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हिंदी साहित्य : इतिहास-लेखन, काल-विभाजन और नामकरण | DU BA Hindi Hons Notes

Contents

पाठ्यक्रम: BA (Hons.) Hindi, Semester 1 · DSC-2 “हिन्दी साहित्य का इतिहास (आदिकाल एवं मध्यकाल)” · University of Delhi · Unit 1

अगर आप जानना चाहते हैं कि हिंदी साहित्य का इतिहास पहली बार किसने लिखा, उसका काल-विभाजन किस आधार पर होता है, और आदिकाल के इतने अलग-अलग नाम क्यों हैं, तो यह यूनिट आपके इन्हीं सवालों के जवाब देती है। संक्षेप में उत्तर यह है: साहित्येतिहास रचनाओं की सूची नहीं, कार्य-कारण पर टिका मूल्यांकन है। इसकी परंपरा गार्सां द तासी से शुरू होकर शिवसिंह सेंगर, ग्रियर्सन और मिश्रबंधुओं से गुज़रती हुई आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1929) तक पहुँचती है। शुक्ल जी का चार-चरणों वाला काल-विभाजन आज भी मानक माना जाता है। आदिकाल के नामकरण पर सबसे ज़्यादा बहस है, और यही वह हिस्सा है जिसे परीक्षा की तैयारी में सबसे ध्यान से पढ़ना चाहिए।

इस यूनिट में क्या पढ़ें | What You Will Learn

  • पृष्ठभूमि: साहित्येतिहास का अर्थ, स्वरूप और इतिहास से उसका अंतर
  • परंपरा: तासी, सेंगर, ग्रियर्सन, मिश्रबंधु, शुक्ल और उनके बाद के इतिहासकार
  • काल-विभाजन: आधार, समस्याएँ और अलग-अलग इतिहासकारों की योजनाएँ (संवत् से ईस्वी रूपांतरण सहित)
  • नामकरण: आदिकाल के नाम (वीरगाथा, चारण, सिद्ध-सामंत, बीजवपन आदि) और उन पर आपत्तियाँ
  • पद्धति: वर्णानुक्रम से लेकर शुक्ल की वैज्ञानिक-समाजशास्त्रीय पद्धति तक; ग्रंथों की तुलना
  • अभ्यास: DU-pattern प्रश्न, उत्तर लिखने की रूपरेखा और FAQ

यह सामग्री UGC के e-PG Pathshala (INFLIBNET) की पाठ्य-सामग्री, उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की स्व-अध्ययन सामग्री और मूल इतिहास-ग्रंथों के संदर्भों के मिलान से तैयार की गई है। पाठ्यक्रम का आधिकारिक ढाँचा दिल्ली विश्वविद्यालय की UGCF 2022 पाठ्यक्रम-सूची में देखा जा सकता है।


पृष्ठभूमि | Background

साहित्येतिहास का अर्थ और स्वरूप | Meaning and Nature of Sahitya Itihas

साहित्येतिहास (Sahitya Itihas) दो शब्दों से बना है, साहित्य और इतिहास। इतिहास का मतलब है बीते समय की घटनाओं का ब्यौरा। पर साहित्येतिहास सिर्फ़ ब्यौरे की नकल नहीं है। ध्यान दीजिए, यहाँ एक बुनियादी फ़र्क़ समझना ज़रूरी है।

साधारण इतिहास में राजा, युद्ध और सन्-संवत् होते हैं। साहित्येतिहास में कवि, उनकी रचनाएँ और उस समय की प्रवृत्तियाँ (Pravritti) होती हैं। साहित्येतिहास केवल रचनाओं की सूची (List) नहीं है। वह यह भी बताता है कि किसी खास समय में किसी खास तरह का साहित्य क्यों लिखा गया, और उसके पीछे कौन-सी सामाजिक, धार्मिक या राजनीतिक वजह थी।

आधारसाधारण इतिहाससाहित्येतिहास
मुख्य सामग्रीराजा, युद्ध, शासन, घटनाएँकवि, रचनाएँ, काव्य-प्रवृत्तियाँ
काल-क्रम का आधारसन्-संवत्, राजवंशसाहित्यिक प्रवृत्तियों का उदय, उत्कर्ष और ह्रास
मूल प्रश्नक्या हुआ?क्या लिखा गया, क्यों लिखा गया और उसका साहित्यिक मूल्य क्या है?
दृष्टिघटनाओं का ब्यौरामूल्यांकन और चयन

इसके स्वरूप को तीन बातों से समझना आसान रहेगा:

  • क्रमबद्धता (Chronology): रचनाओं और रचनाकारों को समय के क्रम में सजाना, यानी बिखरे हुए नामों को एक धागे में पिरोना।
  • कार्य-कारण संबंध (Cause and Effect Relationship): यह साहित्येतिहास की आत्मा है। परीक्षा की दृष्टि से यह बिंदु बहुत महत्त्वपूर्ण है। जैसे, भक्ति आंदोलन अचानक क्यों उभरा? आदिकाल में चारण-परंपरा की रचनाएँ उसी दौर में क्यों मिलती हैं? साहित्येतिहास इन्हीं सवालों के जवाब देता है।
  • मूल्यांकन और चयन (Evaluation and Selection): सिर्फ़ यह बताना नहीं कि क्या लिखा गया, बल्कि यह परखना भी कि उसमें से क्या महत्त्वपूर्ण है और उसका साहित्यिक मूल्य क्या है।

आचार्य रामचंद्र शुक्ल का मत इस पूरी समझ की नींव है। उनके अनुसार साहित्य जनता की चित्तवृत्ति (Collective Consciousness) का संचित प्रतिबिंब है, इसलिए साहित्येतिहास उसी चित्तवृत्ति के बदलने की कहानी है। उनके शब्दों का सार यह है कि आदि से अंत तक चित्तवृत्तियों की परंपरा को परखना और साहित्य-परंपरा के साथ उनका सामंजस्य दिखाना ही साहित्य का इतिहास कहलाता है।

Quick Summary: Sahitya Itihas is not just a list of books; it is a chronological, cause-and-effect and evaluative account of literature linked to society. For Shukla, literature reflects the collective mind (Chittavritti) of the people, and literary history traces how that mind changes.

हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की परंपरा का परिचय | Introduction to the Tradition of Hindi Itihas-Lekhan

हिंदी साहित्य का इतिहास लिखने की शुरुआत हिंदी वालों ने नहीं, विदेशी विद्वानों ने की थी। यह बात थोड़ी अजीब लगती है, पर यही सच है। इस परंपरा को आप चार पड़ावों में याद रख सकते हैं, और फिर पाँचवाँ पड़ाव शुक्ल जी के बाद का है।

1. शुरुआती विदेशी प्रयास: गार्सां द तासी (Garcin de Tassy) फ़्रांसीसी विद्वान गार्सां द तासी का ग्रंथ Histoire de la littérature hindouie et hindoustanie (हिंदी में प्रचलित उच्चारण: ‘इस्त्वार द ला लितरेत्यूर ऐन्दुई ए ऐन्दुस्तानी’) फ़्रेंच भाषा में लिखा गया। इसका पहला भाग 1839 में और दूसरा भाग 1847 में छपा; परिवर्धित दूसरा संस्करण 1870-71 में आया। इसमें हिंदी और उर्दू, दोनों के लगभग 738 कवि-लेखक हैं, जिनमें हिंदी के कवि केवल 72 बताए जाते हैं। कवियों का क्रम वर्णानुक्रम (अकारादि क्रम) है, काल-क्रम नहीं, इसलिए इसमें काल-विभाजन है ही नहीं। तासी ने स्वयं माना था कि अधूरी सूचनाओं के कारण वे काल-क्रम नहीं अपना सके। हिंदी साहित्य के प्रथम इतिहास-लेखक के रूप में उन्हें प्रायः स्वीकार किया जाता है।

ध्यान दीजिए: प्रथम इतिहासकार के प्रश्न पर विद्वानों में थोड़ा मतभेद भी है। नलिन विलोचन शर्मा के अनुसार युग-विभाजन, पृष्ठभूमि-निर्देश, प्रवृत्ति-निरूपण और मूल्यांकन के प्रयासों के कारण यदि ग्रियर्सन के ग्रंथ को हिंदी साहित्य का पहला (वास्तविक) इतिहास माना जाए तो वह उचित ही होगा। फिर भी परीक्षा में “प्रथम इतिहास-लेखक: गार्सां द तासी” लिखना सुरक्षित और मान्य उत्तर है, और चाहें तो एक पंक्ति में यह मतभेद जोड़ दीजिए।

2. कवि-वृत्त संग्रह का दौर: शिवसिंह सेंगर और जॉर्ज ग्रियर्सन शिवसिंह सेंगर का शिवसिंह सरोज किसी भारतीय द्वारा हिंदी कवियों पर लिखा गया पहला बड़ा ग्रंथ माना जाता है। इसमें लगभग 1000 (1003) कवियों का परिचय है। प्रचलित पाठ्य-परंपरा में इसका वर्ष 1883 लिखा जाता है। शोध-स्रोतों के अनुसार इसका पहला संस्करण 1878 में निकला था और 1883 में संशोधित-परिवर्धित संस्करण आया; इसलिए उत्तर में “1883 (प्रथम संस्करण 1878)” लिखना सबसे सुरक्षित है। इसकी ताक़त इसकी सामग्री-संचय में है, विश्लेषण में नहीं। शुक्ल जी ने इसे ‘वृत्तसंग्रह’ कहा है, और इसमें प्रवृत्तियों के आधार पर विभाजन नहीं मिलता।

जॉर्ज ग्रियर्सन (George Grierson) की The Modern Vernacular Literature of Hindustan (1889) में कालक्रम, साहित्यिक प्रवृत्ति और व्यक्तियों के नामों का सहारा लेकर इतिहास दिखाने की कोशिश की गई। यह ग्यारह अध्यायों में बँटी है, यानी काल-क्रम और प्रवृत्ति दोनों को मिलाकर इतिहास रचने का पहला उल्लेखनीय प्रयास। कई पाठ्यपुस्तकों में इसका वर्ष 1888 मिलता है; शोध-स्रोत 1889 देते हैं।

3. हिंदी में व्यवस्थित प्रयास: मिश्रबंधु श्यामबिहारी मिश्र, शुकदेव बिहारी मिश्र और गणेश बिहारी मिश्र ने मिश्रबंधु विनोद लिखा। इसके पहले तीन भाग 1913 में आए और चौथा भाग बाद में (विभिन्न स्रोतों में इसका वर्ष अलग-अलग मिलता है, इसलिए परीक्षा में केवल 1913 लिखना ठीक रहता है)। इसमें लगभग 4591 कवियों का विवरण है (कुछ स्रोत इसे ‘लगभग पाँच हज़ार’ कहते हैं)। इसका काल-विभाजन ग्रियर्सन से अधिक विकसित है और उसका मुख्य आधार भाषा का विकास है। फिर भी शुक्ल जी ने इसे ‘बड़ा भारी कवि-वृत्त-संग्रह’ कहा, क्योंकि इसमें विचार-शृंखला (आलोचनात्मक दृष्टि) कमज़ोर थी।

4. वैज्ञानिक इतिहास की नींव: आचार्य रामचंद्र शुक्ल (1929) शुक्ल जी का हिंदी साहित्य का इतिहास 1929 में आया। यह पहले काशी नागरी प्रचारिणी सभा के हिंदी शब्दसागर की भूमिका के रूप में लिखा गया था और बाद में स्वतंत्र ग्रंथ बना। उन्होंने पहली बार युग की परिस्थितियों से साहित्य की प्रवृत्तियों को जोड़ा और कालों का सुसंगत विभाजन व नामकरण किया। हिंदी साहित्य-इतिहास के अध्ययन में यह ग्रंथ सबसे अधिक संदर्भित आधार-ग्रंथ है। आपके कॉलेज की संदर्भ-ग्रंथ सूची में कौन-सा संस्करण निर्धारित है, यह शिक्षक या पाठ्यक्रम-सूची से मिला लीजिए।

5. शुक्ल जी के बाद (संक्षेप में, क्योंकि इनके नाम आगे के प्रश्नों में काम आते हैं):

  • श्यामसुंदर दास, हिंदी भाषा और साहित्य (1930): प्रवृत्तियों की धारावाहिकता दिखाने वाली पद्धति।
  • रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ (1931): जैविक विकास (बाल्य-किशोर-युवा) के रूपक से काल-विभाजन।
  • सूर्यकांत शास्त्री (1932), अयोध्यासिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ (1934), रामकुमार वर्मा, हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास (1938): ज़्यादातर शुक्ल जी के ढाँचे को थोड़े हेर-फेर के साथ अपनाया।
  • हजारीप्रसाद द्विवेदी: हिंदी साहित्य की भूमिका (1940), हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास (1952) और हिंदी साहित्य का आदिकाल (1952)।
  • गणपतिचंद्र गुप्त, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास (1965) और रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास (1986)।
  • नागरी प्रचारिणी सभा की सोलह खंडों वाली योजना हिंदी साहित्य का वृहत् इतिहास।

एक नज़र में तालिका

ग्रंथलेखकवर्षमुख्य बातसीमा
Histoire de la littérature hindouie et hindoustanieगार्सां द तासी1839 (भाग 1), 1847 (भाग 2), 1870-71 (परिवर्धित)फ़्रेंच में; हिंदी-उर्दू कवि; सामान्यतः हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास-लेखनवर्णानुक्रम; काल-विभाजन नहीं; हिंदी के कवि बहुत कम (72)
शिवसिंह सरोजशिवसिंह सेंगर1883 (प्रथम संस्करण 1878)लगभग 1000 कवियों का वृत्त; भारतीय द्वारा पहला बड़ा प्रयासप्रवृत्ति-विश्लेषण का अभाव; कई तथ्य अप्रमाणित
The Modern Vernacular Literature of Hindustanजॉर्ज ग्रियर्सन1889काल-क्रम और प्रवृत्ति को जोड़ने का पहला प्रयास; ग्यारह अध्यायनामकरण का एक ही आधार नहीं; कहीं काल, कहीं प्रवृत्ति, कहीं व्यक्ति
मिश्रबंधु विनोदमिश्रबंधु1913 (पहले तीन भाग)लगभग 4591 कवि; भाषा-विकास आधारित विभाजनविचार-शृंखला कमज़ोर; शुक्ल जी की नज़र में ‘वृत्त-संग्रह’
हिंदी साहित्य का इतिहासरामचंद्र शुक्ल1929परिस्थिति-चित्तवृत्ति-प्रवृत्ति का संबंध; सुसंगत काल-विभाजनसिद्ध-नाथ-जैन साहित्य को धार्मिक मानकर साहित्य-परिधि से बाहर रखा; ‘फुटकल’ खाते की आलोचना
तासी, सेंगर, ग्रियर्सन, मिश्रबंधु, शुक्ल और द्विवेदी के ग्रंथों की समय-रेखा
प्रमुख इतिहास-ग्रंथ वर्ष-क्रम में

Quick Summary: The tradition begins with Garcin de Tassy (1839), who arranged Hindi-Urdu poets alphabetically. Shiv Singh Sengar (Saroj, 1883; first edition 1878) and Mishrabandhu Vinod (1913) collected large poet-lists, Grierson (1889) mixed chronology with tendency, and Shukla (1929) built the first systematic cause-and-effect history.


काल-विभाजन एवं नामकरण | Kal-Vibhajan and Namkaran

काल-विभाजन : आधार और समस्याएँ | Kal-Vibhajan: Bases and Problems

हिंदी साहित्य का इतिहास लगभग एक हज़ार साल लंबा है। इतने बड़े समय को एक साथ समझना आसान नहीं, इसलिए उसे छोटे-छोटे टुकड़ों में बाँटा जाता है। इसी बँटवारे को काल-विभाजन (Kal-Vibhajan / Periodization) कहते हैं। इसका मक़सद इतिहास को सजाना भर नहीं, बल्कि प्रवृत्तियों के विकास-क्रम को परिस्थितियों के संदर्भ में स्पष्ट करना है।

अब सवाल उठता है कि बाँटने का आधार क्या हो। सिर्फ़ राजाओं के युद्ध या सन्-संवत् के आधार पर साहित्य को नहीं बाँटा जा सकता, क्योंकि साहित्य का अपना स्वभाव होता है। विद्वानों ने मुख्यतः इन आधारों का उपयोग किया है:

  • प्रवृत्ति की प्रधानता (Dominance of Literary Tendency): किसी काल में कैसी रचनाएँ सबसे ज़्यादा लिखी गईं? रासो और चरित-काव्य ज़्यादा हैं या भक्ति के पद और साखियाँ? शुक्ल जी ने इसी को काल-विभाजन का मुख्य आधार माना है। उनका तर्क था कि जिस काल में किसी खास ढंग की रचनाओं की प्रचुरता दिखे और जिस ढंग के ग्रंथ प्रसिद्ध चले आएँ, उसी के अनुसार काल का नाम रखा जाए। प्रसिद्धि को भी वे लोक-प्रवृत्ति की प्रतिध्वनि मानते थे।
  • ऐतिहासिक और सामाजिक परिस्थिति (Historical Context): जैसे आदिकाल में राजनीतिक बिखराव और दरबारी-आश्रय का साहित्य पर असर, या भक्ति के समय समाज की मनोदशा।
  • भाषा के स्वरूप में बदलाव: अपभ्रंश (Apabhramsha) से पुरानी हिंदी, फिर ब्रज और अवधी तक का सफ़र। मिश्रबंधुओं के विभाजन में भाषा-विकास की भूमिका बड़ी है।
  • अन्य आधार जो इतिहासों में आज़माए गए: शासक या शासन-काल (विक्टोरिया-युग, मुग़ल काल), किसी लोकनायक का प्रभाव-काल (गांधी युग), या किसी साहित्यिक अग्रदूत का प्रभाव (भारतेंदु युग, द्विवेदी युग)।

एक बहस भी याद रखिए: कुछ विद्वान मानते हैं कि साहित्य स्वतंत्र है, इसलिए काल-विभाजन केवल साहित्यिक प्रवृत्तियों से होना चाहिए (नलिन विलोचन शर्मा का मत)। दूसरे पक्ष का तर्क है कि साहित्य में अंततः समाज ही व्यक्त होता है, इसलिए सामाजिक परिस्थितियों को भी आधार बनाना चाहिए। शुक्ल जी दूसरे पक्ष के क़रीब हैं: वे साहित्य-परंपरा और सामाजिक परिस्थिति दोनों को देखते हैं।

समस्याएँ क्या आती हैं?

  • प्रामाणिक सामग्री का अभाव: आदिकाल की कई रचनाओं की मूल प्रति और रचना-तिथि पक्की नहीं है। पृथ्वीराज रासो और परमाल रासो (आल्हा) जैसी रचनाओं की प्रामाणिकता संदिग्ध मानी गई है, और कई ग्रंथों में बाद के अंश जुड़ जाने (प्रक्षिप्त अंश, Interpolation) की समस्या है।
  • प्रवृत्तियों का एक-दूसरे में घुलना: कोई प्रवृत्ति एक रात में खत्म नहीं होती। शुक्ल जी स्वयं मानते थे कि भक्तिकाल या रीतिकाल में भी वीर-रस की रचनाएँ मिलती हैं; यानी किसी काल का नाम उसकी प्रधान प्रवृत्ति से रखा जाता है, एकमात्र प्रवृत्ति से नहीं।
  • गौण प्रवृत्तियों की समस्या: शुक्ल जी ने हर युग के अंत में ‘फुटकल’ रचनाओं का खाता रखा। नामवर सिंह ने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि यह परिस्थितियों और काव्य-प्रवृत्तियों के बीच कार्य-कारण की असंगति दिखाता है; उनका उदाहरण विद्यापति हैं, जो एक बड़े कवि होकर भी ‘फुटकल’ में आ गए।
  • मतभेद: एक ही काल को अलग-अलग विद्वान अलग समय-सीमा और नाम देते हैं, इसीलिए नामकरण पर इतना विवाद है।

इस विषय को विस्तार से पढ़ने के लिए UGC के e-PG Pathshala का अध्याय हिंदी साहित्य के इतिहास लेखन में काल-विभाजन का आधार अच्छा संदर्भ है।

हिंदी साहित्य : काल-विभाजन | Hindi Sahitya: Kal-Vibhajan

अलग-अलग इतिहासकारों ने हिंदी साहित्य को अलग-अलग तरह से बाँटा है। यह तालिका परीक्षा के लिए बहुत काम की है।

इतिहासकारविभाजन / काल-नामटिप्पणी
जॉर्ज ग्रियर्सनग्यारह खंड: चारण काल (लगभग 700-1300 ई.), पंद्रहवीं शताब्दी का धार्मिक पुनर्जागरण, जायसी की प्रेम-कविता, ब्रज का कृष्ण संप्रदाय, मुग़ल दरबार, तुलसीदास, रीति काव्य, तुलसीदास के परवर्ती कवि, अठारहवीं शताब्दी, कंपनी के शासन में हिंदुस्तान, महारानी विक्टोरिया के शासन में हिंदुस्ताननामकरण एक ही आधार पर नहीं; ‘भक्तिकाल’ जैसा नाम नहीं है, बल्कि ‘धार्मिक पुनर्जागरण’, ‘तुलसीदास’ जैसे शीर्षक हैं
मिश्रबंधुआरंभिक काल (पूर्व: सं. 700-1343, उत्तर: 1343-1444); माध्यमिक काल (पूर्व: 1445-1560, प्रौढ़: 1561-1680); अलंकृत काल (पूर्वालंकृत: 1681-1790, उत्तरालंकृत: 1791-1889); परिवर्तन काल (1890-1925); वर्तमान काल (1926 से)मुख्यतः भाषा-विकास पर आधारित; मोटे तौर पर पाँच बड़े काल और उप-विभाग
आचार्य रामचंद्र शुक्लचार काल (नीचे देखें)सबसे मान्य और मानक विभाजन
रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’आदिकाल/बाल्यावस्था (सं. 1000-1400), मध्यकाल/किशोरावस्था (1400-1800), आधुनिक काल/युवावस्था (1800 से)जैविक विकास का रूपक; वीरगाथा काल को ‘जय-काव्य’ और रीतिकाल को ‘कला-काल’ कहा
रामकुमार वर्मासंधिकाल (सं. 750-1000) और चारण कालशुक्ल के आदिकाल को ‘चारण काल’ कहा और उससे पहले ‘संधिकाल’ जोड़ा
गणपतिचंद्र गुप्त1857 को विभाजक रेखा मानकर दो बड़े खंड; 1857 से पहले: आदिकाल (1184-1350 ई.), पूर्व मध्यकाल (1350-1600), उत्तर मध्यकाल (1600-1857)हिंदी साहित्य का आरंभ शालिभद्र सूरि कृत भरतेश्वर बाहुबली रास (1184) से माना

सबसे मान्य विभाजन आचार्य रामचंद्र शुक्ल का है। उन्होंने इतिहास को चार भागों में बाँटा। संवत् को ईस्वी में बदलने के लिए लगभग 57 घटाइए:

काल (शुक्ल)प्रवृत्ति के आधार पर नामसंवत्लगभग ईस्वी
आदिकालवीरगाथा काल (Veergatha Kal)1050-1375993-1318
पूर्व मध्यकालभक्तिकाल (Bhaktikal)1375-17001318-1643
उत्तर मध्यकालरीतिकाल (Ritikal)1700-19001643-1843
आधुनिक कालगद्य काल / आधुनिक काल (Adhunik Kal)1900 से अब तक1843 से
शुक्ल जी के चारों काल संवत् और ईस्वी सीमाओं सहित क्षैतिज समय-रेखा में
आदिकाल से आधुनिक काल तक : संवत् → ईस्वी

ध्यान दीजिए: कुछ पुस्तकों में आदिकाल की सीमा 1050-1350 छपी मिलती है। शुक्ल जी के अपने विभाजन में अंतिम सीमा संवत् 1375 है, इसलिए उत्तर में यही लिखिए।

शुक्ल जी के बाद हजारीप्रसाद द्विवेदी ने आदिकाल नाम को स्वीकार किया पर ‘वीरगाथा’ नाम से असहमति जताई। उन्होंने पाया कि इस काल में वीरता के साथ-साथ सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य भी लिखा गया। इसलिए सिर्फ़ वीरगाथा कहना एकांगी है। आम तौर पर आदिकाल को दसवीं से चौदहवीं शताब्दी (लगभग 1000-1400 ई.) के बीच रखा जाता है। रामकुमार वर्मा ने इसमें ‘संधिकाल’ और ‘चारण काल’ का प्रस्ताव दिया।

परीक्षा में क्या लिखें? उत्तर में शुक्ल जी का विभाजन मुख्य आधार बनाइए, क्योंकि वही मानक (Standard) है। पर साथ में यह ज़रूर लिखिए कि अन्य विद्वानों ने इसकी समय-सीमा और नामों पर अलग मत दिए हैं। इससे आपका उत्तर संतुलित लगता है। और अगर प्रश्न ‘शुक्ल का विभाजन सबसे मान्य क्यों’ है, तो उसकी दो ताक़तें गिनाइए: (1) प्रवृत्ति और काल-क्रम का मेल, (2) परिस्थिति से प्रवृत्ति तक का कार्य-कारण संबंध। दो सीमाएँ भी: (1) ‘वीरगाथा’ नाम पर आपत्ति, (2) ‘फुटकल’ खाते की समस्या।

Quick Summary: Periodization divides a thousand-year literary history mainly by the dominant tendency (Pravritti), supported by historical context and language change. Shukla’s four-fold scheme (Adikal 1050-1375 VS, Bhaktikal 1375-1700, Ritikal 1700-1900, Adhunik Kal 1900 onwards) became the standard, though critics question his ‘Veergatha’ label and his ‘Phutkal’ category.

हिंदी साहित्य : नामकरण | Hindi Sahitya: Namkaran

काल को बाँटने के बाद दूसरा बड़ा झगड़ा है कि उसका नाम क्या रखा जाए। इसे नामकरण (Namkaran / Nomenclature) कहते हैं। नाम आम तौर पर उस काल की मुख्य प्रवृत्ति के आधार पर रखा जाता है, और इसीलिए काल-विभाजन और नामकरण असल में एक ही प्रश्न के दो पहलू हैं।

आदिकाल के नामकरण पर सबसे अधिक विवाद है। परीक्षा की दृष्टि से इसे सबसे पहले पक्का कर लीजिए।

विद्वानसुझाया गया नामतर्क / आधार
आचार्य रामचंद्र शुक्लवीरगाथा काल (साथ में ‘आदिकाल’ भी)बारह ग्रंथों के आधार पर वीर-रस के रासो और चरित-काव्यों की प्रधानता
जॉर्ज ग्रियर्सनचारण कालचारणों की काव्य-परंपरा
मिश्रबंधुआरंभिक कालहिंदी साहित्य का आरंभिक चरण (प्रवृत्ति का संकेत नहीं)
महावीर प्रसाद द्विवेदीबीजवपन कालहिंदी के बीज बोने का समय
राहुल सांकृत्यायनसिद्ध-सामंत कालएक ओर सिद्धों का धार्मिक साहित्य, दूसरी ओर सामंतों की प्रशंसा का साहित्य
रामकुमार वर्मासंधिकाल और चारण कालसंधिकाल (सं. 750-1000) और उसके बाद चारण-परंपरा
हजारीप्रसाद द्विवेदीआदिकालव्यापक और निरपेक्ष नाम; वीरगाथा नाम को एकांगी माना; सिद्ध-सामंत नाम को प्रवृत्ति स्पष्ट करने वाला कहा
विश्वनाथ प्रसाद मिश्रवीरकालवीर-प्रवृत्ति
बच्चन सिंहअपभ्रंश कालभाषा के आधार पर
आदिकाल के विभिन्न नाम और उन्हें देने वाले विद्वानों का चार्ट
आदिकाल के पाँच प्रमुख नाम

परीक्षा में पाँच नाम लेखक सहित क्रम से याद रखिए: वीरगाथा (शुक्ल), चारण/संधिकाल (रामकुमार वर्मा), सिद्ध-सामंत (राहुल सांकृत्यायन), बीजवपन (महावीर प्रसाद द्विवेदी), आदिकाल (हजारीप्रसाद द्विवेदी)। ऊपर की बाक़ी पंक्तियाँ अतिरिक्त अंक दिलाने वाली जानकारी हैं।

‘वीरगाथा काल’ नाम पर आपत्तियाँ क्यों?

यह वह हिस्सा है जो आपके उत्तर को आम उत्तरों से अलग बनाएगा। शुक्ल जी ने अपने नाम के लिए बारह पुस्तकों को आधार बनाया था: विजयपाल रासो, हम्मीर रासो, कीर्तिलता, कीर्तिपताका, खुमाण रासो, बीसलदेव रासो, पृथ्वीराज रासो, जयचंद्र प्रकाश, जयमयंक जसचंद्रिका, परमाल रासो, खुसरो की पहेलियाँ और विद्यापति की पदावली। इनमें से चार अपभ्रंश में हैं, और बाद के विद्वानों ने इस सामग्री पर कई सवाल उठाए:

  • जयचंद्र प्रकाश और जयमयंक जसचंद्रिका आज उपलब्ध नहीं हैं; उनका उल्लेख भर मिलता है (सूचना मात्र)।
  • हम्मीर रासो आधा ही मिलता है और उसका आधार प्राकृत-पैंगलम् के कुछ पद्य बताए जाते हैं।
  • विजयपाल रासो अधूरा है और बीसलदेव रासो मूलतः वीरगाथा नहीं, विरह-प्रधान प्रेम-काव्य है।
  • खुसरो की पहेलियाँ वीरगाथा नहीं हैं।
  • पृथ्वीराज रासो और परमाल रासो की प्रामाणिकता संदिग्ध है और मूल पाठ का निर्धारण कठिन माना गया है।

इसके अलावा द्विवेदी जी का बुनियादी तर्क यह था कि किसी काल की प्रवृत्ति ग्रंथों की संख्या से तय नहीं होती, बल्कि उस काल की मुख्य प्रेरक शक्ति से होती है। शुक्ल जी ने जिन सिद्ध-नाथ-जैन रचनाओं को धार्मिक या साम्प्रदायिक कहकर छोड़ दिया था, बाद में उन्हें भी साहित्यिक उदारता वाली रचनाएँ माना गया। इसलिए आदिकाल में वीर, श्रृंगार, धार्मिक, लौकिक और नीति-परक, सब तरह की प्रवृत्तियाँ मिलती हैं। नतीजा: ‘आदिकाल’ नाम अधिक व्यापक और निरपेक्ष माना जाता है, जबकि ‘वीरगाथा’ नाम केवल एक प्रवृत्ति पर टिका है।

(विस्तृत अध्ययन के लिए: उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय की स्व-अध्ययन सामग्री हिंदी साहित्य का आदिकाल : उद्भव एवं विकास देखी जा सकती है।)

भक्तिकाल और रीतिकाल के नाम पर तुलनात्मक रूप से कम विवाद है, पर बहस पूरी तरह खत्म नहीं है। रीतिकाल को रामशंकर शुक्ल ‘रसाल’ ने ‘कला-काल’ कहा, मिश्रबंधुओं के विभाजन में इसका बड़ा भाग ‘अलंकृत काल’ है, और कुछ विद्वानों ने ‘शृंगार काल’ जैसे नाम भी सुझाए। ‘मध्यकाल’ शब्द पर भी हजारीप्रसाद द्विवेदी की आपत्ति रही कि यह पतनोन्मुख, जड़ मनोवृत्ति का संकेत देता है; उन्होंने भक्ति-साहित्य को अखिल भारतीय जन-संस्कृति के जागरण की अभिव्यक्ति माना।

Quick Summary: The naming of Adikal is the most disputed issue. Shukla preferred Veergatha Kal, but critics showed that his twelve base texts were partly unavailable, incomplete, love-oriented or of doubtful authenticity. Other names include Charan Kal (Grierson; Ram Kumar Verma), Arambhik Kal (Mishrabandhu), Beej Vapan Kal (Mahavir Prasad Dwivedi), Siddha-Samanta Kal (Rahul Sankrityayan) and Adikal (Hazari Prasad Dwivedi), the last being the most widely accepted.


इतिहास-लेखन की पद्धति | Method of Itihas-Lekhan

इतिहास-निर्माण की पद्धति का विश्लेषण | Analysis of the Method of History Construction

इतिहास लिखने का तरीक़ा भी समय के साथ बदला है। शुरुआती इतिहासकार सिर्फ़ कवियों की सूची बनाते थे, बाद वालों ने उसके पीछे के कारण खोजे। पद्धति की दृष्टि से इसे तीन स्तरों में समझना सबसे आसान है:

1. वर्णानुक्रम और वर्णनात्मक पद्धति (Alphabetical / Descriptive Method) गार्सां द तासी और शिवसिंह सेंगर जैसे लेखकों में कवियों का परिचय नाम के वर्णों या सामग्री-संचय के ढंग से आया। इसमें कवि का नाम, जीवन-वृत्त और कुछ रचनाओं के नमूने तो हैं, पर यह नहीं बताया गया कि कवि ने ऐसा क्यों लिखा। यह पद्धति सूची जैसी है। शुक्ल जी ने ऐसे ग्रंथों को ‘वृत्तसंग्रह’ कहा।

2. कालानुक्रमी पद्धति (Chronological Method) ग्रियर्सन और मिश्रबंधुओं ने कवियों को काल-क्रम में रखा और काल-खंड बनाए। यह वर्णानुक्रम से आगे का क़दम है, पर शुक्ल जी की नज़र में इनमें ‘विचार-शृंखला’ का अभाव था। उन्होंने कहा कि पूरे रचना-काल को केवल आदि, मध्य, पूर्व, उत्तर जैसे खंडों में आँख मूँदकर बाँट देने से कोई वृत्त-संग्रह इतिहास नहीं बन जाता।

3. वैज्ञानिक और समाजशास्त्रीय पद्धति (Scientific and Sociological Method) यह पद्धति आचार्य रामचंद्र शुक्ल की देन मानी जाती है और सबसे मान्य भी है। इसके तीन स्तंभ हैं:

  • परिस्थिति का विश्लेषण: पहले उस युग की राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक हालत को समझो।
  • चित्तवृत्ति की पहचान: परिस्थिति से जनता के मन में कौन-सी भावना (चित्तवृत्ति / Chittavritti) पैदा हुई।
  • साहित्यिक प्रवृत्ति से जोड़ना: वही चित्तवृत्ति साहित्य में किस रूप में, वीरगाथा, भक्ति या रीति के रूप में, प्रकट हुई।
परिस्थिति से चित्तवृत्ति और फिर साहित्यिक प्रवृत्ति तक का तीन-चरणीय आरेख
शुक्ल जी की पद्धति के तीन स्तंभ

ध्यान दीजिए, शुक्ल जी ने कार्य-कारण (Cause and Effect) को इतिहास का केंद्र बनाया। आलोचकों ने उनकी दृष्टि को ‘वस्तुवादी’ और विकासवाद की वैज्ञानिक धारणा से जुड़ी बताया है। नामवर सिंह जैसे आलोचकों की शिकायत यह रही कि उनका ‘औसतवाद’ समाज की परस्पर-विरोधी शक्तियों के अंतर्विरोध को नहीं पकड़ पाता। यानी आप सीमाएँ भी लिखें, पर यह भी माने कि बाद के इतिहासों पर उनका प्रभाव व्यापक रहा। रामविलास शर्मा के अनुसार शुक्ल जी का ढाँचा, यानी वीरगाथा, निर्गुण-सगुण भक्ति, प्रेमकथानक, रीतिकाव्य, भारतेंदु युग और छायावाद, आज भी काफ़ी हद तक वैसा ही चला आता है।

हजारीप्रसाद द्विवेदी ने इसी परंपरा को आगे बढ़ाया। उन्होंने शुक्ल जी के इतिहास की दो ख़ूबियाँ गिनाईं (ऐतिहासिक काल-विभाजन और साहित्यिक मूल्यांकन) और कहा कि उसने हिंदी साहित्य के इतिहास को कवि-वृत्त-संग्रह की पिटारी से बाहर निकाला। साथ ही उन्होंने परंपरा, लोक-संस्कृति और मानवतावादी दृष्टि पर ज़ोर दिया, और यह मत रखा कि भक्ति आंदोलन केवल आक्रमण की प्रतिक्रिया नहीं, बल्कि भारतीय परंपरा और जन-संस्कृति के स्वाभाविक विकास की अभिव्यक्ति है। शुक्ल जी के लिए किसी एक प्रवृत्ति की प्रबलता और प्रसिद्धि निर्णायक थी; द्विवेदी जी के लिए विभिन्न प्रवृत्तियों का पारस्परिक संबंध।

शुक्ल के बाद : इतिहास-लेखन की नई पद्धतियाँ

  • धारावाहिक पद्धति: श्यामसुंदर दास ने प्रत्येक प्रवृत्ति (जैसे वीरगाथा-परंपरा) का विकास आदिकाल से आधुनिक काल तक एक साथ दिखाया। शुक्ल जी जानते थे कि यह पद्धति आंतरिक विकास-क्रम की सच्चाई का उल्लंघन कर सकती है, क्योंकि एक प्रवृत्ति के अंत से दूसरी के उदय का संबंध जुड़ा होता है।
  • गणपतिचंद्र गुप्त (1965): 1857 को विभाजक रेखा मानकर दो बड़े खंड; हिंदी साहित्य का आरंभ 1184 के भरतेश्वर बाहुबली रास से।
  • रामस्वरूप चतुर्वेदी (1986): ‘इतिहास’ की जगह ‘विकास’ और ‘संवेदना’ पर बल; चयनधर्मी दृष्टि, प्रतिनिधि रचनाकारों के आधार पर विवेचन।
  • नागरी प्रचारिणी सभा का सोलह खंडों का वृहत् इतिहास: हर खंड स्वतंत्र पर परस्पर जुड़ा; तिथिक्रम, कार्य-कारण, संघर्ष-समन्वय पर ध्यान।

इतिहास-ग्रंथों का तुलनात्मक विश्लेषण | Comparative Analysis of History Texts

अब देखिए, सभी इतिहास-ग्रंथ एक जैसे नहीं हैं। परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है कि शुक्ल जी का इतिहास शिवसिंह सरोज और मिश्रबंधु विनोद से कैसे अलग है।

इतिहास-ग्रंथपद्धतिविशेषतासीमा
गार्सां द तासी (1839)वर्णानुक्रमी संकलनहिंदी-उर्दू कवियों का पहला परिचय; फ़्रेंच में; पहला प्रयासकाल-विभाजन नहीं, केवल परिचय; हिंदी कवि कम; सूचनाएँ अपूर्ण
शिवसिंह सरोज (1883; प्रथम संस्करण 1878)वर्णनात्मक, कवि-वृत्त संग्रहलगभग 1000 कवियों का वृत्त; भारतीय का पहला बड़ा प्रयास; परवर्ती इतिहासकारों का आधारप्रवृत्ति-विश्लेषण का अभाव; कई तथ्य और तिथियाँ प्रामाणिक नहीं
ग्रियर्सन (1889)कालक्रम + प्रवृत्ति + व्यक्ति का मिश्रणग्यारह अध्याय; पृष्ठभूमि-निर्देश और तुलनात्मक मूल्यांकन का प्रयासनामकरण का एक आधार नहीं; शुक्ल जी की दृष्टि में ‘बड़ा कवि-वृत्त-संग्रह’
मिश्रबंधु विनोद (1913)कालानुक्रमी, भाषा-विकास पर आधारित विभाजनलगभग 4591 कवि; समय-निर्धारण में भारी परिश्रम; ग्रियर्सन से विकसित विभाजनआलोचनात्मक दृष्टि कमज़ोर, ज़्यादा संकलन; शुक्ल की नज़र में ‘वृत्त-संग्रह’
शुक्ल जी का इतिहास (1929)वैज्ञानिक, समाजशास्त्रीय, प्रवृत्ति-आधारितकार्य-कारण, प्रवृत्ति-आधारित सुसंगत काल-विभाजन, मूल्यांकनसिद्ध-नाथ-जैन साहित्य को धार्मिक मानकर बाहर रखा; ‘वीरगाथा’ नाम और ‘फुटकल’ खाते की आलोचना
हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य का आदिकाल (1952)सांस्कृतिक-ऐतिहासिक, मानवतावादीपरंपरा की निरंतरता; आदिकाल की व्यापक पहचान; सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य का पुनर्मूल्यांकनशुक्ल जी के कई निर्णयों का संशोधन; यह स्वतंत्र आदिकाल-विमर्श है, पूरा इतिहास नहीं

तुलना का निष्कर्ष क्या है? शुरुआती ग्रंथों में सामग्री का संकलन (Collection) है, पर विश्लेषण नहीं। शुक्ल जी के इतिहास में पहली बार इतिहास-बोध (Historical Sense) और आलोचना-दृष्टि (Critical Perspective) दोनों साथ आए। इसीलिए बाद के लगभग सभी इतिहास उनके ढाँचे से बात करते हैं, और द्विवेदी जी जैसे विद्वानों का काम उनके पूरक (Supplementary) और संशोधक के रूप में पढ़ा जाता है।

Quick Summary: Early histories were descriptive or chronological lists without strong analysis. Shukla introduced a scientific-sociological method linking circumstances to Chittavritti and then to literary Pravritti. Later writers either followed his frame (Verma, Chaturvedi), challenged parts of it (Hazari Prasad Dwivedi) or tried new structures (Shyamsundar Das’s continuous method, Ganpati Chandra Gupt’s 1857 division).


शब्दावली | Key Terms

शब्दअर्थ (संक्षेप में)
साहित्येतिहाससाहित्य की प्रवृत्तियों का कालक्रमबद्ध, कार्य-कारण-आधारित और मूल्यांकनपरक इतिहास
प्रवृत्ति (Pravritti)किसी काल की रचनाओं में मिलने वाली सामान्य काव्य-विशेषता
चित्तवृत्ति (Chittavritti)जनता का सामूहिक मनोभाव, जो परिस्थिति से बनता है
कवि-वृत्त संग्रहकेवल कवियों के जीवन-वृत्त का संकलन, इतिहास नहीं (शुक्ल जी का शब्द)
वर्णानुक्रमकवियों को नाम के वर्णों के क्रम में रखना
कालानुक्रमरचनाकारों को समय के क्रम में रखना
काल-विभाजनलंबे साहित्य-इतिहास को प्रवृत्ति और परिस्थिति के आधार पर खंडों में बाँटना
नामकरणकिसी काल को उसकी प्रवृत्ति के आधार पर नाम देना
प्रक्षिप्त अंशमूल रचना में बाद में जुड़ गए अंश
फुटकलशुक्ल जी का वह खाता जिसमें वे प्रवृत्ति से अलग पड़ने वाली रचनाएँ रखते हैं
रासोआश्रयदाता राजा के चरित और शौर्य पर आधारित काव्य-परंपरा

घटनाक्रम तालिका | Timeline

वर्षग्रंथ / घटना
1839तासी का ग्रंथ, भाग 1 (भाग 2: 1847; परिवर्धित संस्करण: 1870-71)
1878 / 1883शिवसिंह सरोज: प्रथम संस्करण / संशोधित संस्करण
1889ग्रियर्सन का The Modern Vernacular Literature of Hindustan
1913मिश्रबंधु विनोद (पहले तीन भाग)
1929शुक्ल जी का हिंदी साहित्य का इतिहास
1930श्यामसुंदर दास, हिंदी भाषा और साहित्य
1938रामकुमार वर्मा, हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास
1940हजारीप्रसाद द्विवेदी, हिंदी साहित्य की भूमिका
1952द्विवेदी, हिंदी साहित्य: उद्भव और विकास तथा हिंदी साहित्य का आदिकाल
1965गणपतिचंद्र गुप्त, हिंदी साहित्य का वैज्ञानिक इतिहास
1986रामस्वरूप चतुर्वेदी, हिंदी साहित्य और संवेदना का विकास

निष्कर्ष | Conclusion

इस यूनिट की पूरी कहानी एक वाक्य में कही जा सकती है: हिंदी साहित्येतिहास सूची से विश्लेषण की ओर बढ़ा है। तासी और सेंगर ने सामग्री जुटाई, ग्रियर्सन और मिश्रबंधुओं ने उसे कालक्रम में रखने की कोशिश की, और शुक्ल जी ने उसे परिस्थिति, चित्तवृत्ति और प्रवृत्ति के रिश्ते में पढ़ा। फिर द्विवेदी जी जैसे विद्वानों ने दिखाया कि शुक्ल जी के ढाँचे में, ख़ासकर आदिकाल के नामकरण और सिद्ध-नाथ-जैन साहित्य के मूल्यांकन में, सुधार की गुंजाइश है।

तैयारी के लिए तीन काम कीजिए: (1) शुक्ल जी के चारों काल संवत् और ईस्वी दोनों में याद कर लीजिए, (2) आदिकाल के नाम ‘विद्वान → नाम → तर्क’ के क्रम में लिख-लिखकर दोहराइए, (3) तुलनात्मक प्रश्न के लिए तासी से शुक्ल तक की तालिका अपने शब्दों में बनाइए।

Quick Summary: This unit shows how Hindi literary history moved from lists of poets to analytical history. Tassy (1839), Sengar (Saroj), Grierson (1889) and Mishrabandhu (1913) collected and arranged material; Shukla (1929) gave the standard four-fold periodization based on dominant tendency and cause-and-effect. The naming of Adikal remains the most debated topic, with Veergatha Kal (Shukla), Charan/Sandhi Kal (Ram Kumar Verma), Siddha-Samanta Kal (Rahul Sankrityayan), Beej Vapan Kal (Mahavir Prasad Dwivedi) and Adikal (Hazari Prasad Dwivedi) as the key answers.

इतिहास-लेखन, काल-विभाजन और नामकरण का सार दर्शाने वाला इन्फ़ोग्राफ़िक
परीक्षा से पहले इसे एक बार दोहराइए

University of Delhi Previous Year Questions | DU में पूछे जाने वाले प्रश्न (अभ्यास)

University of Delhi Previous Year Questions | DU में पूछे जाने वाले प्रश्न (अभ्यास)

Important Note: नीचे दिए गए सभी प्रश्न DU-pattern / Probable Question हैं। इस यूनिट के लिए किसी प्रश्न को आधिकारिक DU प्रश्न-पत्र से सत्यापित नहीं किया जा सका है। इसलिए इन्हें वास्तविक PYQ न समझें। ये प्रश्न परीक्षा-अभ्यास और संभावित प्रश्नों की तैयारी के लिए दिए गए हैं। वास्तविक प्रश्न-पत्र के लिए अपने कॉलेज या DU की परीक्षा वेबसाइट पर उपलब्ध पुराने प्रश्न-पत्र देखें।

Short Answer | संक्षिप्त उत्तर

1. साहित्येतिहास से आप क्या समझते हैं? +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: दो शब्दों का अर्थ, सूची से अंतर
Suggested Answer Focus: कार्य-कारण, क्रमबद्धता, मूल्यांकन तथा आचार्य रामचंद्र शुक्ल के साहित्येतिहास संबंधी दृष्टिकोण और कथन को स्पष्ट करें।
Probable Practice
2. इतिहास और साहित्येतिहास में दो अंतर लिखिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: तालिका जैसा उत्तर
Suggested Answer Focus: इतिहास और साहित्येतिहास की सामग्री, उद्देश्य तथा दृष्टि के बीच के प्रमुख अंतरों को स्पष्ट करें।
Probable Practice
3. हिंदी साहित्य का प्रथम इतिहास-लेखक किसे माना जाता है? उनके ग्रंथ का नाम लिखिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: तासी, 1839, फ़्रेंच
Suggested Answer Focus: गार्सां द तासी के इतिहास-लेखन के प्रयास, उनके ग्रंथ तथा उसकी प्रमुख विशेषताओं पर संक्षिप्त टिप्पणी करें। वर्णानुक्रम और काल-विभाजन के अभाव का उल्लेख करें।
Probable Practice
4. शुक्ल जी द्वारा किए गए काल-विभाजन के चार काल और उनकी सीमा लिखिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: संवत् की सीमाएँ
Suggested Answer Focus: शुक्ल जी के चार कालों के नाम, उनकी संवत्-सीमा तथा जहाँ आवश्यक हो वहाँ ईस्वी सन् में उनका रूपांतरण लिखें।
Probable Practice
5. आदिकाल के नामकरण से जुड़े चार विद्वानों और उनके दिए नाम लिखिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: विद्वान → नाम सूची
Suggested Answer Focus: शुक्ल, वर्मा, सांकृत्यायन, महावीर प्रसाद द्विवेदी और हज़ारीप्रसाद द्विवेदी आदि के द्वारा प्रयुक्त नामों को व्यवस्थित रूप से लिखें और उनके आधार को संक्षेप में स्पष्ट करें।
Probable Practice
6. ‘चित्तवृत्ति’ से क्या आशय है? +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: परिस्थिति से जनमन
Suggested Answer Focus: ‘चित्तवृत्ति’ की संकल्पना को आचार्य रामचंद्र शुक्ल की इतिहास-लेखन पद्धति से जोड़ते हुए तत्कालीन परिस्थितियों और जनमानस के संबंध को स्पष्ट करें।
Probable Practice
7. ‘कवि-वृत्त संग्रह’ किसे कहते हैं? शुक्ल जी ने किन ग्रंथों को यह कहा? +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: सरोज, ग्रियर्सन, मिश्रबंधु विनोद
Suggested Answer Focus: ‘कवि-वृत्त संग्रह’ की संकल्पना स्पष्ट करें और शुक्ल जी द्वारा पूर्ववर्ती इतिहास-ग्रंथों के मूल्यांकन के संदर्भ में विश्लेषण के अभाव के तर्क को समझाएँ।
Probable Practice
8. ग्रियर्सन के इतिहास-ग्रंथ पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: 1889, ग्यारह अध्याय
Suggested Answer Focus: ग्रियर्सन के इतिहास-ग्रंथ की संरचना, काल-क्रम और इतिहास-लेखन के आधार पर संक्षिप्त टिप्पणी करें तथा उसके मिश्रित आधार की ओर संकेत करें।
Probable Practice

Long Answer | दीर्घ उत्तर

9. हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन की परंपरा का परिचय दीजिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: पाँच पड़ाव
Suggested Answer Focus: गार्सां द तासी से लेकर सेंगर, ग्रियर्सन, मिश्रबंधु, शुक्ल तथा बाद के इतिहास-लेखकों तक हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन के प्रमुख पड़ावों और उनके योगदान का क्रमबद्ध परिचय दें।
Probable Long Answer
10. काल-विभाजन के आधार क्या हैं? काल-विभाजन की समस्याओं की विवेचना कीजिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: प्रवृत्ति, परिस्थिति, भाषा
Suggested Answer Focus: साहित्यिक काल-विभाजन के आधारों पर चर्चा करते हुए प्रामाणिक सामग्री के अभाव, विभिन्न प्रवृत्तियों के परस्पर घुलने-मिलने तथा ‘फुटकल’ रचनाओं के वर्गीकरण जैसी समस्याओं की विवेचना करें।
Probable Long Answer
11. शुक्ल का काल-विभाजन सर्वाधिक मान्य क्यों है? तर्क सहित विवेचना कीजिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: प्रचुरता और प्रसिद्धि का तर्क
Suggested Answer Focus: ग्रियर्सन और मिश्रबंधुओं की सीमाओं की तुलना में शुक्ल के काल-विभाजन की विशेषताओं को स्पष्ट करें। साथ ही शुक्ल के अपने काल-विभाजन की सीमाओं का आलोचनात्मक उल्लेख करें।
Probable Long Answer
12. आदिकाल के नामकरण की समस्या पर विभिन्न विद्वानों के मतों की समीक्षा कीजिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: नाम-तालिका
Suggested Answer Focus: आदिकाल के लिए प्रयुक्त विभिन्न नामों और उनके आधारों की तुलनात्मक समीक्षा करें। ‘वीरगाथा’ नाम पर उठाई गई आपत्तियों तथा ‘आदिकाल’ नाम की उपयुक्तता पर चर्चा करें।
Probable Long Answer
13. आदिकाल को ‘आदिकाल’ कहना ‘वीरगाथा काल’ कहने से अधिक उपयुक्त क्यों है? +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: द्विवेदी का तर्क
Suggested Answer Focus: बारह ग्रंथों की स्थिति, ‘वीरगाथा’ नाम की सीमाएँ तथा उस युग की व्यापक साहित्यिक प्रवृत्तियों और प्रेरक शक्तियों के संदर्भ में ‘आदिकाल’ नाम की उपयुक्तता स्पष्ट करें।
Probable Long Answer
14. शिवसिंह सरोज, मिश्रबंधु विनोद और शुक्ल जी के इतिहास का तुलनात्मक विश्लेषण कीजिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: तुलनात्मक तालिका
Suggested Answer Focus: तीनों इतिहास-ग्रंथों की पद्धति, विशेषताओं और सीमाओं की तुलना करें। विशेष रूप से ‘वृत्त-संग्रह’ और वैज्ञानिक/विश्लेषणात्मक इतिहास-लेखन के अंतर को स्पष्ट करें।
Probable Long Answer
15. शुक्ल जी की वैज्ञानिक पद्धति की विशेषताएँ बताइए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: परिस्थिति → चित्तवृत्ति → प्रवृत्ति
Suggested Answer Focus: शुक्ल की इतिहास-लेखन पद्धति में परिस्थिति, चित्तवृत्ति और साहित्यिक प्रवृत्ति के संबंध को स्पष्ट करें। साथ ही द्विवेदी और नामवर सिंह की दृष्टि से इस पद्धति की सीमाओं का उल्लेख करें।
Probable Long Answer
16. इतिहास-लेखन में गार्सां द तासी और शिवसिंह सेंगर के योगदान का मूल्यांकन कीजिए। +
Type: DU-pattern / Probable Question
Year / Paper: सत्यापित नहीं
Hint: प्रथम प्रयास, सामग्री-संचय
Suggested Answer Focus: हिंदी साहित्य के इतिहास-लेखन के आरंभिक प्रयासों के रूप में तासी और शिवसिंह सेंगर के योगदान को समझाएँ। उनके प्रयासों की उपयोगिता के साथ उनकी अपूर्णता और वर्णानुक्रम जैसी सीमाओं का आलोचनात्मक मूल्यांकन करें।
Probable Long Answer

उत्तर कैसे लिखें: 15-अंक वाले तुलनात्मक उत्तर में पहले एक पंक्ति की भूमिका, फिर तालिका, फिर एक अनुच्छेद का निष्कर्ष रखिए। आदिकाल नामकरण वाले उत्तर में नाम सिर्फ़ गिनाइए नहीं, हर नाम के साथ उसका तर्क और उसकी सीमा लिखिए।


अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | FAQs

हिंदी साहित्य का पहला इतिहासकार तासी है, सेंगर है या ग्रियर्सन? परीक्षा में क्या लिखें?

सामान्य और मान्य उत्तर गार्सां द तासी है (1839 का ग्रंथ)। वे फ़्रेंच थे और उन्होंने हिंदी-उर्दू दोनों के कवि लिए। शिवसिंह सेंगर किसी भारतीय द्वारा लिखे पहले बड़े ग्रंथ के लेखक माने जाते हैं। ग्रियर्सन को कालक्रम और प्रवृत्ति दोनों को मिलाने के कारण कुछ आलोचक वास्तविक अर्थ में पहला इतिहास मानना उचित समझते हैं। उत्तर में तासी लिखकर एक पंक्ति में यह मतभेद जोड़ दें।

शुक्ल जी की संवत् वाली तिथियों को ईस्वी में कैसे बदलें?

लगभग 57 घटाइए। इस हिसाब से वीरगाथा काल (संवत् 1050-1375) लगभग 993-1318 ई. है, भक्तिकाल 1318-1643 ई., रीतिकाल 1643-1843 ई. और आधुनिक काल 1843 ई. से।

शिवसिंह सरोज का वर्ष 1877, 1878 या 1883 क्यों मिलता है?

शोध-स्रोतों के अनुसार इसकी रचना लगभग 1877-78 में हुई, पहला संस्करण 1878 में छपा और संशोधित संस्करण 1883 में आया। पाठ्यपुस्तकों में प्रायः 1883 लिखा जाता है; इसलिए उत्तर में “1883 (प्रथम संस्करण 1878)” लिखना ठीक रहेगा।

शुक्ल जी ने सिद्ध, नाथ और जैन साहित्य को क्यों छोड़ा, और क्या यह उनकी चूक मानी जाती है?

उन्होंने इन्हें मुख्यतः धार्मिक या साम्प्रदायिक रचनाएँ मानकर साहित्य की परिधि से बाहर रखा। बाद के विद्वानों, ख़ासकर हजारीप्रसाद द्विवेदी, ने दिखाया कि इनमें साहित्यिक उदारता, लोकभाषा और काव्य-गुण मौजूद हैं और धार्मिक प्रेरणा काव्य की बाधा नहीं है। इसलिए इसे शुक्ल जी की सीमा के रूप में पढ़ाया जाता है।

‘आदिकाल’ और ‘वीरगाथा काल’, दोनों में से परीक्षा में कौन-सा नाम प्रयोग करूँ?

उत्तर ‘आदिकाल’ के साथ शुरू करें, और कोष्ठक में लिखें कि शुक्ल जी ने इसे ‘वीरगाथा काल’ कहा था। फिर तर्क दीजिए कि ‘आदिकाल’ अधिक व्यापक है, क्योंकि इस काल में वीर के साथ श्रृंगार, धार्मिक और लौकिक रचनाएँ भी मिलती हैं।

काल-विभाजन का आधार केवल साहित्य ही क्यों नहीं हो सकता, समाज भी क्यों जुड़ता है?

क्योंकि साहित्य समाज की चित्तवृत्ति का प्रतिबिंब है। शुक्ल जी परिस्थिति से चित्तवृत्ति और फिर प्रवृत्ति तक जाते हैं। हालाँकि कुछ विद्वान साहित्य की स्वतंत्रता पर ज़ोर देते हैं, इसलिए परीक्षा में दोनों मतों का उल्लेख करना अच्छा रहता है।

मिश्रबंधु विनोद में कवियों की संख्या कितनी है?

अधिकांश शोध-स्रोत लगभग 4591 बताते हैं, कुछ ‘लगभग पाँच हज़ार’। इसलिए उत्तर में “लगभग 4500-5000 (प्रायः 4591)” जैसा लिखना सुरक्षित है।

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About the Author

Sawan Chauhan is the Political Science and History content lead at Delhi Pathshala. He completed his BA and MA in Hindi (Honours) from the University of Delhi and prepares study notes aligned with the DU BA (Hons.) syllabus.

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