Contents
- सभ्यता किसे कहते हैं?
- विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताएं
- सभ्यता का काल विभाजन (Periodisation)
- प्रमुख हड़प्पाई स्थल (Major Sites)
- हड़प्पा सभ्यता की खोज कैसे हुई?
- निर्वाह के तरीके
- हड़प्पा सभ्यता की कृषि प्रौद्योगिकी
- मोहनजोदड़ो का इतिहास
- हड़प्पा सभ्यता की जल निकास प्रणाली
- गृह स्थापत्य (हड़प्पा सभ्यता के घर कैसे बनाए जाते थे?)
- दुर्ग: मालगोदाम और स्नानागार
- सामाजिक भिन्नताओं का अवलोकन
- हड़प्पा सभ्यता में शवाधान
- ‘विलासिता’ की वस्तुओं की खोज
- शिल्प-उत्पादन के विषय में जानकारी
- उत्पादन केंद्रों की पहचान
- माल प्राप्त करने संबंधी नीतियां
- उपमहाद्वीप तथा उससे आगे से आने वाला माल
- सुदूर क्षेत्रों से संबंध
- मुहरें, लिपि तथा बाट
- प्राचीन सत्ता, प्रासाद और शासक
- धार्मिक मान्यताएं और प्रथाएं (Religious Beliefs and Practices)
- सभ्यता का अंत
- कनिंघम का भ्रम
- अंत में (निष्कर्ष)
- पिछले वर्षों के महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Year Questions)
- FAQs
In this post, notes of 12th Class History Lesson – 1 Bricks Beads and Bones are given. These notes are useful for all the students studying in 12th class, preparing for their CBSE Board Exam 2026-27.
इस पोस्ट में 12th Class के History के पाठ – 1 ईटें मनके और अस्थियाँ (Bricks Beads and Bones) के नोट्स दिए गए हैं। ये नोट्स 12th Class में पढ़ रहे सभी विद्यार्थियों के लिए उपयोगी हैं।

सभ्यता किसे कहते हैं?
सभ्यता एक ऐसे समाज को कहा जाता है जिसने एक लेखन प्रणाली, सरकार, श्रम विभाजन और शहरीकरण विकसित किया है।
विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताएं
हड़प्पा सभ्यता की खोज से पहले ये माना जाता था की मेसोपोटामिया की सभ्यता, चीन की सभ्यता और मिस्र की सभ्यता विश्व की सबसे पुरानी सभ्यताएं हैं। लेकिन 1921 में हड़प्पा सभ्यता की खोज के बाद से यह विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता मानी जाने लगी। इस सभ्यता को UNESCO द्वारा World Heritage Site भी घोषित किया गया है, जो इसके ऐतिहासिक महत्व को दर्शाता है।
सभ्यता का काल विभाजन (Periodisation)
पुरातत्वविदों ने हड़प्पा सभ्यता के इतिहास को तीन चरणों में बांटा है:
| चरण | समयकाल | विशेषता |
|---|---|---|
| प्रारंभिक हड़प्पा (Early Harappan) | लगभग 3200 – 2600 ईसा पूर्व | बड़े शहर बनने से पहले का चरण — छोटे-छोटे गांव और कृषि का विकास शुरू हुआ |
| परिपक्व हड़प्पा (Mature Harappan) | लगभग 2600 – 1900 ईसा पूर्व | सभ्यता का स्वर्ण युग — मोहनजोदड़ो, हड़प्पा जैसे बड़े नियोजित शहरों का विकास |
| उत्तर/अंतिम हड़प्पा (Late Harappan) | लगभग 1900 – 1400 ईसा पूर्व | पतन का चरण — लोगों ने बड़े शहर छोड़े, संस्कृति ग्रामीण होती गई |

प्रमुख हड़प्पाई स्थल (Major Sites)
| स्थल | वर्तमान स्थान | प्रसिद्धि |
|---|---|---|
| हड़प्पा | पंजाब, पाकिस्तान | सबसे पहले खोजा गया स्थल (1921) |
| मोहनजोदड़ो | सिंध, पाकिस्तान | सबसे बड़ा शहर, स्नानागार व मालगोदाम |
| कालीबंगन | राजस्थान | जुते हुए खेतों के प्रमाण |
| लोथल | गुजरात | प्रसिद्ध बंदरगाह शहर, डॉकयार्ड |
| धौलावीरा | गुजरात | उन्नत जल प्रबंधन तंत्र |
| चन्हूदड़ो | सिंध, पाकिस्तान | मनके व शिल्प उत्पादन केंद्र |
हड़प्पा सभ्यता की खोज कैसे हुई?
- सन 1856 के दौरान पंजाब (वर्तमान पाकिस्तान में) में रेलवे लाइन बिछाने के लिए उत्खनन का कार्य चल रहा था। उत्खनन के दौरान कुछ लोगों को इस स्थान पर ईटों की बनी दीवारें मिलीं लेकिन इन्हे खंडहर मानकर नजरंदाज कर दिया गया और प्राप्त हुई ईटों को रेलवे कार्य में इस्तेमाल कर लिया गया।
- सन 1861 में भारतीय पुरातत्व विभाग (Archaeological Survey of India) की स्थापना हुई। एलेक्सेंडर कनिंघम इसके पहले डायरेक्टर जनरल थे।
- इसके दूसरे डायरेक्टर जनरल जॉन मार्शल थे जिनके नेतृत्व में हड़प्पा की खोज हुई।
- हड़प्पा सभ्यता की खोज 1921 में दयाराम साहनी के द्वारा हुई।
हड़प्पा सभ्यता को कई नामों से जाना जाता है:
| नाम | कारण |
|---|---|
| हड़प्पा सभ्यता | इस सभ्यता के सबसे पहले अवशेष हड़प्पा नाम की जगह पर मिले थे |
| सिंधु घाटी सभ्यता | यह सभ्यता सिंधु नदी के पास पाई गई है |
| कांस्य युग सभ्यता | इस सभ्यता में ताम्बा और टिन मिलाकर कांसे की खोज हुई थी |
- हड़प्पा सभ्यता से पहले भी इस क्षेत्र में कई विकसित संस्कृतियां अस्तित्व में थीं। इन संस्कृतियों का इतिहास bricks beads and bones की जांच करके पता लगाया जाता है और ये अपनी मृदभांड शैली के लिए जानी जाती थीं।
- आरंभिक हड़प्पा में बस्तियां आम तौर पर छोटी हुआ करती थीं। बड़े पैमाने पर इलाकों के जलाए जाने के साक्ष्य मिलते हैं, जिससे प्रतीत होता है कि आरंभिक हड़प्पा और परिपक्व हड़प्पा सभ्यता के बीच क्रमभंग था।
निर्वाह के तरीके
- विकसित हड़प्पा संस्कृति का आरंभिक हड़प्पा संस्कृति के स्थान पर पनपना हुआ।
- हड़प्पा के निवासी पेड़-पौधों, जानवरों व मछलियों को खाकर अपना जीवन निर्वाह करते थे।
- हड़प्पा सभ्यता में जले अनाज के दाने और बीज भी मिले हैं — जिनमें गेहूं, जौ, दाल, सफ़ेद चना तथा तिल शामिल हैं।
- बाजरे के दाने गुजरात से मिले हैं; चावल के दाने अपेक्षाकृत कम पाए गए हैं।
- हड़प्पा से जानवरों की हड्डियां भी मिली हैं जिनमें मवेशी, भेड़, बकरी, भैंस और सूअर की हड्डियां शामिल हैं — अनुमान है कि ये पालतू थे। इनमें वराह (जंगली सूअर), हिरन और घड़ियाल जैसे जंगली जानवरों की हड्डियां भी मिली हैं।
- मिट्टी की बनी बैलगाड़ी के खिलौने भी मिले हैं, जो दर्शाते हैं कि पशुओं को परिवहन (transport) के लिए भी पालतू बनाया व इस्तेमाल किया जाता था।

हड़प्पा सभ्यता की कृषि प्रौद्योगिकी
- हड़प्पाई लोगों को वृषभ (बैल) की जानकारी थी और यहां से कृषि के साक्ष्य भी मिले हैं।
- चोलिस्तान और बनावली (हरियाणा) से मिट्टी के बने हल भी प्राप्त हुए हैं।
- कालीबंगन (राजस्थान) से जुते हुए खेतों के संकेत मिले हैं, जहां हल रेखाओं के दो समूह एक-दूसरे को समकोण पर काटते हुए मिले हैं — जिससे मालूम होता है दो अलग फसलों को एक साथ उगाया जाता था।
- अफगानिस्तान में शोर्तुघई नामक स्थान से नहरों के अवशेष मिले हैं। एक अनुमान यह भी है कि खेतों की जुताई कुओं से भी की जाती होगी।
- धौलावीरा (गुजरात) में जलाशयों का प्रयोग कृषि के लिए जल संचयन हेतु किया जाता था।
मोहनजोदड़ो का इतिहास
हड़प्पा सभ्यता का सबसे अनूठा शहरी केंद्र मोहनजोदड़ो है। मोहनजोदड़ो की खोज रखाल दास बनर्जी के द्वारा 1922 में की गई। यह ब्रिटानिका (Britannica) के अनुसार सिंधु सभ्यता के दो प्रमुख केंद्रों में से एक था, दूसरा हड़प्पा।
- बस्तियां दो भागों में बंटी थीं — “निचला शहर” और ऊंचाई पर बना शहर (दुर्ग)।
- दुर्ग की ऊंचाई का कारण इसका कच्ची ईटों के चबूतरे पर बना होना है। दुर्ग को चारों ओर से दीवारों से घेरा गया है ताकि इसे निचले शहर से अलग किया जा सके।
- निचले शहर को भी दीवारों से घेरा गया है और इसमें भी कई भवनों को ऊँचे चबूतरों पर बनाया गया है — जिससे लगता है कि निर्माण से पहले नियोजन किया गया होगा।
- घरों को बनाने में धूप में सुखाई गई ईंटों का उपयोग किया गया था, जिनकी लंबाई और चौड़ाई क्रमशः ऊंचाई की चार गुनी और दोगुनी होती थी (समान अनुपात)।

हड़प्पा सभ्यता की जल निकास प्रणाली
- हड़प्पा की सबसे अनूठी विशेषता इसकी जल निकास प्रणाली है।
- सड़कों और गलियों को ग्रिड पद्धति के अनुसार बनाया गया था — ये सड़कें व नालियां एक-दूसरे को समकोण पर काटती हैं।
- सबसे पहले सड़कों व नालियों का निर्माण किया जाता था, इसके बाद इनके इर्द-गिर्द घरों का निर्माण किया जाता था।

गृह स्थापत्य (हड़प्पा सभ्यता के घर कैसे बनाए जाते थे?)
- मोहनजोदड़ो का निचला शहर आवासीय भवनों का उदाहरण प्रस्तुत करता है, जहां आँगन को केंद्र में रखकर भवन बनाए जाते थे — खाना पकाने, कातने जैसे कार्यों के लिए आँगन का उपयोग होता था।
- गर्म और शुष्क मौसम में एकांतता को अधिक महत्व दिया जाता था, इसलिए भू-तल पर बने घर के हिस्से में खिड़कियां नहीं लगाई जाती थीं।
- प्रत्येक घर में एक स्नानघर होता था जिसकी नाली दीवार के माध्यम से सड़क की नालियों से जुड़ी होती थी। कुछ घरों में सीढ़ियां और कुएँ भी पाए गए हैं — मोहनजोदड़ो में कुल कुओं की संख्या 700 आंकी गई है।

दुर्ग: मालगोदाम और स्नानागार
मोहनजोदड़ो का मालगोदाम — यह एक विशाल संरचना है जिसका निचला हिस्सा ईंटों का बना हुआ है, जबकि इसके ऊपरी हिस्से के बारे में अनुमान लगाया गया है कि वह लकड़ी का रहा होगा जो बहुत समय पहले नष्ट हो गया।
मोहनजोदड़ो का स्नानागार — यह एक आयताकार जलाशय है जो आँगन में बना है। जलाशय के उत्तरी और दक्षिणी भाग में सीढ़ियां हैं जो इसके तल तक पहुंचती हैं। जलाशय को जिप्सम के गारे से जलबद्ध किया गया है, इसके तीनों ओर कक्ष बने हुए हैं, और पानी बड़े नाले के द्वारा बाहर निकाला जाता था।

सामाजिक भिन्नताओं का अवलोकन
हड़प्पा सभ्यता में शवाधान
- हड़प्पा में ज्यादातर शव जमीन में दफन मिले हैं। कुछ कब्रों की सतह ईंटों से चुनी हुई भी मिली हैं, और कुछ कब्रों में मृदभांड व आभूषण भी पाए गए हैं — पुरुषों और महिलाओं दोनों की कब्रों से मृदभांड व आभूषण मिले हैं। कहीं-कहीं शव के साथ तांबे का दर्पण भी पाया गया है।

‘विलासिता’ की वस्तुओं की खोज
विलासिता की वस्तुओं को पहचानने के लिए एक पद्धति का उपयोग किया जाता है जिसमें चीजों को दो वर्गों में बांटा जाता है:
- पहला वर्ग — रोज़मर्रा की वस्तुएं, जैसे पत्थर व मिट्टी से बनी वस्तुएं।
- दूसरा वर्ग — दुर्लभ व महंगी चीजें, जैसे फयांश (घिसी हुई रेत/बालू और रंग को चिपचिपे पदार्थ में मिलाकर आग में पकाकर बनाई गई वस्तु)।
जयादातर दुर्लभ वस्तुएं मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े शहरों में पाई गई हैं, जबकि कालीबंगन जैसे छोटे केंद्रों में महंगी व दुर्लभ वस्तुएं न के बराबर पाई गई हैं।
शिल्प-उत्पादन के विषय में जानकारी
- शिल्प कार्यों में मनके बनाना, शंख की कटाई, धातुकर्म, मुहर निर्माण आदि शामिल हैं।
- कार्निलियन (सुंदर लाल रंग का पत्थर), जैस्पर, स्फटिक, क्वार्ट्ज़ और सेलखड़ी जैसे उपयोगी पत्थर पाए गए हैं। तांबा, कांसा और सोना जैसी धातुएं भी पाई गई हैं।
- शंख, फयांस और पकी मिट्टी का प्रयोग मनके बनाने के लिए किया जाता था। कुछ मनके दो या दो से ज्यादा पत्थरों को जोड़कर बनाए गए प्रतीत होते हैं।
- सेलखड़ी मुलायम पत्थर होने के कारण इसका चूर्ण बनाकर और सांचों में डालकर मनके बनाए जाते थे — ये बाकियों की अपेक्षा आसानी से बन जाते थे।
- कार्निलियन (लाल रंग का पत्थर) को पीले रंग के कच्चे माल से कई चरणों से गुजारने के बाद आग में पकाकर बनाया जाता था।

उत्पादन केंद्रों की पहचान
पुरातत्वविद उत्पादन केंद्रों की पहचान इन आधारों पर करते हैं:
- प्रस्तर पिंड, पूरे शंख तथा तांबा अयस्क जैसा कच्चा माल, औजार, अपूर्ण वस्तुएं, त्याग दिया गया माल और कूड़ा-कर्कट।
- कूड़े-कर्कट को उत्पादन केंद्र की पहचान के लिए सबसे अच्छा साधन माना जाता है।
- छोटे विशिष्ट केंद्रों के अतिरिक्त मोहनजोदड़ो और हड़प्पा जैसे बड़े शहरों में भी शिल्प उत्पादन होता था।
माल प्राप्त करने संबंधी नीतियां
- पत्थर, लकड़ी और धातु जलोढ़ मैदान से बाहर के क्षेत्र से मंगाए जाते थे। बैलगाड़ी के मिट्टी से बने खिलौने मिलने से पता चलता है कि परिवहन के लिए बैलगाड़ी का प्रयोग किया जाता था। सिंधु और इसकी उपनदियों के माध्यम से भी सामान की आवाजाही होती होगी।
उपमहाद्वीप तथा उससे आगे से आने वाला माल
- नागेश्वर और बालाकोट (समुद्र तट के नजदीक बसे शहर) में शंख आसानी से उपलब्ध था, जिस कारण यहां बस्तियां बनी होंगी।
- अफगानिस्तान के शोर्तुघई से नीले रंग का पत्थर लाजवर्द मणि मंगाया जाता था।
- लोथल (गुजरात) से कार्निलियन, सेलखड़ी (दक्षिणी राजस्थान तथा उत्तरी गुजरात से), और धातु (राजस्थान से) आते थे। राजस्थान के खेतड़ी अंचल (तांबे के लिए) और दक्षिण भारत (सोने के लिए) जैसे क्षेत्रों में भी अभियान भेजे जाते थे।
सुदूर क्षेत्रों से संबंध
- राजस्थान के खेतड़ी अंचल के अलावा ओमान से भी तांबा मंगाया जाता था — ओमानी तांबे तथा हड़प्पाई पुरावस्तुओं, दोनों में निकल के अंश मिले हैं, जो साझा उद्भव की ओर इशारा करते हैं।
- हड़प्पाई मर्तबान जिसके ऊपर काली मिट्टी की मोटी परत चढ़ाई गई थी, ऐसे ही मर्तबान ओमान से भी मिले हैं (तरल पदार्थ रखने के लिए उपयोग)।
- मेसोपोटामिया के तांबे में भी निकल के अंश मिलना बताता है कि मेसोपोटामिया और हड़प्पा में व्यापार चलता था। लंबी दूरी के व्यापार की पहचान हड़प्पाई मुहर, बाट, पासे तथा मनके से की जाती है।
- मेसोपोटामिया के लेखों में दिलमुन (बहरीन द्वीप) से मगान तथा मेलुहा (नाविकों का देश) से संपर्क का उल्लेख है — संभवतः ये नाम हड़प्पाई क्षेत्रों की ओर इशारा करते हैं।
मुहरें, लिपि तथा बाट
मुहरें और मुद्रांकन — मुहरों और मुद्राओं का प्रयोग लंबी दूरी के संपर्क को सुविधाजनक बनाने के लिए किया जाता था।
एक रहस्यमई लिपि — हड़प्पाई लिपि आज तक इन कारणों से रहस्यमई बनी हुई है:
- लिपि का चित्रात्मक होना
- अभी तक के सबसे लंबे प्राप्त लेख में 26 चिन्ह हैं
- लिपि आज तक पढ़ी नहीं जा सकी
- लिपि में चिन्हों की संख्या 375-400 के बीच है
- लिपि दाईं ओर से बाईं ओर लिखी जाती थी

बाट — लेन-देन बाटों की प्रणाली के द्वारा किया जाता था। बाट चर्ट नाम के पत्थर से बनाए जाते थे, आयताकार होते थे और इन पर कोई चिन्ह नहीं होता था। छोटे बाटों का इस्तेमाल संभवतः मनके व आभूषण तौलने में होता था; धातु से बने तराजू के पलड़े भी मिले हैं।
प्राचीन सत्ता, प्रासाद और शासक
हड़प्पाई सभ्यता में असाधारण एकरूपता मिली है — मृदभांड, मुहरों, बाटों तथा ईंटों जैसी वस्तुएं सभी स्थानों (जम्मू से गुजरात तक) से एक समान पाई गई हैं।

- हड़प्पा सभ्यता में सत्ताधारी लोगों के बारे में पुरातत्वविदों को कोई खास जानकारी नहीं मिली है।
- मोहनजोदड़ो में एक विशाल भवन पाया गया है जिसे “प्रासाद” नाम दिया गया, और एक पत्थर की मूर्ति को “पुरोहित राजा” की संज्ञा दी गई है।
- कुछ पुरातत्वविदों का मानना है कि हड़प्पा सभ्यता में कोई राजा नहीं रहा होगा — सभी लोग समान रहे होंगे। एक अनुमान यह भी है कि हड़प्पा, मोहनजोदड़ो आदि के लिए अलग-अलग कई राजा रहे होंगे, हालांकि एक ही राजा वाला अनुमान इतने बड़े साम्राज्य के हिसाब से कम विश्वसनीय लगता है।
धार्मिक मान्यताएं और प्रथाएं (Religious Beliefs and Practices)
- मातृ देवी (Mother Goddess): मिट्टी की बनी स्त्री मूर्तियां मिली हैं, जिन्हें उर्वरता (fertility) की देवी माना जाता है।
- पशुपति शिव (Proto-Shiva): एक मोहर पर योग-मुद्रा में बैठे पुरुष देवता का चित्र मिला है, जिसके चारों ओर जानवर बने हैं — इसे पशुपति शिव का प्रारंभिक रूप माना जाता है।
- प्रकृति पूजा (Nature Worship): पीपल के वृक्ष, सांड (bull) और पत्थर के लिंग (phallic symbols) की पूजा के साक्ष्य मिले हैं।
- दफनाने की प्रथाएं: मुर्दों को गड्ढों में दफनाया जाता था, कभी-कभी बर्तन व गहनों के साथ (जैसा ऊपर “शवाधान” खंड में बताया गया है)।

सभ्यता का अंत
- लगभग 1800 ईसा पूर्व तक चोलिस्तान क्षेत्र से अधिकतर बस्तियों को त्याग दिया गया था, जबकि गुजरात, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश के क्षेत्रों में बस्तियां बढ़ने लगी थीं।
- उत्तर हड़प्पा के क्षेत्र 1900 ईसा पूर्व के बाद भी अस्तित्व में थे। इस दौरान बाटों, मुहरों, मानकों का समाप्त होना, लेखन व लंबी दूरी के व्यापार का ह्रास, और आवास निर्माण कला का पतन देखने को मिलता है — संस्कृति ग्रामीण होती गई।
- इस संस्कृति को “उत्तर हड़प्पा” या “अनुवर्ती संस्कृतियों” के नाम से जाना जाता है।
कनिंघम का भ्रम
भारतीय पुरातात्विक सर्वेक्षण के पहले डायरेक्टर जनरल कनिंघम ने उन्नीसवीं शताब्दी के मध्य से पुरातात्विक उत्खनन शुरू किए। प्रारंभिक बस्तियों की पहचान के लिए उन्होंने 7वीं शताब्दी के चीनी यात्रियों के वृतांतों का सहारा लिया, लेकिन उन्हें इस सभ्यता का कोई प्रमाण नहीं मिला। कनिंघम को यह भ्रम था कि यह सभ्यता लगभग 400-700 ईसा पूर्व पुरानी होगी — उन्हें अंदाजा नहीं था कि हड़प्पा सभ्यता लगभग 2600 ईसा पूर्व पुरानी भी हो सकती है।
अंत में (निष्कर्ष)
इतिहास के इस पाठ — ईंटें मनके और अस्थियाँ (Bricks Beads and Bones) — में हमें विश्व की सबसे पुरानी सभ्यता (हड़प्पा सभ्यता) के बारे में कई प्रकार की जानकारियां मिलती हैं। पाठ से हमें हड़प्पा के निवासियों के जीवन, भोजन और व्यापार संबंधी जानकारियां मिलती हैं। अगले अध्याय “राजा, किसान और नगर” में हम मौर्य साम्राज्य और उससे जुड़े विषयों को पढ़ेंगे।
पिछले वर्षों के महत्वपूर्ण प्रश्न (Previous Year Questions)
Previous Year Questions — Harappan Civilization
Note — यह पोस्ट CBSE Class 12 Board Exam pattern पर आधारित है। प्रश्नों के साथ दिए गए hints quick-answer preparation में मदद करेंगे।
1 हड़प्पा सभ्यता की खोज कैसे हुई? संक्षेप में बताइए। +
2 हड़प्पा सभ्यता को सिंधु घाटी सभ्यता क्यों कहा जाता है? +
3 मोहनजोदड़ो के स्नानागार का वर्णन कीजिए। यह किस उद्देश्य के लिए प्रयोग किया जाता था? +
4 हड़प्पा सभ्यता की जल निकास प्रणाली की विशेषताएं बताइए। +
5 हड़प्पा सभ्यता में विलासिता की वस्तुओं की पहचान कैसे की जाती थी? +
6 हड़प्पा सभ्यता के पतन के कारणों की विवेचना कीजिए। +
7 हड़प्पाई मुहरों का क्या महत्व था? +
8 हड़प्पा सभ्यता के दूरस्थ क्षेत्रों (मेसोपोटामिया, ओमान) से संबंधों पर प्रकाश डालिए। +
9 हड़प्पा सभ्यता के तीन चरणों (Early, Mature, Late) को उनके समयकाल सहित लिखिए। +
10 पशुपति मुहर (Pashupati Seal) का ऐतिहासिक महत्व क्या है? +
FAQs
हड़प्पा सभ्यता की खोज किसने और कब की थी?
हड़प्पा सभ्यता की खोज 1921 में दयाराम साहनी द्वारा की गई थी, जॉन मार्शल के निर्देशन में। मोहनजोदड़ो की खोज रखाल दास बनर्जी ने 1922 में की।
हड़प्पा सभ्यता को कांस्य युग सभ्यता क्यों कहा जाता है?
क्योंकि इस सभ्यता में तांबे और टिन को मिलाकर कांसे (bronze) की खोज हुई थी, जो इस युग की पहचान बना।
मोहनजोदड़ो के स्नानागार का क्या उपयोग था?
यह एक आयताकार जलाशय है जिसे जिप्सम के गारे से जलबद्ध किया गया था — इसका उपयोग संभवतः अनुष्ठानिक स्नान (ritual bathing) के लिए किया जाता था।
हड़प्पाई लिपि को अब तक क्यों नहीं पढ़ा जा सका?
लिपि चित्रात्मक है, इसमें 375-400 चिन्ह हैं, सबसे लंबे लेख में भी सिर्फ 26 चिन्ह मिले हैं और अभी तक कोई द्विभाषी अभिलेख (bilingual inscription) नहीं मिला — इसलिए यह आज तक अनसुलझी है।
हड़प्पा सभ्यता का पतन कब और कैसे हुआ?
लगभग 1800 ईसा पूर्व तक चोलिस्तान की अधिकतर बस्तियां त्याग दी गईं। इस दौरान लेखन, मुहर-प्रणाली, और लंबी दूरी के व्यापार में गिरावट आई और सभ्यता धीरे-धीरे ग्रामीण चरित्र की हो गई।
हड़प्पा सभ्यता में बाट (weights) किस पत्थर से बनते थे?
बाट चर्ट नामक पत्थर से बनाए जाते थे और आयताकार होते थे, बिना किसी चिन्ह के।
हड़प्पा सभ्यता को तीन चरणों में क्यों बांटा जाता है?
पुरातत्वविद इसे Early (3200-2600 BCE), Mature (2600-1900 BCE) और Late Harappan (1900-1400 BCE) चरणों में बांटते हैं ताकि सभ्यता के विकास, चरम और पतन को अलग-अलग समझा जा सके।
पशुपति शिव मुहर किसके बारे में है?
यह एक मोहर है जिस पर योग-मुद्रा में बैठे एक पुरुष देवता को जानवरों से घिरा दिखाया गया है, जिसे विद्वान शिव के प्रारंभिक रूप (proto-Shiva) से जोड़कर देखते हैं।

