत मान्यता” लिखना सुरक्षित है।)
- विदेशी आक्रमणों की शुरुआत: इसी कमज़ोरी का फ़ायदा उत्तर-पश्चिम से आने वाले आक्रमणकारियों ने उठाया। महमूद गज़नवी के बार-बार के आक्रमण (लगभग 1000-1027 ई.) और फिर मुहम्मद गौरी के हमले इसी काल में हुए। तराइन के युद्धों में पहला (1191 ई.) पृथ्वीराज चौहान ने जीता, पर दूसरे (1192 ई.) में गौरी की विजय हुई। इस दूसरी हार ने उत्तर भारत के राजनीतिक भविष्य को बदल दिया।
- युद्ध ही जीवन: इस माहौल में राजा का मुख्य काम युद्ध करना और कवि का मुख्य काम राजा की वीरता का बखान करना बन गया। इसलिए इस काल में वीर रस (Veer Rasa) प्रधान काव्य ज़्यादा लिखा गया। जनता हमेशा असुरक्षित महसूस करती थी।
| वर्ष (लगभग) | घटना | साहित्य से संबंध |
|---|---|---|
| 647 ई. | हर्षवर्धन की मृत्यु | केंद्रीय सत्ता का अभाव; छोटे राज्यों का उदय |
| 1000-1027 ई. | महमूद गज़नवी के आक्रमण | असुरक्षा, युद्ध-वातावरण |
| 1191 ई. | प्रथम तराइन युद्ध (पृथ्वीराज की जीत) | रासो में पृथ्वीराज की वीर-छवि |
| 1192 ई. | द्वितीय तराइन युद्ध (गौरी की जीत) | राजनीतिक मोड़; पृथ्वीराज रासो की कथा का केंद्र |

Quick Summary: After Harsha’s death there was no strong central power in north India; rival Rajput kingdoms fought each other while Ghaznavid and Ghurid invasions began. Constant war made heroic, patron-centred poetry dominant.
आदिकाल : सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिवेश | Adikal: Social and Cultural Context
राजनीतिक अस्थिरता का सीधा असर समाज और संस्कृति पर पड़ा। समाज जकड़ा हुआ और डरा हुआ था। सामाजिक स्थिति में दो बातें बहुत साफ़ दिखती हैं:
- सामंतवाद (Feudalism) और जाति व्यवस्था: समाज में सामंतों का बोलबाला था। नीचे का किसान और कारीगर दबा हुआ था। जाति व्यवस्था कठोर हो गई थी, छुआछूत और ऊँच-नीच बढ़ गई थी। साधारण लोगों की आवाज़ साहित्य में कम ही आ पाती थी।
- नारी की स्थिति: यह बिंदु परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। अनेक आलोचक मानते हैं कि स्त्रियों की स्थिति में गिरावट आई। सती प्रथा, जौहर (Jauhar), बाल-विवाह और पर्दा जैसी प्रथाएँ इस दौर के सामाजिक वातावरण में प्रबल दिखती हैं। वीरता के साथ-साथ नारी को प्रायः भोग और सम्मान की वस्तु के रूप में भी देखा जाने लगा। (लिखते समय “कई आलोचकों के अनुसार” जोड़ दीजिए। ये प्रथाएँ एक दिन में नहीं आईं और अलग-अलग क्षेत्रों में इनका रूप अलग था।)
सांस्कृतिक रूप से यह बड़े घालमेल का समय था।
| धार्मिक धारा | प्रभाव |
|---|---|
| बौद्ध धर्म का पतन, नाथ-सिद्धों का उदय | सिद्धों (Siddha) और नाथपंथियों (Nathpanthi) ने कर्मकांड की आलोचना की, योग और साधना पर ज़ोर दिया। |
| जैन धर्म | राजस्थान-गुजरात में जैन मुनियों ने अपभ्रंश में नीति और धर्म का साहित्य लिखा। |
| इस्लाम का संपर्क | नई संस्कृति, नई भाषा और सूफ़ी विचारों की आहट शुरू हुई, हालाँकि टकराव ज़्यादा था। |
कुल मिलाकर, मंदिरों का निर्माण, मूर्तिकला और संगीत अपनी जगह चल रहा था, पर आम जनता युद्ध और अंधविश्वास के बीच जी रही थी।
Quick Summary: Society was feudal and caste-ridden, and many critics see a decline in women’s status (sati, jauhar, child marriage, purdah). Culturally, Siddha-Nath currents, Jainism and early contact with Islam co-existed with temple-building and music.
आदिकाल : साहित्यिक पृष्ठभूमि | Adikal: Literary Background
अब सबसे ज़रूरी बात: इतनी उथल-पुथल में साहित्य कैसा लिखा जा रहा था? इस काल में एक नहीं, कई धाराओं में साहित्य रचा गया। इसे समझने के लिए साहित्य को पाँच हिस्सों में बाँटकर देखिए। (कई पाठ्य-सामग्रियाँ इसमें संत साहित्य और गद्य रचनाओं को भी अलग वर्ग गिनती हैं; हम गद्य रचनाओं की चर्चा लौकिक साहित्य वाले खंड में करेंगे।)
- 1. सिद्ध साहित्य (Siddha Sahitya): 84 सिद्धों द्वारा लिखा गया। भाषा अधपकी है, जिसे संधा भाषा (Sandha Bhasha) कहते हैं। इसमें गूढ़ योग और समाज-सुधार की बातें हैं। प्रमुख नाम: सरहपा (Sarahpa)।
- 2. नाथ साहित्य (Nath Sahitya): इसके प्रवर्तक गोरखनाथ (Gorakhnath) माने जाते हैं। इन्होंने हठयोग और वैराग्य की बात सीधी-सादी भाषा में कही। नाथ-साहित्य में उलटबाँसी जैसी शैली की परंपरा भी मिलती है।
- 3. जैन साहित्य (Jain Sahitya): जैन मुनियों ने रास (Ras), फागु (Phagu) और चरितकाव्य (Charit Kavya) लिखे। हेमचंद्र जैसे विद्वानों ने अपभ्रंश व्याकरण पर काम किया।
- 4. रासो साहित्य (Raso Sahitya): यह दरबारी कवियों का साहित्य है: पृथ्वीराज रासो, बीसलदेव रासो, खुमाण रासो जैसी रचनाएँ। इनमें वीरता और शृंगार का मिला-जुला रूप है। भाषा डिंगल-पिंगल (Dingal-Pingal) कही जाती है।
- 5. लौकिक साहित्य (Laukik Sahitya): इसमें आम जीवन की झलक है। अमीर खुसरो (Amir Khusro) की पहेलियाँ-मुकरियाँ और विद्यापति (Vidyapati) की पदावली इसी में आती हैं।

तो आप देख रहे हैं, एक तरफ़ युद्ध का बखान है, दूसरी तरफ़ योग और भक्ति की सीख। यही विविधता आदिकाल की साहित्यिक पृष्ठभूमि है।
शुक्ल के बारह ग्रंथ : वीरगाथा काल का आधार | Shukla’s Twelve Texts and the ‘Veergatha’ Label
(यह हिस्सा परीक्षा की दृष्टि से जोड़ा गया है, क्योंकि “वीरगाथा काल नाम उचित क्यों नहीं” वाला प्रश्न इसी पर टिका है।)
शुक्ल जी ने “वीरगाथा काल” नाम बारह पुस्तकों के आधार पर रखा था: विजयपाल रासो, हम्मीर रासो, कीर्तिलता, कीर्तिपताका, खुमाण रासो, बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो, जयचंद्र प्रकाश, जयमयंक जसचंद्रिका, परमाल रासो, खुसरो की पहेलियाँ और विद्यापति की पदावली। इन्हीं पर बाद के विद्वानों की आपत्तियाँ हैं: कुछ ग्रंथ आज उपलब्ध नहीं हैं, कुछ अधूरे या परवर्ती हैं, बीसलदेव रासो मूलतः विरह-प्रधान गेय काव्य है, और खुसरो की पहेलियाँ या विद्यापति की पदावली वीरगाथा हैं ही नहीं। इस बहस का विस्तार हमारे Unit 1 लेख में है।
Quick Summary: Adikal’s literature falls into five streams: Siddha, Nath, Jain, Raso and Laukik. Shukla’s “Veergatha” label rests on twelve texts, several of which are lost, incomplete, late, or not heroic at all.
2. सिद्ध साहित्य, नाथ साहित्य, जैन साहित्य | Siddha, Nath and Jain Literature
सिद्ध, नाथ एवं जैन साहित्य | Siddha, Nath and Jain Sahitya
ये तीनों धाराएँ आदिकाल की सबसे शुरुआती और वैचारिक रूप से सबसे मज़बूत धाराओं में गिनी जाती हैं। इन्हें एक साथ क्यों पढ़ा जाता है, यह समझ लीजिए।
तीनों में कर्मकांड और जाति-व्यवस्था की आलोचना का स्वर मिलता है। जब समाज में पूजा-पाठ, यज्ञ और बाहरी दिखावा बहुत बढ़ गया था, तब इन संतों-मुनियों ने भीतर की साधना पर ज़ोर दिया। (एक सावधानी: तीनों की धार्मिक जड़ें अलग हैं: सिद्ध बौद्ध वज्रयान से, नाथ शैव मत से, जैन अपने धर्म से। इसलिए “तीनों एक ही विरोध से पैदा हुए” जैसी बात न लिखें; “तीनों में कर्मकांड की आलोचना मिलती है” लिखना ठीक है।)
समय की दृष्टि से यह मोटे तौर पर 8वीं से 13वीं शताब्दी का काल है। ये तीनों अपभ्रंश से निकलकर पुरानी हिंदी की तरफ़ बढ़ रही थीं। इसलिए हिंदी के निर्गुण काव्य के शुरुआती बीज यहीं देखे जाते हैं।
- तीनों में वेद-शास्त्र की जगह गुरु और अनुभव को ज़्यादा महत्व मिला।
- तीनों में जाति-पाति और छुआछूत की आलोचना के स्वर हैं।
- तीनों की भाषा आम लोगों के करीब थी, संस्कृत के भारी शब्दों से दूर।
परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य को धर्माश्रित साहित्य क्यों कहते हैं। क्योंकि इनकी प्रेरणा धर्म और साधना है, पर ये धर्म की बात करते हुए आम जीवन, नीति और समाज-सुधार की बात भी करते हैं। यहीं से आगे चलकर कबीर और निर्गुण धारा का रास्ता खुलता है। एक और बात ध्यान रखिए: शुक्ल जी ने इन्हें मुख्यतः धार्मिक या साम्प्रदायिक मानकर साहित्य की परिधि से बाहर रखा था, जबकि द्विवेदी जी ने इन्हें साहित्य के इतिहास में शामिल किया। यह भी आपके उत्तर को गहराई देगा।
सिद्ध साहित्य | Siddha Sahitya
सिद्ध साहित्य का संबंध बौद्ध धर्म की वज्रयान (Vajrayana) शाखा से है। बौद्ध धर्म जब अपने मूल रूप से हटकर तंत्र-मंत्र की ओर बढ़ा, तब उसमें से सिद्धों का पंथ निकला।
प्रमुख बातें जो याद रखनी हैं:
- संख्या और प्रमुख कवि: सिद्धों की संख्या 84 मानी जाती है। इनमें सबसे पुराने और प्रमुख सरहपा (Sarahpa) हैं। राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें हिंदी का आदि कवि माना है और उनका समय आठवीं शताब्दी (लगभग 769 ई.) बताया है। यह एक मत है, सर्वमान्य तथ्य नहीं: कई विद्वान उनकी भाषा को अपभ्रंश या पूर्वी बोलियों से जोड़ते हैं, इसलिए परीक्षा में लिखिए, “राहुल सांकृत्यायन के अनुसार सरहपा हिंदी के प्रथम कवि हैं।” दूसरे बड़े नाम हैं: शबरपा, लुइपा, कण्हपा।
- रचनाएँ: इनकी रचनाओं को चर्यापद (Charyapad) और दोहा (Doha) कहा जाता है। यहाँ एक बारीक फ़र्क़ याद रखिए: चर्यापद की पोथी हरप्रसाद शास्त्री को 1907 में नेपाल के राज-ग्रंथालय से मिली (लगभग 46 पद और एक खंडित पद; 1916 में प्रकाशित), जबकि राहुल सांकृत्यायन ने सरहपा के दोहाकोश की प्रति तिब्बत के सा-स्क्य मठ से प्राप्त की और 1957 में उसका संपादन किया। चर्यापद की भाषा पर बांग्ला, असमिया, ओड़िया और मैथिली, सभी अपना दावा जताते हैं।
- भाषा शैली: इनकी भाषा को संधा भाषा (Sandha Bhasha) कहते हैं। संधा का मतलब है: जिसमें भीतर का अर्थ छिपा हो और ऊपर से कुछ और लगे। इसी प्रतीकात्मक, उलटी-सी लगने वाली कहन से आगे चलकर उलटबाँसी (Ulatbansi) की परंपरा बनी। सामान्य छात्र को यह अटपटी लगेगी, पर यह योग की गहरी बात को कहने का तरीका था।
- विचार: सिद्धों ने सहज (Sahaj) और शून्य (Shunya) पर ज़ोर दिया: सहज जीवन जियो, आडंबर छोड़ो। इन्होंने पंडितों और कर्मकांड-प्रधान धार्मिकता की कड़ी आलोचना की।
भाषा टूटी-फूटी, ग्रामीण और अपभ्रंश-मिली है। पर इसी ने हिंदी को एक नया तेवर दिया।
Quick Summary: Siddha literature (84 Siddhas; Sarahpa is the earliest) comes from Buddhist Vajrayana. Its forms are Charyapad and Doha, its language Sandha Bhasha, and its core ideas Sahaj and Shunya. Rahul Sankrityayan calls Sarahpa the first Hindi poet, but this is a contested claim.
नाथ साहित्य | Nath Sahitya
नाथ पंथ सिद्धों के बाद आता है, पर उनसे ज़्यादा व्यवस्थित और व्यापक है। इसका संबंध शैव मत (Shaiva) से माना जाता है।
इसके प्रवर्तक मत्स्येन्द्रनाथ (Matsyendranath) और गोरखनाथ (Gorakhnath) माने जाते हैं। परीक्षा में गोरखनाथ का नाम बार-बार आता है, इसलिए एक बात खास तौर पर याद रखिए: गोरखनाथ के समय पर विद्वान एकमत नहीं हैं।
| विद्वान | गोरखनाथ का समय |
|---|---|
| राहुल सांकृत्यायन | 845 ई. |
| हजारीप्रसाद द्विवेदी | नवीं शताब्दी का उत्तरार्ध / दसवीं का पूर्वार्ध |
| रामचंद्र शुक्ल, रामकुमार वर्मा | 13वीं शताब्दी |
| जॉर्ज वेस्टन ब्रिग्स | ग्यारहवीं शताब्दी से पहले या आरंभ में (उपलब्ध प्रमाण-सीमा के साथ) |
नाथ साहित्य की पहचान क्या है?
- हठयोग (Hatha Yoga): नाथपंथियों ने शरीर को साधने पर बहुत ज़ोर दिया। प्राणायाम, कुंडलिनी, नाड़ी-चक्र: ये शब्द यहीं से आते हैं। इनका मानना था कि शरीर को शुद्ध किए बिना मन शुद्ध नहीं होगा।
- गुरु का महत्व: नाथपंथ में गुरु को ईश्वर से भी बड़ा माना गया। बिना गुरु के ज्ञान संभव नहीं।
- रचनाएँ और भाषा: गोरखनाथ की वाणी गोरखबानी (Gorakhbani) कहलाती है, जिसका संपादन डॉ. पीतांबरदत्त बड़थ्वाल ने किया। उनकी छानबीन में गोरखनाथ के नाम से लगभग 40 रचनाएँ मिलीं, जिनमें से उन्होंने 14 को असंदिग्ध रूप से प्राचीन माना, जैसे सबदी (Sabadi) और पद (Pad)। भाषा को अक्सर सधुक्कड़ी कहा जाता है, क्योंकि इसमें अपभ्रंश, राजस्थानी, पंजाबी और खड़ी बोली के शुरुआती रूप मिले-जुले हैं।
- विषय: वैराग्य, मन की चंचलता को रोकना, माया से बचना और निराकार ब्रह्म की साधना। इन्होंने भी बाहरी कर्मकांड, तीर्थ-व्रत की आलोचना की।
एक बात ध्यान दीजिए: सिद्ध जहाँ गृहस्थ-जीवन और भोग के प्रति अपेक्षाकृत उदार थे, वहीं नाथ पूरे वैरागी और संयमी थे। इसी कारण जनता में नाथों का असर ज़्यादा लंबे समय तक रहा।
Quick Summary: Nath literature (Matsyendranath, Gorakhnath) is Shaiva-influenced and stresses Hatha Yoga, the Guru and ascetic discipline, in Sabadi-Pad form (Gorakhbani, edited by P. D. Barthwal). Gorakhnath’s date is disputed: roughly 9th-10th century (Dwivedi, Sankrityayan) to 13th century (Shukla, Verma).
जैन साहित्य | Jain Sahitya
जैन साहित्य इन दोनों से थोड़ा अलग है। जहाँ सिद्ध-नाथों ने योग और साधना का रास्ता अपनाया, वहीं जैन मुनियों ने धर्म, नीति और कथा के ज़रिए समाज को शिक्षा दी। इसका केंद्र गुजरात और राजस्थान रहा।
इसकी मुख्य विशेषताएँ:
- भाषा: मुख्यतः अपभ्रंश (Apabhramsha); बाद में पुरानी हिंदी, राजस्थानी और गुजराती का रूप। जैन आचार्यों ने अपभ्रंश के व्याकरण को व्यवस्थित भी किया। हेमचंद्र (Hemchandra) का नाम इस संदर्भ में बहुत महत्वपूर्ण है; उनका व्याकरण-ग्रंथ सिद्धहेमशब्दानुशासन (Siddha-Hema-Shabdanushasan) प्रसिद्ध है, और उसमें अपभ्रंश के उदाहरण-दोहे भी मिलते हैं।
- काव्य-रूप: जैन साहित्य के कुछ खास काव्य-रूप परीक्षा में सीधे पूछे जाते हैं:
- रास (Ras): गेय काव्य-रूप। इसकी परंपरा में धर्मोपदेश-प्रधान और कथा-प्रधान, दोनों तरह की रचनाएँ हैं। उदाहरण: भरतेश्वर बाहुबली रास, जिसे शालिभद्र सूरि ने संवत् 1241 (लगभग 1184 ई.) में रचा। इसमें तीर्थंकर ऋषभदेव के दो पुत्रों, भरतेश्वर और बाहुबली, के राज्य के लिए संघर्ष की कथा है; इसमें लगभग 203 छंद हैं और वीर रस का वर्णन है। उन्हीं की बुद्धिरास उपदेश-प्रधान रचना है।
- फागु (Phagu): वसंत और होली के वर्णन से जुड़ा छोटा काव्य। जैसे नेमिनाथ फागु।
- चरितकाव्य (Charit Kavya): महापुरुषों की जीवन-कथा।
- प्रमुख रचनाएँ: श्रावकाचार (Shravakachar), कुमारपाल प्रतिबोध (Kumarpal Pratibodh): सोमप्रभ सूरि द्वारा रचित, और रेवंतगिरि रास (Revantgiri Ras): विजयसेन सूरि की रचना (संवत् 1288), जिसमें गिरनार के जैन मंदिरों के जीर्णोद्धार की कथा है। इसके अलावा जिनदत्त सूरि का उपदेश रसायन (चौपाई छंद, उपदेश-प्रधान) रास-परंपरा की प्राचीन रचनाओं में गिना जाता है। ये रचनाएँ धर्म-प्रचार के साथ तत्कालीन समाज, नगर, वेशभूषा और खान-पान का भी सुंदर चित्र देती हैं।
ध्यान दीजिए: रास या रासो शब्द सिर्फ़ वीर-काव्य तक सीमित नहीं है। उपदेशमूलक रास (जैसे उपदेश रसायन, बुद्धिरास), शृंगारमूलक (जैसे सन्देश रासक) और वीर-रसात्मक (जैसे भरतेश्वर बाहुबली रास), तीनों तरह की रचनाएँ इस परंपरा में हैं। इसकी चर्चा हम रासो खंड में फिर करेंगे।
जैन साहित्य का स्वर शांत, उपदेशात्मक और मर्यादित है। इसमें शृंगार भी है, पर मर्यादा के भीतर। कुछ अध्ययन-सामग्रियाँ अपभ्रंश के बड़े कवियों (जैसे स्वयंभू, पुष्पदंत, धनपाल) को भी इसी परंपरा से जोड़ती हैं; यदि आपके कॉलेज के शिक्षक इन्हें पढ़ाते हैं तो इनके नाम अतिरिक्त जानकारी के रूप में जोड़ लीजिए।
Quick Summary: Jain literature, centred on Gujarat-Rajasthan, is mostly in Apabhramsha. Hemchandra systematised its grammar (Siddha-Hema-Shabdanushasan). Key forms are Ras (e.g. Bharateshwar Bahubali Ras, Revantgiri Ras), Phagu and Charit Kavya, with a calm, didactic tone.
तीनों धाराओं का तुलनात्मक अध्ययन | Comparative Study of the Three Traditions
अब इन तीनों को एक साथ रखकर तुलना करते हैं। परीक्षा में अक्सर 5-6 अंकों का प्रश्न आता है: सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य में अंतर स्पष्ट कीजिए।
| तुलना का आधार | सिद्ध साहित्य | नाथ साहित्य | जैन साहित्य |
|---|---|---|---|
| मूल धर्म | बौद्ध वज्रयान से | शैव मत से प्रभावित | जैन धर्म से |
| प्रमुख दर्शन | सहज और शून्य | हठयोग और वैराग्य | अहिंसा, त्याग और नीति |
| भाषा | अपभ्रंश-मिश्रित, संधा भाषा | सधुक्कड़ी (अपभ्रंश, राजस्थानी, पंजाबी, खड़ी बोली का मिश्रित रूप) | मुख्यतः अपभ्रंश; बाद में राजस्थानी-गुजराती |
| साहित्य रूप | चर्यापद, दोहा | सबदी, पद | रास, फागु, चरितकाव्य |
| सामाजिक दृष्टि | विद्रोही, वर्ण-व्यवस्था के आलोचक | विद्रोही पर अनुशासित | सुधारवादी, मर्यादित उपदेश |
| हिंदी पर प्रभाव | उलटबाँसी और प्रतीक-शैली | गुरु-महिमा, हठयोग और निर्गुण भावना | कथा-शैली और प्रबंधात्मकता |

संक्षेप में कहें तो सिद्धों ने रूढ़ियों को तोड़ा, नाथों ने योग से व्यक्ति को साधा और जैनियों ने कथा से समाज को जोड़ा। तीनों ने मिलकर आदिकाल को केवल वीरता का काल नहीं रहने दिया, बल्कि उसे धार्मिक-सामाजिक चिंतन का काल भी बनाया। आगे का संत साहित्य काफ़ी हद तक इन्हीं की ज़मीन पर खड़ा दिखता है।
Quick Summary: Siddha literature (Sarahpa) uses Sandha Bhasha and Charyapad to preach Sahaj and criticise ritual; Nath literature (Gorakhnath) stresses Hatha Yoga, the Guru and asceticism; Jain literature (Hemchandra, Shalibhadra Suri, Vijayasen Suri) in Apabhramsha created Ras, Phagu and Charit Kavya with a moral-didactic tone. Together they prepared the ground for Nirguna Bhakti.
3. रासो काव्य | Raso Kavya
रासो काव्य | Raso Kavya
आदिकाल की सबसे चर्चित और सबसे विवादित धारा अगर कोई है, तो वह रासो काव्य ही है। यह मुख्यतः दरबारी कवियों का साहित्य है।
‘रासो’ शब्द का मतलब क्या है, इस पर विद्वानों में मतभेद है, और परीक्षा में यह सवाल अक्सर घुमाकर पूछा जाता है। मुख्य मत ये हैं:
| विद्वान | रासो शब्द की व्युत्पत्ति |
|---|---|
| आचार्य रामचंद्र शुक्ल | रसायण (Rasayan): बीसलदेव रासो में कवि ने काव्य के लिए ‘रसायण’ शब्द का प्रयोग किया है, इसी आधार पर शुक्ल जी ने रासो को रसायण से जोड़ा |
| हजारीप्रसाद द्विवेदी, दशरथ शर्मा (और डॉ. उदयनारायण तिवारी) | रासक / रास: गीत-नृत्य-प्रधान परंपरा, जो आगे चलकर वीर-रस के पद्यात्मक चरित-काव्य में बदली |
| ग्रियर्सन | राजादेश |
| विंध्येश्वरी प्रसाद द्विवेदी | राजयश |
| हरप्रसाद शास्त्री | रासा (क्रीड़ा या झगड़ा) |
| काशीप्रसाद जायसवाल, कविराज श्यामलदास | रहस्य (रहस्य → रहस्सो → रासो) |
| गौरीशंकर हीराचंद ओझा | रास (विलास, चरित के अर्थ में) |
| कुछ अन्य विद्वान | राजसूय (यह मत मिलता है, पर किसने दिया, यह हम निश्चित रूप से सत्यापित नहीं कर सके; लोकप्रिय नोट्स में इसे गार्सां द तासी के नाम से लिखा जाता है, इसलिए परीक्षा में इसे तभी लिखिए जब आपके शिक्षक ने यही बताया हो) |

ध्यान दीजिए, इन मतों के विश्लेषण से अधिकांश आधुनिक अध्ययन इस ओर झुकते हैं कि रासो का संबंध ‘रास’ परंपरा से है, जो नृत्य और गीत से जुड़ा काव्य-रूप था और अपभ्रंश परंपरा में विकसित हुआ। (एक छोटी सुधार-टिप्पणी: ‘रसायण’ का आशय रस उत्पन्न करने वाला काव्य है, “वीर रस का आयन” नहीं; बीसलदेव रासो तो खुद विरह-प्रधान काव्य है।)
मूल अर्थ चाहे जो भी हो, व्यवहार में रासो (Raso) का अर्थ हो गया: किसी राजा के जीवन-चरित और युद्धों का विस्तृत काव्य। यह एक तरह का चरितकाव्य (Charit Kavya) है, पर इसमें इतिहास कम और कवि की कल्पना ज़्यादा होती है। इस पर अगला विवाद ग्रंथों की प्रामाणिकता का है।
यह साहित्य क्यों लिखा गया? क्योंकि उस समय राजा ही संरक्षक था। कवि को राजा को प्रसन्न करना था। इसलिए कवि अपने आश्रयदाता को राम-कृष्ण जैसा महान दिखाता था। यहीं से अतिशयोक्ति (Exaggeration) और कल्पना रासो काव्य की पहचान बन गई।
रासो काव्य का स्वरूप और परंपरा | Nature and Tradition of Raso Kavya
रासो काव्य के स्वरूप को समझना बहुत आसान है, बशर्ते आप एक बात पकड़ लें कि रासो परंपरा दो रूपों में मिलती है: प्रबंध काव्य और वीरगीत/गेय काव्य। पृथ्वीराज रासो प्रबंध (विकसनशील महाकाव्य) की श्रेणी में आता है, जबकि बीसलदेव रासो गेय विरह-काव्य है। इसलिए “सब रासो प्रबंध काव्य हैं” जैसा सामान्यीकरण ठीक नहीं। इसमें इतिहास और कल्पना का मिला-जुला रूप मिलता है।
स्वरूप की मुख्य बातें:
- नायक: कोई ऐतिहासिक राजपूत राजा। वह वीर, दानी और शृंगार-प्रिय दिखाया जाता है।
- छंद-विविधता: रासो ग्रंथों में एक ही छंद नहीं है। पृथ्वीराज रासो में दोहा, छप्पय (कवित्त), पद्धरि, गाहा, त्रोटक, तोमर जैसे अनेक छंद मिलते हैं; कवि युद्ध के समय ओज भरे छंद और प्रेम-प्रसंग में दोहा जैसे छंदों का प्रयोग करता है। (बीसलदेव रासो इसका अपवाद है; उसमें आरंभ से अंत तक एक ही छंद मिलता है और पूरी रचना गेय है।)
- भाषा: डिंगल (Dingal) और पिंगल (Pingal)। डिंगल पश्चिमी राजस्थानी की साहित्यिक शैली है जो ओज के लिए प्रसिद्ध है, और पिंगल ब्रज-मिश्रित राजस्थानी है जो कोमल है।
- मंगलाचरण: प्रायः रासो ग्रंथ देवी-देवताओं की वंदना से शुरू होते हैं।
अब इसकी परंपरा देखिए। यह एक लंबी परंपरा है। कुछ प्रमुख ग्रंथ याद रखिए: यह सूची परीक्षा के लिए बहुत महत्वपूर्ण है।
| रासो ग्रंथ | रचनाकार | नायक / विषय और ध्यान देने की बात |
|---|---|---|
| पृथ्वीराज रासो (Prithviraj Raso) | चंदबरदाई (Chandbardai) | पृथ्वीराज चौहान; सबसे बड़ा और सबसे विवादित। इसे हिंदी का प्रथम महाकाव्य कहा जाता है। नागरी प्रचारिणी सभा के संस्करण में 69 समय (सर्ग) हैं। |
| बीसलदेव रासो (Bisaldev Raso) | नरपति नाल्ह (Narpati Nalh) | अजमेर के चौहान शासक बीसलदेव (विग्रहराज चतुर्थ) और राजमती का प्रेमाख्यान; लगभग सवा सौ छंद; विरह-प्रधान और गेय। कवि ने संवत् 1212 का संकेत दिया है, पर रचना-काल पर विवाद है। |
| खुमाण रासो (Khuman Raso) | दलपति विजय (Dalpati Vijay) | मेवाड़ के सूर्यवंश/खुमाण वंश का वर्णन। मिली प्रतियों में राणा संग्राम सिंह द्वितीय (वि. 1767-90) तक का उल्लेख है, इसलिए वर्तमान रूप काफ़ी परवर्ती माना जाता है। |
| परमाल रासो / आल्हाखंड (Parmal Raso / Alhakhand) | जगनिक (Jagnik) (परंपरागत मान्यता) | महोबा के आल्हा-ऊदल की वीरता। मूल रूप अप्राप्य है; श्यामसुंदर दास ने प्रतियों के आधार पर इसे परमाल रासो नाम दिया। लोक-रूप में यह आल्हाखंड के नाम से गाया जाता है। |
| हम्मीर रासो (Hammir Raso) | शारंगधर (परंपरागत उल्लेख) / जोधराज | हिंदी साहित्य में दो हम्मीर रासो का उल्लेख मिलता है: एक शारंगधर के नाम से और दूसरा जोधराज का। उपलब्ध पाठ-चर्चा प्रायः जोधराज वाले रासो की होती है (लगभग एक हज़ार छंद, कई अनैतिहासिक तथ्य)। शारंगधर वाले ग्रंथ का मूल पाठ आज उपलब्ध नहीं माना जाता। रणथंभौर के हम्मीर देव इसके नायक हैं। |
| विजयपाल रासो | नल्ह सिंह भाट | करौली के विजयपाल; केवल लगभग 42 छंद उपलब्ध; भाषा के आधार पर रचना बहुत परवर्ती मानी जाती है। (शुक्ल के बारह ग्रंथों में शामिल) |
एक बात और, पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता को लेकर सबसे बड़ा विवाद है। मुख्य बिंदु:
- शुक्ल जी ने इसकी भाषा को अव्यवस्थित बताया और माना कि इसमें असली अंश और बाद के जोड़ों को अलग करना लगभग असंभव है, इसलिए उनकी नज़र में यह भाषा या साहित्य के इतिहास के लिए ज़्यादा काम का ग्रंथ नहीं।
- मोहनलाल विष्णुलाल पंड्या जैसे समर्थकों ने रासो की तिथियों में नियमित रूप से लगभग 90-91 वर्ष के अंतर की व्याख्या करके इसे बचाने का प्रयास किया। शुक्ल जी ने इस तर्क में कारण की कमी बताई।
- माताप्रसाद गुप्त ने इसे केवल बारह सर्गों में संपादित किया, और हजारीप्रसाद द्विवेदी व नामवर सिंह ने इसका संक्षिप्त संस्करण तैयार कर उसे मूल के अधिक निकट माना।
- आज अधिकांश अध्येता इसे विकसनशील महाकाव्य मानते हैं, जिसका लेखन अलग-अलग कालों में अलग-अलग हाथों से हुआ।
यह प्रश्न अक्सर टिप्पणी के रूप में पूछा जाता है। इसके एक अंश की व्याख्या के लिए हमारा बानबेध समय: चंदबरदाई और पृथ्वीराज रासो लेख देखिए।
विषय की दृष्टि से रासो के तीन वर्ग भी याद रखिए (UGC के e-PG Pathshala के पाठ में यही वर्गीकरण मिलता है): (1) उपदेशमूलक (जैन रास: उपदेश रसायन, बुद्धिरास), (2) शृंगारमूलक (सन्देश रासक, बीसलदेव रास), (3) वीररसात्मक (भरतेश्वर बाहुबली रास, पृथ्वीराज रासो, खुमाण रासो आदि)।
Quick Summary: Raso is courtly Charit Kavya in Dingal-Pingal with varied chhandas; the word’s origin is disputed (rasayan, rasak/ras, rajadesh, rajyash, rahasya). Major texts: Prithviraj Raso (Chandbardai), Bisaldev Raso (Narpati Nalh), Khuman Raso (Dalpati Vijay), Parmal Raso/Alhakhand (Jagnik), two Hammir Rasos, Vijaypal Raso. Prithviraj Raso’s authenticity is the central debate.
रासो काव्य की प्रवृत्तियाँ | Pravrittiyan of Raso Kavya
रासो काव्य की प्रवृत्तियाँ, यानी उसकी सामान्य विशेषताएँ, पूरे आदिकाल के राजनीतिक माहौल को समझाती हैं। इन्हें आप एक पैटर्न के रूप में याद कर सकते हैं।
1. वीर और शृंगार का अद्भुत मेल: यह सबसे बड़ी प्रवृत्ति है। राजा युद्ध के मैदान में वीर है तो अंतःपुर में प्रेमी भी। वीर रस (Veer Rasa) प्रधान है, पर शृंगार रस (Shringar Rasa) उसका सहायक है। युद्ध का कारण भी अक्सर किसी राजकुमारी को पाना होता है।
2. आश्रयदाता की अतिशयोक्तिपूर्ण प्रशंसा: कवि अपने राजा को अतिमानव बना देता है। एक राजा अकेले सैकड़ों को मार देता है। ऐतिहासिक तथ्य कम, चारण-प्रशंसा (Charan Prashansa) ज़्यादा। इसलिए इन ग्रंथों को इतिहास की तरह नहीं पढ़ा जा सकता।
3. युद्धों का सजीव वर्णन: ध्यान दीजिए, इन कवियों ने युद्ध को बहुत करीब से देखा था। इसलिए ढाल-तलवार, हाथी-घोड़े, रण-भेरी का वर्णन बहुत सजीव है। युद्ध-वर्णन (Yuddh Varnan) में ही कवि की सारी कला दिखती है।
4. राष्ट्रीयता का अभाव, वंश-गौरव का भाव: उस समय आज जैसी राष्ट्र की भावना नहीं थी। हर राजा अपने वंश (चौहान, चंदेल, गहड़वाल) की प्रशंसा में लगा था। पूरे देश की चिंता कोई नहीं कर रहा था।
5. कल्पना और चमत्कार: शकुन-अपशकुन, ज्योतिष, देवी का वरदान, भूत-प्रेत: इन सबका भरपूर प्रयोग। कथा को रोचक बनाने के लिए चमत्कार जोड़े गए हैं।
6. प्रबंधात्मकता का विकास: भले ही इतिहास गड़बड़ हो, पर कथा कहने की कला, घटनाओं को जोड़ना और बड़े काव्य को सँभालना: यह सब रासो कवियों ने हिंदी को सिखाया। आगे चलकर यही कला पद्मावत (Padmavat) जैसे महाकाव्यों के संदर्भ में देखी जा सकती है; प्रेमाख्यान-परंपरा की दृष्टि से हमारा जायसी: मानसरोदक खंड लेख भी उपयोगी रहेगा।
संक्षेप में, रासो काव्य अपने समय का आईना है: लड़ाकू, प्रेमी, अभिमानी और कल्पनाशील।
Quick Summary: Raso’s main pravrittis are the Veer-Shringar blend, exaggerated praise of patrons, vivid war description, clan pride in place of nationalism, miracle and imagination, and the growth of narrative (prabandh) skill.
4. लौकिक साहित्य | Laukik Sahitya
लौकिक साहित्य | Laukik Sahitya
अब तक हमने सिद्ध-नाथों का योग देखा और रासो का युद्ध देखा। पर क्या आम आदमी का भी कोई साहित्य था? हाँ, और उसे हम लौकिक साहित्य कहते हैं।
लौकिक का सीधा अर्थ है: लोक से जुड़ा हुआ, जो धर्म या दरबार से बँधा हुआ न हो। जो साहित्य किसी पंथ के प्रचार के लिए नहीं, किसी राजा की प्रशंसा के लिए नहीं, बल्कि आम लोगों के मनोरंजन, प्रेम और रोज़मर्रा की ज़िंदगी के लिए लिखा गया, वही लौकिक साहित्य (Laukik Sahitya) है।
आदिकाल में इसका महत्व इसलिए और बढ़ जाता है कि बाकी धाराएँ या तो बहुत धार्मिक थीं या बहुत दरबारी। लौकिक साहित्य ने बीच का रास्ता निकाला।
इस धारा के दो सबसे बड़े नाम हमेशा याद रखिए: अमीर खुसरो (Amir Khusro) और विद्यापति (Vidyapati)। इनके अलावा ढोला-मारू रा दूहा (Dhola-Maru Ra Duha), वसंत विलास (Vasant Vilas), राउलबेल (Raulvel) और वर्णरत्नाकर (Varnaratnakar) जैसी रचनाएँ भी इसी चर्चा में आती हैं। (इनमें से राउलबेल, उक्ति-व्यक्ति-प्रकरण और वर्णरत्नाकर जैसी कृतियाँ गद्य या गद्य-पद्य-मिश्रित रचनाओं के रूप में भी पढ़ाई जाती हैं। इनके कर्ता और रचना-काल के बारे में शिक्षक या मानक इतिहास-ग्रंथ से मिलान कर लीजिए।)
ध्यान दीजिए, इन रचनाओं की एक खास बात है: ये आदिकाल में लिखी गईं, पर इनका तेवर भक्तिकाल के काफ़ी करीब लगता है। इसलिए कई विद्वान लौकिक साहित्य को आदिकाल और भक्तिकाल के बीच का पुल कहते हैं। विद्यापति की पदावली के विस्तृत अध्ययन के लिए हमारा विद्यापति पदावली नोट्स देखिए।
लौकिक साहित्य का स्वरूप | Nature of Laukik Sahitya
लौकिक साहित्य के स्वरूप को आप तीन शब्दों में समझ सकते हैं: लोक, प्रेम और भाषा की सहजता। यह धर्माश्रित नहीं है, इसलिए इसमें कोई दार्शनिक जटिलता नहीं है। इसका सीधा उद्देश्य है: सुनने वाले को आनंद देना।
1. विषय की दृष्टि से स्वरूप: इसका मुख्य विषय प्रेमाख्यान है, पर वह आध्यात्मिक प्रेम नहीं, बल्कि बिल्कुल मानवीय प्रेम है। जैसे ढोला-मारू (Dhola-Maru) में ढोला और मारू की विरह और मिलन की कहानी है (आज उपलब्ध रूप में बाद के जोड़ और विस्तार भी माने जाते हैं)। वसंत विलास में वसंत ऋतु में नायिका के शृंगार और विरह का चित्रण है। और खुसरो की पहेलियाँ (Paheliyan) और मुकरियाँ (Mukariyan) तो सीधे घर-आँगन की बातें हैं।
2. काव्य-रूप की दृष्टि से स्वरूप: यह ज़्यादातर मुक्तक (Muktak) काव्य है, प्रबंध नहीं। छोटे-छोटे दोहे, पद और गीत जो अकेले भी पूरे लगते हैं और गाए जा सकते हैं। विद्यापति की पदावली (Vidyapati Padavali) इसका सबसे सुंदर उदाहरण है: हर पद अपने आप में एक गीत है।
3. भाषा की दृष्टि से स्वरूप: यहाँ सबसे बड़ा बदलाव दिखता है। रासो की डिंगल-पिंगल और सिद्धों की संधा भाषा के मुकाबले लौकिक साहित्य की भाषा बहुत साफ़ है। खुसरो को खड़ी बोली के शुरुआती रूप, जिसे तब हिंदवी (Hindavi) कहा जाता था, के प्रयोग के लिए याद किया जाता है। नोट्स में उनकी यह पंक्ति दी जाती है: “खुसरो रैन सुहाग की…”। यह भाषा आम आदमी के बिल्कुल करीब है। (सावधानी: खुसरो के नाम से प्रचलित हिंदी रचनाओं का बड़ा भाग मौखिक परंपरा से आया है, इसलिए कुछ विद्वान उनकी हर पहेली-मुकरी की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाते हैं। परीक्षा में “खुसरो के नाम से प्रचलित” लिखना सुरक्षित है।) विद्यापति ने मैथिली (Maithili) और अवहट्ट (Avahatta) का मधुर प्रयोग किया।
तो स्वरूप के स्तर पर यह साहित्य दरबार से निकलकर लोक-आँगन में आ जाता है।
लौकिक साहित्य की प्रवृत्तियाँ | Pravrittiyan of Laukik Sahitya
अब इस साहित्य की प्रवृत्तियाँ, यानी इसके सामान्य लक्षण देखिए। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि लौकिक साहित्य, रासो साहित्य से कैसे अलग है।
1. शृंगार रस की प्रधानता: यहाँ वीर रस नहीं, शृंगार रस (Shringar Rasa) मुख्य है। पर यह दरबारी शृंगार नहीं, लोक-शृंगार है। संयोग और वियोग दोनों का बहुत सहज चित्रण मिलता है। वसंत, फाग, बारहमासा (Barahmasa) के ज़रिए नायिका के मन की बात कही गई है।
2. लोक-जीवन का सजीव चित्रण: इसमें आपको महल के षड्यंत्र नहीं, बल्कि लोक-जीवन (Folk Life) मिलेगा: तीज-त्योहार, खेती-बाड़ी, सखियों की हँसी-मज़ाक, घर की चीज़ों पर बनी पहेलियाँ। नोट्स में खुसरो की मुकरी का यह अंश उद्धृत किया जाता है: “वो आए तो शादी होय, उन बिन दूजा और न कोय…” यानी कितनी लोक-भाषा है।
3. संगीतात्मकता और गेयता: इस साहित्य की लगभग हर रचना गाने के लिए बनी है। विद्यापति के पद तो आज भी मिथिला में गाए जाते हैं। पद (Pad), दोहा (Doha) और गीत ही इसके मुख्य रूप हैं।
4. धर्मनिरपेक्ष दृष्टिकोण: यह बहुत महत्वपूर्ण प्रवृत्ति है। यहाँ धार्मिक कट्टरता कम और इंसानी भावना ज़्यादा है। लौकिक कवि धर्म के प्रचार के लिए नहीं लिखता, इसलिए पाठक को संप्रदाय का दबाव कम महसूस होता है।
5. कल्पना की जगह यथार्थ: रासो में जो अतिशयोक्ति थी, वह यहाँ अपेक्षाकृत कम है। प्रेम में विरह है तो वह सच्चा लगता है। नायिका का दुख, उसका इंतज़ार: सब बहुत वास्तविक है। भाषा में अलंकार हैं पर वे बोझिल नहीं।
6. मनोरंजन ही मुख्य उद्देश्य: सिद्ध-नाथ मुक्ति की बात करते थे, रासो कवि यश की। पर लौकिक कवि कहता है: चलो, थोड़ी देर दिल बहलाते हैं। इसलिए इसमें हास्य, व्यंग्य, पहेली सब चलता है।
इसी कारण लौकिक साहित्य को आदिकाल की सबसे आधुनिक और आगे की धारा माना जाता है।
Quick Summary: Laukik Sahitya is secular, folk-rooted literature meant for delight. Its nature shows in love narratives like Dhola-Maru and Vasant Vilas, and in Muktak forms like Khusro’s Paheliyan-Mukariyan (Hindavi) and Vidyapati’s Padavali (Maithili). Its pravrittis are Shringar Rasa, folk life, musicality, secular outlook, realism and entertainment.
आदिकाल का साहित्यिक महत्व | Literary Significance of Adikal
हिंदी साहित्य के इतिहास में आदिकाल का स्थान | Place of Adikal in Hindi Sahitya ka Itihas
अक्सर छात्र सोचते हैं कि आदिकाल तो सिर्फ़ लड़ाई-झगड़े और पुरानी अपभ्रंश भाषा का काल है, इसका क्या महत्व है। यही वह भ्रम है जिसे परीक्षा में साफ़ करना होता है। सच यह है कि आदिकाल हिंदी साहित्य की नींव (Foundation) का काल है। बिना नींव के महल नहीं बनता, वैसे ही बिना आदिकाल के भक्तिकाल और रीतिकाल को समझना अधूरा है।
इसका स्थान तीन स्तरों पर बहुत महत्वपूर्ण है:
1. भाषिक स्तर पर: हिंदी यहाँ अपभ्रंश (Apabhramsha) की गोद से निकलकर अपने पैरों पर खड़ी होना सीखती है। डिंगल, पिंगल, पुरानी हिंदी, हिंदवी और मैथिली जैसे कई रूप इसी काल में प्रयोग में आए। खुसरो की हिंदवी रचनाएँ खड़ी बोली के शुरुआती रूप की झलक देती हैं।
2. काव्य-रूपों के स्तर पर: बाद में जो प्रबंध काव्य (Prabandh Kavya) और मुक्तक (Muktak) का विकास हुआ, उसके बीज यहीं बोए गए। रास, फागु, चरितकाव्य, रासो, चर्यापद, सबदी, पद, दोहा, बारहमासा: ये सारे रूप आदिकाल की देन हैं। रासो कवियों ने बड़ी कथा को सँभालना सिखाया, तो सिद्ध-नाथों ने छोटी, चोट करने वाली वाणी सिखाई।
3. वैचारिक स्तर पर: यह काल केवल वीरता का नहीं, विविधता का काल है। सिद्ध-नाथों की आलोचनात्मक वाणी, जैनियों का नीति-बोध, रासो का वंश-गौरव और लौकिक साहित्य का लोक-राग: इन सबने मिलकर हिंदी को एक साथ कई दिशाएँ दीं। आगे चलकर कबीर में जो निर्गुण चेतना और जायसी में जो प्रेमाख्यान मिलता है, उसकी जड़ें काफ़ी हद तक आदिकाल में देखी जाती हैं। इसलिए द्विवेदी जी ने इसे सिर्फ़ वीरगाथा काल कहने से असहमति जताई।
संक्षेप में, आदिकाल को बीजवपन काल (Seed Period) कहना भी ज़्यादा सही लगता है; यह नाम महावीर प्रसाद द्विवेदी के नाम से प्रचलित है। साहित्यिक परिष्कार भक्तिकाल जैसा न सही, पर ऐतिहासिक और विकासवादी महत्व में यह सबसे निर्णायक काल है।
संक्षिप्त सार| Quick Summary
Adikal is the foundational period of Hindi literature, where the language moved from Apabhramsha to early Hindi forms such as Dingal, Pingal and Hindavi. It developed diverse forms (Raso, Ras, Phagu, Charyapad, Doha, Pad) and diverse ideologies, laying linguistic, formal and ideological groundwork for the Bhakti movement.
निष्कर्ष | Conclusion
आदिकाल को याद रखने का सबसे आसान तरीका यह है कि इसे एक ही सवाल के पाँच जवाबों की तरह पढ़िए: उस दौर में लोग किस चीज़ के लिए लिख रहे थे? सिद्धों ने साधना के लिए, नाथों ने अनुशासन के लिए, जैनों ने नीति और कथा के लिए, रासो कवियों ने आश्रयदाता के यश के लिए और लौकिक कवियों ने मन बहलाने और प्रेम कहने के लिए। परिस्थितियाँ युद्ध और सामंतवाद की थीं, पर साहित्य सिर्फ़ युद्ध का नहीं बना। यही कारण है कि शुक्ल जी का “वीरगाथा” नाम एक प्रवृत्ति पर टिका है, जबकि “आदिकाल” पूरी विविधता को समेट लेता है।
तैयारी के लिए तीन काम कीजिए: (1) पाँच धाराओं की एक तुलना-तालिका अपने शब्दों में बनाइए, (2) रासो की व्युत्पत्ति वाले मत “विद्वान → शब्द” क्रम में लिखकर दोहराइए, (3) पृथ्वीराज रासो की प्रामाणिकता पर शुक्ल और द्विवेदी-नामवर सिंह के पक्ष याद कर लीजिए।

Quick Summary: Adikal’s literature shows five purposes: spiritual practice (Siddha), discipline (Nath), moral narrative (Jain), patron’s glory (Raso) and delight in love and folk life (Laukik). That variety is why “Adikal” is considered wider than “Veergatha Kal”.
घटनाक्रम तालिका | Timeline
| समय (लगभग) | घटना / रचना |
|---|---|
| 647 ई. | हर्षवर्धन की मृत्यु |
| 8वीं शताब्दी (लगभग 769 ई., राहुल जी के अनुसार) | सरहपा; सिद्ध परंपरा |
| लगभग 1000-1027 ई. | महमूद गज़नवी के आक्रमण |
| 1184 ई. (वि.सं. 1241) | भरतेश्वर बाहुबली रास (शालिभद्र सूरि) |
| 1191 / 1192 ई. | प्रथम / द्वितीय तराइन युद्ध |
| 993-1318 ई. (वि.सं. 1050-1375) | शुक्ल के अनुसार वीरगाथा काल |
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- हिंदी साहित्य : इतिहास-लेखन, काल-विभाजन और नामकरण (Unit 1): आदिकाल के नामकरण की पूरी बहस, उसी पेपर की पिछली यूनिट
- बानबेध समय: चंदबरदाई और पृथ्वीराज रासो: रासो का पाठ-आधारित अध्ययन
- विद्यापति पदावली नोट्स: लौकिक धारा के प्रमुख कवि
- कबीर: गुरुदेव कौ अंग, विरह कौ अंग: सिद्ध-नाथ परंपरा के आगे का निर्गुण स्वर
- जायसी: मानसरोदक खंड: प्रेमाख्यान परंपरा
अन्य उपयोगी पृष्ठ: Hindi Sahitya Ka Itihas (Adikal and Madhyakal) श्रेणी · DU Hindi Previous Year Question Papers · DU Hindi Syllabus
University of Delhi Previous Year Questions | DU में पूछे जाने वाले प्रश्न (अभ्यास)
University of Delhi Previous Year Questions | DU में पूछे जाने वाले प्रश्न (अभ्यास)
Paper: DSC-2 — हिन्दी साहित्य का इतिहास (आदिकाल एवं मध्यकाल)
Unit: Unit 2 — आदिकाल
Paper Code: UPC 2052101102
Exam Pattern: Semester I | Duration: 3 Hours | Maximum Marks: 90
Important Note: नीचे दिए गए कुछ प्रश्न PDF से सत्यापित हैं, कुछ source-reported हैं। जिन प्रश्नों का मूल प्रश्न-पत्र में होना उपलब्ध स्रोत से स्थापित नहीं है, उन्हें DU-pattern / Probable के रूप में रखा गया है। PDF में वर्ष स्पष्ट नहीं है, इसलिए कोई वर्ष अनुमान से नहीं जोड़ा गया है। वास्तविक प्रश्न-पत्र के लिए अपने कॉलेज या DU की परीक्षा वेबसाइट पर उपलब्ध पुराने प्रश्न-पत्र देखें।
A. आदिकाल की परिस्थितियाँ एवं नामकरण | Environment and Periodisation
1. हिन्दी साहित्य के काल-विभाजन की समस्या पर विचार कीजिए। आदिकाल की परिस्थितियों पर प्रकाश डालिए। +
Year / Paper: DSC-2 — हिन्दी साहित्य का इतिहास; वर्ष की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: हिन्दी साहित्य के काल-विभाजन के आधार, आदिकाल की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि और तत्कालीन राजनीतिक-सामाजिक परिस्थितियाँ।
Suggested Answer Focus: काल-विभाजन की प्रमुख समस्याओं को स्पष्ट करते हुए आदिकाल की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का साहित्य पर प्रभाव बताइए।
Source-Reported PYQ
2. आदिकाल के नामकरण की समस्या पर विचार कीजिए। आचार्य रामचंद्र शुक्ल के ‘वीरगाथा काल’ नामकरण की सार्थकता पर तर्क दीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: आदिकाल के नामकरण से जुड़ी बहस और विभिन्न साहित्येतिहासकारों के मत।
Suggested Answer Focus: ‘वीरगाथा काल’ नामकरण के आधार और सीमाओं पर चर्चा कीजिए। साथ ही स्पष्ट कीजिए कि समस्त आदिकालीन साहित्य को केवल वीरगाथात्मक साहित्य तक सीमित करना क्यों समस्यापूर्ण हो सकता है।
DU-Pattern / Probable
3. आदिकाल की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियों का वर्णन कीजिए तथा बताइए कि इनका तत्कालीन साहित्य पर क्या प्रभाव पड़ा। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: राजनीतिक विखंडन, सामंती व्यवस्था, धार्मिक साधना-परंपराएँ और लोक-सांस्कृतिक जीवन।
Suggested Answer Focus: प्रत्येक परिस्थिति को संबंधित साहित्यिक प्रवृत्ति से जोड़िए। सिद्ध, नाथ, जैन और रासो साहित्य के उदाहरणों से उत्तर को स्पष्ट बनाइए।
DU-Pattern / Probable
4. आदिकाल को ‘आदिकाल’ ही क्यों कहा जाना चाहिए? हजारीप्रसाद द्विवेदी के मत का विश्लेषण कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: आदिकाल नाम की व्यापकता और ‘वीरगाथा काल’ जैसे नामों की सीमाएँ।
Suggested Answer Focus: नामकरण के आधार, साहित्य की विविध धाराओं और काल की व्यापक साहित्यिक प्रकृति का विश्लेषण कीजिए। विद्वानों के मतों को प्रमाणित संदर्भों के साथ प्रस्तुत करें।
DU-Pattern / Probable
5. हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल-विभाजन पर चर्चा कीजिए। +
Year / Paper: DSC-2, Semester I; UPC 2052101102; Question Paper No. 5186. वर्ष scan में स्पष्ट नहीं है।
Hint: हिन्दी साहित्य के इतिहास के काल-विभाजन के आधार, प्रमुख काल और आदिकाल की स्थिति।
Suggested Answer Focus: काल-विभाजन की पद्धति का परिचय दीजिए और आदिकाल की समय-सीमा तथा नामकरण से संबंधित समस्याओं को स्पष्ट कीजिए।
Source-Verified PYQ
6. आदिकाल की साहित्यिक प्रवृत्तियों को रेखांकित कीजिए। +
Year / Paper: DSC-2, Semester I; UPC 2052101102; Question Paper No. 5186. वर्ष scan में स्पष्ट नहीं है।
Hint: धार्मिक एवं साधनात्मक साहित्य, वीरगाथात्मकता, लोकजीवन तथा तत्कालीन परिस्थितियों से साहित्य का संबंध।
Suggested Answer Focus: सिद्ध, नाथ, जैन, रासो और लौकिक साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों को उदाहरणों के साथ व्यवस्थित कीजिए।
Source-Verified PYQ
B. सिद्ध, नाथ एवं जैन साहित्य | Siddha, Nath and Jain Literature
7. नाथ और जैन साहित्य की विशेषताएँ लिखिए। +
Year / Paper: DSC-2 — हिन्दी साहित्य का इतिहास; वर्ष की स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: नाथ साहित्य की योग-साधना एवं वैराग्यपरक प्रवृत्तियाँ और जैन साहित्य की धार्मिक-नैतिक दृष्टि।
Suggested Answer Focus: दोनों साहित्यिक धाराओं की विषय-वस्तु, भाषा, उद्देश्य और साहित्यिक योगदान का तुलनात्मक विवेचन कीजिए।
Source-Reported PYQ
8. सिद्ध साहित्य की प्रमुख प्रवृत्तियों और विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: सिद्ध परंपरा, सहज साधना, बाह्याडंबर-विरोध, अनुभव और लोकभाषा।
Suggested Answer Focus: सिद्ध साहित्य की धार्मिक-दार्शनिक पृष्ठभूमि, काव्यगत विशेषताएँ और भाषा-शैली को उदाहरणों सहित समझाइए।
DU-Pattern / Probable
9. नाथ साहित्य की दार्शनिक पृष्ठभूमि और साहित्यिक विशेषताओं का विवेचन कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: योग-साधना, गुरु का महत्त्व, वैराग्य, संयम और साधना-प्रधान काव्य।
Suggested Answer Focus: नाथ साहित्य की साधनात्मक दृष्टि, प्रमुख विचारों, भाषा और साहित्यिक योगदान को स्पष्ट कीजिए।
DU-Pattern / Probable
10. जैन साहित्य का परिचय देते हुए अपभ्रंश साहित्य में उसके योगदान की चर्चा कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: जैन आचार, नैतिकता, धार्मिक आख्यान और अपभ्रंश की साहित्यिक परंपरा।
Suggested Answer Focus: जैन साहित्य के उद्देश्य, विषय-वस्तु, प्रमुख रचनात्मक परंपराओं और भाषा-साहित्य के विकास में उसके योगदान का वर्णन कीजिए।
DU-Pattern / Probable
11. सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य में अंतर स्पष्ट कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: तीनों धाराओं की साधना-पद्धति, विचारधारा, विषय-वस्तु, भाषा और साहित्यिक उद्देश्य।
Suggested Answer Focus: तुलनात्मक तालिका या स्पष्ट उपशीर्षकों के माध्यम से समानताओं और भिन्नताओं को प्रस्तुत कीजिए।
DU-Pattern / Probable
12. सिद्ध साहित्य पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। +
Year / Paper: DSC-2, Semester I; UPC 2052101102; Question Paper No. 5186. वर्ष scan में स्पष्ट नहीं है।
Hint: सिद्ध साहित्य का परिचय, प्रमुख प्रवृत्तियाँ, साधना और भाषा।
Suggested Answer Focus: संक्षिप्त परिचय के बाद इसकी प्रमुख विशेषताओं और आदिकालीन साहित्य में महत्त्व का उल्लेख कीजिए।
Source-Verified Short-Note Topic
C. रासो काव्य एवं लौकिक साहित्य | Raso and Secular Literature
13. रासो काव्य से क्या तात्पर्य है? ‘पृथ्वीराज रासो’ की प्रामाणिकता अथवा अप्रामाणिकता के विवाद पर विचार कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: रासो काव्य की प्रकृति, ऐतिहासिकता, पाठ-परंपरा और ‘पृथ्वीराज रासो’ से संबंधित प्रामाणिकता-विवाद।
Suggested Answer Focus: रासो काव्य की विशेषताओं का परिचय देते हुए ‘पृथ्वीराज रासो’ के पाठ और ऐतिहासिक प्रमाणों से जुड़े विवादों का संतुलित विवेचन कीजिए।
DU-Pattern / Probable
14. रासो काव्य परंपरा की प्रमुख प्रवृत्तियाँ लिखिए। चंदबरदाई के योगदान का वर्णन कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: वीरता, युद्ध-वर्णन, आश्रयदाता की प्रशंसा, ऐतिहासिक एवं काव्यात्मक तत्त्व।
Suggested Answer Focus: रासो काव्य की सामान्य प्रवृत्तियों का वर्णन कीजिए और चंदबरदाई तथा ‘पृथ्वीराज रासो’ के संदर्भ में उनके योगदान पर चर्चा कीजिए।
DU-Pattern / Probable
15. आदिकालीन लौकिक साहित्य का परिचय दीजिए। ‘ढोला-मारू रा दूहा’ और ‘वसंत विलास’ के संदर्भ में चर्चा कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: लौकिक जीवन, प्रेम, लोक-संवेदना, ऋतु-वर्णन और सामाजिक-सांस्कृतिक अनुभव।
Suggested Answer Focus: आदिकालीन लौकिक साहित्य की प्रकृति को स्पष्ट करते हुए उल्लिखित रचनाओं के विषय और साहित्यिक महत्त्व का परिचय दीजिए।
DU-Pattern / Probable
16. आदिकाल में युद्धों का सजीव चित्रण हुआ है। इस कथन की सोदाहरण व्याख्या कीजिए। +
Year / Paper: वर्ष की पुष्टि उपलब्ध नहीं है।
Hint: वीर रस, युद्ध-वर्णन, शौर्य, राजपूती आदर्श और रासो काव्य की शैली।
Suggested Answer Focus: युद्ध-वर्णन की विशेषताओं को स्पष्ट कीजिए और उपयुक्त आदिकालीन रचनाओं से उदाहरण दीजिए।
DU-Pattern / Probable
17. रासो काव्य पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। +
Year / Paper: DSC-2, Semester I; UPC 2052101102; Question Paper No. 5186. वर्ष scan में स्पष्ट नहीं है।
Hint: रासो काव्य का अर्थ, प्रमुख विशेषताएँ, वीरगाथात्मक प्रवृत्ति और प्रतिनिधि रचनाएँ।
Suggested Answer Focus: संक्षिप्त परिचय के साथ रासो काव्य की प्रमुख प्रवृत्तियों तथा आदिकालीन साहित्य में उसके स्थान का उल्लेख कीजिए।
Source-Verified Short-Note Topic
D. परीक्षा की तैयारी | Exam Preparation
18. Unit 2 की तैयारी के लिए आदिकाल की परिस्थितियों, नामकरण, सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य तथा रासो काव्य में से किन विषयों को प्राथमिकता देनी चाहिए? +
Suggested Answer Focus: आदिकाल की राजनीतिक, सामाजिक, धार्मिक और सांस्कृतिक परिस्थितियाँ, हिन्दी साहित्य के काल-विभाजन और आदिकाल के नामकरण की समस्या, सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य की विशेषताएँ तथा तुलनात्मक अध्ययन, रासो काव्य की प्रवृत्तियाँ और ‘पृथ्वीराज रासो’ से संबंधित विवाद, आदिकालीन लौकिक साहित्य और प्रमुख रचनाएँ।
Preparation Tip: प्रत्येक विषय के लिए परिभाषा, ऐतिहासिक पृष्ठभूमि, प्रमुख विशेषताएँ, प्रतिनिधि रचनाएँ और निष्कर्ष तैयार रखें।
Exam Preparation
अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | FAQs
आदिकाल को वीरगाथा काल क्यों कहा गया, और क्या यह नाम अब भी मान्य है?
शुक्ल जी ने बारह ग्रंथों की प्रधान प्रवृत्ति के आधार पर यह नाम दिया था। पर बाद के विद्वानों ने दिखाया कि इनमें कुछ ग्रंथ उपलब्ध नहीं, कुछ परवर्ती हैं और कुछ वीर-काव्य हैं ही नहीं। इसलिए व्यापक नाम “आदिकाल” अधिक मान्य है; परीक्षा में दोनों लिखिए।
सरहपा को हिंदी का पहला कवि मानना सही है?
राहुल सांकृत्यायन ने उन्हें हिंदी का आदि कवि माना है, और पाठ्य-सामग्रियों में यही उत्तर प्रचलित है। पर यह सर्वसम्मत नहीं है; कई विद्वान उनकी भाषा को अपभ्रंश या पूर्वी बोलियों से जोड़ते हैं। उत्तर में “राहुल सांकृत्यायन के अनुसार” जोड़ दीजिए।
चर्यापद और दोहाकोश किसने खोजे?
चर्यापद की पोथी हरप्रसाद शास्त्री को 1907 में नेपाल से मिली। सरहपा के दोहाकोश की प्रति राहुल सांकृत्यायन ने तिब्बत के सा-स्क्य मठ से प्राप्त की। दोनों को मिलाकर न लिखें।
गोरखनाथ का समय क्या लिखें?
एक ही तिथि लिखना जोखिम भरा है। राहुल जी 845 ई., द्विवेदी जी नवीं शताब्दी के उत्तरार्ध/दसवीं के पूर्वार्ध और शुक्ल जी तेरहवीं शताब्दी बताते हैं। तीनों मत लिख दें।
रासो शब्द की व्युत्पत्ति में कौन-सा मत सबसे सुरक्षित है?
शुक्ल का ‘रसायण’ और द्विवेदी का ‘रासक’ सबसे अधिक पूछे जाते हैं। दोनों लिखिए और साथ में यह निष्कर्ष कि अधिकांश विद्वान संबंध ‘रास’ परंपरा से मानते हैं।
क्या हर रासो वीर रस का काव्य है?
नहीं। रासो-परंपरा में उपदेशमूलक (जैन रास), शृंगारमूलक (सन्देश रासक, बीसलदेव रास) और वीररसात्मक (पृथ्वीराज रासो, भरतेश्वर बाहुबली रास) तीनों वर्ग हैं।
हम्मीर रासो किसकी रचना है, शारंगधर की या जोधराज की?
हिंदी साहित्य में दोनों नामों से हम्मीर रासो का उल्लेख मिलता है। पाठ्य-चर्चा में प्रायः जोधराज वाला उपलब्ध पाठ आता है, जबकि शारंगधर वाला मूल पाठ आज उपलब्ध नहीं माना जाता। प्रश्न में जो संदर्भ हो, उसी के अनुसार उत्तर दीजिए।
अमीर खुसरो की सभी पहेलियाँ क्या वास्तव में उनकी ही हैं?
खुसरो के नाम से प्रचलित हिंदी रचनाओं का बड़ा हिस्सा मौखिक परंपरा से आया है, इसलिए कुछ विद्वान हर रचना की प्रामाणिकता पर प्रश्न उठाते हैं। उत्तर में “खुसरो के नाम से प्रचलित” लिखना ठीक रहता है।
संदर्भ और बाहरी लिंक | References & External Links
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