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उसने कहा था और पंच परमेश्वर: सारांश, पात्र-चरित्र, शीर्षक की सार्थकता और कहानी-कला | DU BA Hindi Hons DSC-3 Unit 1 Notes

Contents

पाठ्यक्रम: BA (Hons.) Hindi, Semester 1 · DSC-3 “हिन्दी कहानी” · University of Delhi · Unit 1

अगर आप DU के हिन्दी कहानी पेपर की पहली यूनिट पढ़ रहे हैं, तो सीधी बात यह है: इसमें दो कहानियाँ हैं और दोनों लगभग एक ही समय (1915-16) में ‘सरस्वती’ पत्रिका के दौर में सामने आईं। चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की ‘उसने कहा था’ एक वचन, प्रेम और कर्तव्य की कहानी है, जिसे फ्लैशबैक (पूर्वदीप्ति) शिल्प के लिए जाना जाता है। प्रेमचंद की ‘पंच परमेश्वर’ दोस्ती और न्याय के टकराव की कहानी है, जिसमें पंच की कुर्सी पर बैठते ही आदमी की सोच बदल जाती है। इस लेख में हम कहानीकार-परिचय से लेकर कथानक, पात्र-चरित्र, शीर्षक की सार्थकता, शिल्प, तुलना, आलोचकों के मतभेद, PYQ-पैटर्न प्रश्न और FAQ तक सब कुछ क्रम से समझेंगे।

एक ज़रूरी सलाह: कहानी का पाठ अपने कॉलेज की निर्धारित पाठ्य-पुस्तक या संकलन से ही पढ़ें। संस्करणों में छोटे-मोटे शब्द-भेद मिलते हैं, इसलिए जहाँ हमने कोई पंक्ति उद्धृत की है, उसे अपनी किताब से एक बार मिला लीजिए।

इस यूनिट में क्या पढ़ें | What You Will Learn

क्रमविषयआपको क्या आना चाहिए
1पृष्ठभूमिहिन्दी कहानी का उद्भव, ‘पहली कहानी’ का विवाद, काल-विभाजन, प्रमुख प्रवृत्तियाँ
2कहानीकार-परिचयगुलेरी और प्रेमचंद का जीवन, व्यक्तित्व और रचनाएँ
3पाठ-परिचयदोनों कहानियों का प्रकाशन, पृष्ठभूमि और विशेषताएँ
4कहानी-विश्लेषणकथानक, पात्र-चरित्र, केंद्रीय संवेदना, शीर्षक की सार्थकता, प्रमुख कथनों की व्याख्या, आलोचकों के मत
5कहानी-कलाकथानक-संरचना, देशकाल, संवाद, भाषा-शैली, तुलनात्मक अध्ययन
6योगदानहिन्दी कहानी में गुलेरी और प्रेमचंद का योगदान
7परीक्षा-तैयारीPYQ-पैटर्न प्रश्न (लघु/दीर्घ), FAQ, संदर्भ ग्रंथ

एक नज़र में दोनों कहानियाँ | Quick Facts

आधारउसने कहा थापंच परमेश्वर
लेखकचन्द्रधर शर्मा ‘गुलेरी’ (1883-1922)प्रेमचंद (1880-1936)
प्रकाशन1915, ‘सरस्वती’जून 1916, ‘सरस्वती’
मूल भावप्रेम से उपजा विश्वास, वचन-पालन, कर्तव्य और बलिदानन्याय का धर्म, उत्तरदायित्व-बोध, हृदय-परिवर्तन
संरचनागैर-रैखिक, पूर्वदीप्ति, पाँच खंडरैखिक, दो पंचायतों पर टिकी
परिवेशअमृतसर का बाज़ार और प्रथम विश्व युद्ध का फ्रांसीसी मोर्चाउत्तर भारत का एक गाँव
भाषापंजाबी-उर्दू-फौजी शब्दों से मिली हिन्दीसहज, मुहावरेदार ग्रामीण हिन्दी

1. पृष्ठभूमि | Background

हिन्दी कहानी का उद्भव और विकास | Origin and Development of Hindi Kahani

हिन्दी कहानी का जन्म बहुत पुराना नहीं है, लेकिन इसकी जड़ें बहुत गहरी हैं। ध्यान दीजिए, कहानी कहना तो मनुष्य की सबसे पुरानी आदत है। हमारे यहाँ पंचतंत्र, हितोपदेश, जातक कथाएँ (Jataka Tales), बैताल पच्चीसी, किस्सा तोता-मैना – ये सब कहानी की ही पुरानी परंपरा हैं। इन्हें हम कथा (Katha) या आख्यायिका (Akhyayika) कहते थे। पर जो आधुनिक कहानी (Short Story) हम आज पढ़ते हैं, वह इनसे अलग है। वह छोटी, चुस्त और किसी एक घटना या संवेदना पर टिकी होती है।

आधुनिक हिन्दी कहानी का उद्भव भारतेन्दु युग के बाद और द्विवेदी युग में हुआ। जब हिन्दी में निबंध, उपन्यास जैसा नया गद्य (Prose) बना, तब कहानी भी एक नई विधा के रूप में सामने आई। इस पर बंगला और अंग्रेजी की शॉर्ट स्टोरी का असर था। एक बात और: पश्चिम में ‘शॉर्ट स्टोरी’ की कला को सबसे पहले सैद्धांतिक रूप एडगर एलन पो (1809-49) ने दिया था, और उनका ‘प्रभाव की एकता’ वाला विचार आज भी कहानी की बुनियादी कसौटी माना जाता है।

अब देखिए, परीक्षा में यह बिंदु अक्सर पूछा जाता है – हिन्दी की पहली कहानी कौन सी है? इस पर विद्वानों में मतभेद है। नीचे की तालिका में दावेदारों को एक साथ रख दिया है।

कहानीलेखकवर्षइसके पक्ष या विपक्ष में क्या कहा गया
इन्दुमतीकिशोरीलाल गोस्वामी1900 (‘सरस्वती’)आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने इसे पहली कहानी माना, पर शर्त के साथ: यदि यह किसी बंगला कहानी की छाया न हो। कुछ विद्वान इसे शेक्सपियर के ‘टेम्पेस्ट’ का छायानुवाद बताकर मौलिक कहानी के दायरे से बाहर रखते हैं।
एक टोकरी भर मिट्टीमाधवराव सप्रे1901 (अनेक स्रोतों के अनुसार ‘छत्तीसगढ़ मित्र’ में)मौलिकता और यथार्थ-दृष्टि के कारण कई आलोचक (जैसे देवी प्रसाद वर्मा) इसे पहली मौलिक कहानी मानते हैं।
ग्यारह वर्ष का समयआचार्य रामचंद्र शुक्ल1903इसे भी प्रारंभिक कहानियों में महत्त्वपूर्ण स्थान मिलता है।
दुलाईवालीबंग महिला1907कुछ आलोचक इसे शिल्प की दृष्टि से अधिक परिपक्व मानते हैं।

ध्यान रखिए कि इन चार के अलावा भी कुछ दावे हैं (जैसे बच्चन सिंह ने ‘प्रणयिनी परिणय’, 1887 को पहली कहानी माना है), और प्रेमचंद के संदर्भ में भी ‘पहली कहानी’ का सवाल उठता है। इसलिए परीक्षा में किसी एक नाम पर अड़ने के बजाय तीन-चार दावे गिनाइए, हर दावे के पीछे का तर्क बताइए और फिर अपना संतुलित निष्कर्ष दीजिए। यही उत्तर को प्रामाणिक बनाता है।

हिन्दी कहानी के विकास को हम चार चरणों में समझ सकते हैं। यह एक प्रचलित, सुविधाजनक विभाजन है; अलग-अलग आलोचक तिथियों में थोड़ा अंतर रखते हैं (जैसे कुछ स्रोत ‘प्रेमचंद युग’ को 1916 की जगह 1918 से गिनते हैं)।

काल-विभाजनसमयमुख्य प्रवृत्तिप्रमुख कहानीकार
1. प्रारंभिक काल1900-1915घटना-प्रधान, सुधारवादीमाधवराव सप्रे, रामचंद्र शुक्ल, (गुलेरी की ‘उसने कहा था’ भी इसी दौर के अंत में आती है)
2. प्रेमचंद युग (Premchand Era)1916-1936आदर्शोन्मुख यथार्थवाद (Idealistic Realism)प्रेमचंद, जयशंकर प्रसाद
3. प्रेमचंदोत्तर युग1936-1950मनोविश्लेषण (Psychoanalysis), प्रगतिवादजैनेन्द्र, अज्ञेय, यशपाल
4. नई कहानी और उसके बाद1950 के बादनई कहानी (Nayi Kahani), आंचलिक, सचेतनमोहन राकेश, राजेन्द्र यादव, फणीश्वरनाथ रेणु

प्रेमचंद को ‘कहानी का सम्राट’ कहा जाता है, और उन्हीं के दौर के आरंभ में चन्द्रधर शर्मा गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ (1915) हिन्दी कहानी में एक नया मोड़ लाती है।

(इस विभाजन और पहली कहानी की बहस को और विस्तार से समझना हो, तो साहित्येतिहास के काल-विभाजन वाले हमारे नोट्स में यह पद्धति समझाई गई है।)

कहानी विधा की परंपरा और प्रवृत्तियाँ | Tradition and Trends of the Kahani Form

कहानी विधा की परंपरा को दो धाराओं में समझना आसान रहेगा। एक है हमारी देशी परंपरा और दूसरी है आधुनिक पाश्चात्य परंपरा का प्रभाव।

हमारी देशी परंपरा मौखिक (Oral Tradition) थी। दादी-नानी की लोककथा (Folk Tale), मेले में सुने किस्से (Qissa), धार्मिक व्रत-कथाएँ – ये सब कहानी के ही रूप थे। इनका उद्देश्य मनोरंजन के साथ-साथ शिक्षा देना था। आधुनिक कहानी ने इसी परंपरा से किस्सागोई ली, पर उसने संक्षिप्तता, एकसूत्रता और प्रभाव की एकता (Unity of Effect) जैसे नए शिल्प-गुण (Craft) पश्चिम से सीखे।

अब प्रवृत्तियों (Trends) की बात करते हैं। परीक्षा में आपसे सीधे पूछा जा सकता है कि हिन्दी कहानी की मुख्य प्रवृत्तियाँ कौन सी हैं। इन्हें ऐसे याद रखिए –

  • आदर्शवादी प्रवृत्ति (Idealistic Trend) – प्रेमचंद की शुरुआती कहानियाँ जैसे ‘पंच परमेश्वर’। इसमें अंत में अच्छाई की जीत होती है। बुरे व्यक्ति में भी हृदय-परिवर्तन दिखाया जाता है।
  • यथार्थवादी प्रवृत्ति (Realistic Trend) – जीवन जैसा है, वैसा ही दिखाना। प्रेमचंद की बाद की कहानियाँ, जैसे ‘पूस की रात’ और ‘कफन’। यहाँ कोई आदर्श का मुलम्मा नहीं है।
  • मनोविश्लेषणात्मक प्रवृत्ति (Psychological Trend) – बाहर की घटना से ज्यादा मन के भीतर क्या चल रहा है, इस पर जोर। जैनेन्द्र और अज्ञेय इसके मुख्य लेखक हैं। गुलेरी जी की ‘उसने कहा था’ में भी लहना सिंह के मन के भीतर का स्नेह और कर्तव्य का द्वंद्व इसी प्रवृत्ति की पूर्वपीठिका जैसा दिखता है।
  • प्रगतिवादी / सामाजिक यथार्थ (Progressive Trend) – गरीब, किसान, मजदूर के शोषण को सामने लाना। यशपाल इस धारा के प्रमुख कहानीकार हैं।
  • नई कहानी की प्रवृत्ति (Nayi Kahani Movement) – 1950 के बाद की कहानी। इसमें व्यक्ति के अकेलेपन, संबंधों के बिखराव और शहरी मध्यम वर्ग की कहानी कही गई। कोई बड़ा उपदेश नहीं, बस जीवन का एक टुकड़ा।

ध्यान दीजिए, ‘उसने कहा था’ और ‘पंच परमेश्वर’ दोनों लगभग एक ही दौर में ‘सरस्वती’ में छपीं, पर दोनों की प्रवृत्ति अलग है। ‘पंच परमेश्वर’ आदर्श को स्थापित करती है, जबकि ‘उसने कहा था’ प्रेम, कर्तव्य और बलिदान की एक मार्मिक कथा है जिसमें आदर्श और यथार्थ का संगम दिखता है। यह भी जान लीजिए कि कुछ विद्वान ‘उसने कहा था’ की संवेदना और शिल्प में नई कहानी की झलक भी देखते हैं।

Quick Summary : Modern Hindi short story emerged around 1900-1915 from both the ancient Katha tradition and Western short story influence, and its “first story” is still debated among Indumati, Ek Tokri Bhar Mitti, Gyarah Varsh Ka Samay and others. Its development moves from idealistic realism (Premchand era) to psychological, progressive and Nayi Kahani trends focusing on inner conflict and social reality.

2. कहानीकार परिचय | Introduction to the Authors

गुलेरी: जीवन और व्यक्तित्व | Guleri: Life and Personality

चन्द्रधर शर्मा गुलेरी का जीवन छोटा था, पर काम बहुत बड़ा। परीक्षा में उनका जीवन-परिचय अक्सर शॉर्ट नोट के रूप में पूछा जाता है, इसलिए तिथियाँ ध्यान से याद रखिए।

जन्म 7 जुलाई 1883 को जयपुर में हुआ था। इनके पिता का परिवार हिमाचल प्रदेश के गुलेर गाँव का था, और इसी से नाम के अंत में ‘गुलेरी’ जुड़ा। घर में संस्कृत, इतिहास और पुराने ग्रंथों का माहौल मिला। शिक्षा के बारे में यह पक्का मिलता है कि उन्होंने कलकत्ता विश्वविद्यालय से एफ.ए. और प्रयाग विश्वविद्यालय से बी.ए. किया। आप इसे ऐसे समझिए कि ये उस समय के सबसे पढ़े-लिखे लोगों में से थे। इन्हें संस्कृत, पाली (Pali), प्राकृत के साथ-साथ इतिहास, भाषा-विज्ञान (Linguistics) और पुरातत्व (Archaeology) का असाधारण ज्ञान था, और ‘पुरानी हिन्दी’ पर उनका शोध इसी विद्वता का नमूना है।

नौकरी के तौर पर गुलेरी जी मेयो कॉलेज, अजमेर में संस्कृत विभाग के प्रमुख रहे। 1922 में उन्हें काशी हिन्दू विश्वविद्यालय में प्राचीन इतिहास और धर्म की ‘मनीन्द्र चंद्र नंदी’ पीठ पर नियुक्त किया गया, पर उसी वर्ष उनका निधन हो गया। उन्होंने पत्रिका-संपादन भी किया और नागरी प्रचारिणी सभा के संपादक-मंडल से भी जुड़े रहे। जीवन भर वे एक अध्यापक और शोधक (Researcher) ही रहे।

व्यक्तित्व की बात करें तो गुलेरी जी गंभीर विद्वान थे, पर बातचीत में बहुत विनोदी। वे दिखावे से दूर रहते थे। उनका लेखन कम है, पर हर पंक्ति में विद्वता झलकती है। उन्हें जयपुर की जंतर-मंतर वेधशाला को बचाने के प्रयासों के लिए भी याद किया जाता है। मात्र 39 वर्ष की आयु में सितम्बर 1922 में काशी में इनका निधन हो गया (अधिकांश हिन्दी स्रोत 12 सितम्बर लिखते हैं; कुछ अंग्रेजी स्रोतों में 11 सितम्बर मिलता है, इसलिए परीक्षा में ‘सितम्बर 1922’ लिखना सुरक्षित रहेगा)। कम उम्र में ही हिन्दी साहित्य ने अपना एक बड़ा इतिहास-पुरुष खो दिया।

गुलेरी की रचनाएँ | Works of Guleri

अब देखिए, यह बात बड़ी रोचक है। गुलेरी जी ने बहुत कम लिखा, पर जो लिखा वह मील का पत्थर बन गया। इसीलिए इन्हें ‘कम लिखकर अधिक सम्मान पाने वाला लेखक’ कहा जाता है।

उनकी रचनाओं को दो हिस्सों में बाँट लीजिए –

1. कहानियाँ – कुल तीन ही कहानियाँ:

कहानी का नामप्रकाशनविशेष बात
सुखमय जीवनप्रकाशन-वर्ष स्रोतों में एकमत नहीं मिलताउनकी चर्चित कहानियों में गिनी जाती है
बुद्धू का काँटाप्रकाशन-वर्ष स्रोतों में एकमत नहीं मिलताउनकी चर्चित कहानियों में गिनी जाती है; इस पर नाट्य-रूपांतर भी हुआ है
उसने कहा था1915, ‘सरस्वती’अनेक आलोचक इसे हिन्दी की पहली कलात्मक रूप से परिपक्व कहानी मानते हैं

(ध्यान दें: पहली दो कहानियों के प्रकाशन-वर्ष हम किसी भरोसेमंद स्रोत से पक्के नहीं कर पाए, इसलिए यहाँ वर्ष नहीं दिए गए। परीक्षा में केवल ‘तीन कहानियाँ’ और ‘उसने कहा था (1915)’ लिखना काफी है।)

परीक्षा में ‘उसने कहा था’ पर ही सबसे ज्यादा सवाल बनते हैं। इसे हिन्दी की सबसे चर्चित और परिपक्व आरंभिक कहानियों में गिना जाता है।

2. निबंध, शोध और संपादन:

  • उन्होंने ‘समालोचक’ पत्रिका का संपादन किया। यह उस समय की गंभीर आलोचना की पत्रिका के रूप में प्रसिद्ध हुई। (संपादन के वर्षों को लेकर स्रोतों में एकरूपता नहीं मिली, इसलिए हम तिथि नहीं दे रहे।)
  • उनके निबंध – ‘कछुआ धर्म’, ‘मारेसि मोहिं कुठाउँ’, ‘होली की ठिठोली का एप्रिल फूल’ – इतिहास, समाज और भाषा पर पठनीय निबंध हैं।
  • इतिहास और पुरातत्व में ‘देवकुल’, ‘पुरानी पगड़ी’, ‘पृथ्वीराज विजय महाकाव्य’ और ‘जयसिंह प्रकाश’ जैसे काम; कविता में ‘एशिया की विजयादशमी’, ‘झुकी कमान’, ‘स्वागत’, ‘कुसुमांजलि’ जैसी रचनाएँ; और भाषा-विज्ञान में ‘पुरानी हिन्दी’ उनकी महत्त्वपूर्ण पहचान है।

तो याद रखिए, गुलेरी जी कहानीकार से अधिक विद्वान, इतिहासकार और भाषा-शोधक थे, पर उनकी एक ही कहानी ने उन्हें अमर कर दिया।

प्रेमचंद: जीवन और व्यक्तित्व | Premchand: Life and Personality

प्रेमचंद का परिचय तो आपको विस्तार से याद होना चाहिए। वे सिर्फ लेखक नहीं, एक पूरा युग हैं।

जन्म 31 जुलाई 1880 को लमही गाँव, वाराणसी के पास हुआ। बचपन का नाम था धनपत राय श्रीवास्तव। पिता मुंशी अजायब लाल डाक-विभाग में क्लर्क (डाक-मुंशी) थे, माता का नाम आनंदी देवी था और घर की हालत गरीबी वाली थी। माता का देहांत बचपन में ही हो गया। गरीबी, अभाव और बचपन की जिम्मेदारियों ने उन्हें जीवन को बहुत करीब से देखना सिखा दिया।

वे पहले अध्यापक (Teacher) बने, फिर डिप्टी सब-इंस्पेक्टर ऑफ स्कूल्स। 1899 से 1921 तक का यही सरकारी जीवन रहा। पर 1921 में गाँधी जी के असहयोग आंदोलन (Non-Cooperation Movement) के आह्वान पर उन्होंने सरकारी नौकरी से इस्तीफा दे दिया (इस्तीफे की तिथि 16 फरवरी 1921 बताई जाती है)। यह घटना उनके व्यक्तित्व को समझने के लिए बहुत जरूरी है।

उनके दो नाम बहुत पूछे जाते हैं। पहले वे उर्दू में नवाब राय नाम से लिखते थे। उनके कहानी-संग्रह ‘सोज़े-वतन’ को अंग्रेज सरकार ने 1910 में जब्त कर लिया। (संग्रह के प्रकाशन-वर्ष को लेकर स्रोतों में 1907 से 1909 तक का अंतर मिलता है, इसलिए परीक्षा में ‘जब्ती: 1910’ याद रखना ज्यादा सुरक्षित है।) इसके बाद उन्हें नाम बदलकर प्रेमचंद लिखना पड़ा; उर्दू पत्रिका ‘ज़माना’ के संपादक की सलाह का जिक्र भी मिलता है। उनका दूसरा विवाह 1906 में शिवरानी देवी से हुआ, जो बाल-विधवा थीं, और उस समय यह एक साहसिक कदम माना गया। शिवरानी देवी ने बाद में ‘प्रेमचंद घर में’ नाम से संस्मरण लिखा।

व्यक्तित्व? बिल्कुल सादा जीवन। धोती-कुर्ता, पैदल चलना, किसानों और मजदूरों के बीच बैठना। उन्होंने ‘हंस’ (Hans) और ‘जागरण’ (Jagran) का संपादन और प्रकाशन किया, और इस काम में उन पर कर्ज भी चढ़ा। स्वभाव से वे प्रगतिशील (Progressive) और मानवतावादी (Humanist) थे। 8 अक्टूबर 1936 को उनका निधन हुआ।

प्रेमचंद की रचनाएँ | Works of Premchand

प्रेमचंद बहुत लिखते थे। गिनती के आधार पर स्रोतों में थोड़ा अंतर मिलता है: लगभग 250 से 300 कहानियाँ (मानसरोवर के आठ भागों में संकलित) और एक दर्जन से अधिक उपन्यास (Novels)। परीक्षा में ‘लगभग 300 कहानियाँ और एक दर्जन से अधिक उपन्यास’ लिखना ठीक रहेगा।

उनके लेखन को दो चरणों में समझिए, यह DU के पेपर में अक्सर आता है –

  • पहला चरण – आदर्शोन्मुख यथार्थवाद (Idealistic Realism): अंत में आदर्श की जीत।
  • दूसरा चरण – यथार्थवाद (Realism): जीवन जैसा है, वैसा ही। कोई आदर्श का पर्दा नहीं।

प्रमुख उपन्यास याद कर लीजिए (प्रकाशन-वर्ष स्रोतों में एक-दो साल के अंतर से मिलते हैं; यहाँ प्रचलित वर्ष दिए हैं) –

  • सेवासदन (1918) – वेश्या-जीवन और मध्यवर्गीय नैतिक पाखंड पर; इसे प्रेमचंद का पहला बड़ा हिन्दी उपन्यास माना जाता है
  • प्रेमाश्रम (1922), रंगभूमि (1925) – किसान-जीवन और सामाजिक-राजनीतिक संघर्ष पर
  • निर्मला (1927) – दहेज और बेमेल विवाह की समस्या पर
  • गबन (1931), कर्मभूमि (1932)
  • गोदान (1936) – उनका अंतिम पूर्ण उपन्यास और सबसे महान कृति, किसान-जीवन का महाकाव्य (Epic); ‘मंगलसूत्र’ उनका अधूरा उपन्यास है

कहानी-संग्रह (Story Collections): ‘सोज़े-वतन’, सप्त सरोज, नवनिधि, प्रेम-पचीसी और अंततः मानसरोवर (8 भागों में)।

आपके सिलेबस की कहानी पंच परमेश्वर (1916) उनकी प्रारंभिक हिन्दी कहानियों में बहुत प्रसिद्ध है। इसके अलावा पूस की रात, ईदगाह, बूढ़ी काकी, कफन (1936) – ये चार कहानियाँ तो आपको नाम से जरूर याद होनी चाहिए। प्रेमचंद ने उर्दू और हिन्दी दोनों में लिखा, और हिन्दी कहानी को गाँव की चौपाल से लेकर शहर के मंच तक पहुँचा दिया।

Quick Summary : Chandradhar Sharma Guleri (1883-1922), a short-lived but great scholar born in Jaipur, wrote only three stories, yet Usne Kaha Tha (1915) became one of the most celebrated early Hindi stories. Premchand (1880-1936), originally Dhanpat Rai, left his government job in 1921 and wrote roughly 250-300 stories and over a dozen novels, including Godan and Panch Parmeshwar, establishing idealistic realism and realism in Hindi fiction.

3. पाठ परिचय | Introduction to the Prescribed Texts

उसने कहा था: परिचय | Usne Kaha Tha: Introduction

यह कहानी आपके सिलेबस की सबसे खास कहानी है। ध्यान दीजिए, इसे सिर्फ एक प्रेम-कहानी मत समझिए।

प्रकाशन और पृष्ठभूमि – ‘उसने कहा था’ 1915 में ‘सरस्वती’ पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। यह वह समय था जब प्रथम विश्व युद्ध (World War I) चल रहा था और भारतीय सैनिक अंग्रेजों की ओर से फ्रांस के मोर्चे पर तैनात थे। गुलेरी जी ने इन्हीं भारतीय सिख सिपाहियों को अपनी कहानी का विषय बनाया। शीर्षक का अर्थ है – किसी स्त्री ने लहना सिंह से कुछ कहा था, और उसी एक कथन ने उसके जीवन का सबसे बड़ा निर्णय तय कर दिया।

कहानी का संसार – कहानी पाँच खंडों में बँटी है, पर अर्थ की दृष्टि से इसके दो बड़े हिस्से हैं। पहला हिस्सा अमृतसर का एक बाजार है। 12 साल का लड़का (लहना सिंह) और 8 साल की एक लड़की, दोनों सिख हैं और अपने-अपने मामा के घर रहते हैं। लड़की का भोलापन, उसका यह कहना कि ‘हाँ, मेरी कुड़माई हो गई है’ – यह बचपन का दृश्य है। दूसरा हिस्सा लगभग 25 साल बाद का है। फ्रांस के मोर्चे (Front) पर भारतीय सेना जर्मनों से लड़ रही है। वही लहना सिंह अब नंबर 77 सिख राइफल्स का जमादार है। वहीं उसकी भेंट सूबेदार हजारा सिंह, उसके बेटे बोधा सिंह और साथी सिपाही वजीरा सिंह से होती है।

और यहीं लेखक फ्लैशबैक (पूर्वदीप्ति) तकनीक का असरदार प्रयोग करते हैं। कहानी के अंत में, मौत के कुछ क्षण पहले, लहना की स्मृति में पूरा अतीत परत-दर-परत खुलता है। अनेक आलोचक इसे हिन्दी कहानी के सबसे सफल आरंभिक पूर्वदीप्ति-प्रयोगों में गिनते हैं।

क्यों महत्वपूर्ण है?

  • भाषा – हिन्दी के बीच-बीच में पंजाबी, उर्दू और फौजी शब्दों का सजीव प्रयोग।
  • पात्र – लहना सिंह – ऐसा सिपाही जो स्नेह को मन में छिपाकर कर्तव्य निभाता है। सूबेदारनी – वह छोटी लड़की जो अब एक पत्नी और माँ है।
  • भाव – इसमें प्रेम (Love), कर्तव्य (Duty) और बलिदान (Sacrifice) तीनों एक साथ हैं। लहना सिंह अंत में सूबेदारनी से किए वादे के लिए अपनी जान दे देता है।
  • शिल्प – पाँच खंडों में बँटी संरचना, जिसे कुछ विद्वानों ने नाटकीय ढंग का होने के कारण ‘कथा-नाट्य’ भी कहा है।

परीक्षा में अक्सर पूछा जाता है – ‘उसने कहा था’ को हिन्दी की पहली कलात्मक कहानी क्यों कहते हैं? इसका उत्तर है – इसकी कसावट, फ्लैशबैक शिल्प, जीवंत भाषा और नायक का मनोवैज्ञानिक चित्रण। (ध्यान दीजिए: ‘पहली कहानी’ और ‘पहली कलात्मक रूप से परिपक्व कहानी’ दो अलग दावे हैं; उत्तर में यह फर्क जरूर बताइए।)

पंच परमेश्वर: परिचय | Panch Parmeshwar: Introduction

अब आते हैं प्रेमचंद की कहानी पर। ‘उसने कहा था’ अगर प्रेम और बलिदान की कहानी है, तो ‘पंच परमेश्वर’ न्याय (Justice) और मित्रता की कहानी है।

प्रकाशन – यह कहानी जून 1916 में ‘सरस्वती’ में प्रकाशित हुई थी। नागरी प्रचारिणी सभा के अभिलेखागार से जुड़ी हाल की चर्चा में भी यही तिथि दी गई है, और वहाँ यह भी दर्ज है कि इससे पहले ‘सरस्वती’ में प्रेमचंद की ‘सौत’ (दिसंबर 1915) और ‘सज्जनता का दंड’ (मार्च 1916) छप चुकी थीं। इस कहानी का उर्दू रूप ‘पंचायत’ नाम से भी मिलता है। यह प्रेमचंद की शुरुआती हिन्दी कहानियों में सबसे ज्यादा पढ़ी जाने वाली कहानियों में से है।

ध्यान दें – प्रेमचंद की पहली हिन्दी कहानी कौन सी? इस पर भी मत अलग हैं। पाठ्य-सामग्री में नगेन्द्र के हवाले से ‘सौत’ (1915) और गणपतिचंद्र गुप्त के हवाले से ‘पंच परमेश्वर’ का नाम मिलता है। परीक्षा में ‘सौत (1915) हिन्दी में प्रकाशित उनकी आरंभिक कहानी है और पंच परमेश्वर (1916) उसके बाद की प्रसिद्ध कहानी’ लिखना सुरक्षित रहेगा।

शीर्षक का अर्थ बहुत सीधा है – पंच में ही परमेश्वर बसता है। जब कोई व्यक्ति पंचायत (Panchayat) में पंच बनकर बैठता है, तो वह व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठ जाता है।

कहानी का सार – कहानी में दो गहरे दोस्त हैं – अलगू चौधरी और जुम्मन शेख। जुम्मन अपनी बूढ़ी विधवा खाला की थोड़ी-सी संपत्ति जीवन भर रोटी-कपड़ा देने का वादा करके अपने नाम करा लेता है, पर रजिस्ट्री होते ही उसकी और उसकी पत्नी की खातिरदारी ठंडी पड़ जाती है। खाला पंचायत बुलाती है। अलगू को सरपंच (Sarpanch) बनाया जाता है। अब देखिए, यहाँ द्वंद्व है। अलगू का मन कहता है कि दोस्त का साथ दूँ, पर पंच की गद्दी कहती है कि न्याय करो। अलगू जुम्मन के विरुद्ध फैसला देता है। जुम्मन इसे दोस्त की दगाबाजी मान लेता है।

कुछ समय बाद दूसरी पंचायत बैठती है। इस बार मामला अलगू का है: उसने अपना बैल समझू साहु को बेचा था, पर बैल मर गया और समझू ने पैसे देने से इनकार कर दिया। और इस बार सरपंच हैं जुम्मन शेख। अब बदला लेने का मौका है। पर जुम्मन भी वही करता है जो एक सच्चे पंच को करना चाहिए। वह अलगू के पक्ष में ईमानदार फैसला देता है।

विशेष बातें जो परीक्षा के लिए जरूरी हैं –

  • पात्र – जुम्मन शेख, अलगू चौधरी, खाला जान, समझू साहु। सभी ग्रामीण जीवन से लिए गए जीवंत पात्र।
  • भाषा-शैली – बिल्कुल सहज, ग्रामीण बोलचाल की हिन्दी। कोई कठिन शब्द नहीं। प्रेमचंद की यही ताकत है।
  • प्रवृत्ति – यह आदर्शोन्मुख यथार्थवाद (Idealistic Realism) का बहुचर्चित उदाहरण है। यथार्थ है कि दोस्ती में खटास आती है, पर आदर्श यह है कि न्याय की कुर्सी पर बैठकर मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठ जाता है।
  • संदेश – मित्रता से बड़ा धर्म न्याय का धर्म है।

दोनों कहानियाँ द्विवेदी युग के उत्तरार्ध (1915-16) की देन हैं, पर दोनों ने हिन्दी कहानी को दो अलग-अलग रास्ते दिखाए – एक ने शिल्प में और दूसरी ने विचार में।

Quick Summary : Usne Kaha Tha (1915) by Guleri is a five-part story with an effective flashback structure, set between Amritsar and WWI France, depicting love, duty and sacrifice through Lahna Singh. Panch Parmeshwar (June 1916) by Premchand is an idealistic story of friendship and justice where two friends, Algu and Jumman, learn that a Panch must rise above personal bias, because God speaks through the Panchayat.

4. कहानी विश्लेषण | Story Analysis

उसने कहा था: कथानक | Usne Kaha Tha: Plot

इस कहानी का कथानक (Plot) सीधा नहीं चलता, वह घूम-फिर कर चलता है। इसीलिए इसे समझना थोड़ा ध्यान से जरूरी है। पहले पाँच खंडों का नक्शा देख लीजिए, फिर विस्तार से पढ़िए।

खंडकहाँ और कबमुख्य घटना
1अमृतसर का बाजार, बचपन12 साल का लड़का और 8 साल की लड़की; ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ – ‘धत्’; एक दिन जवाब ‘हाँ, हो गई’; लड़का बेचैन
2फ्रांस का मोर्चा, लगभग 25 साल बादनं. 77 सिख राइफल्स का जमादार लहना सिंह; सूबेदार हजारा सिंह, बोधा सिंह, वजीरा सिंह; खाई का जीवन
3 और 4खाई, युद्ध की रातबीमार बोधा की देखभाल; ‘लपटन साहब’ बने जर्मन जासूस की पहचान; जर्मन हमला; लहना को गोली लगती है, वह घाव छिपाता है
5खाई में, मृत्यु से पहलेस्मृति में सूबेदारनी से मुलाकात और उसका अनुरोध; वजीरा सिंह के सामने अंतिम साँस; बाद में अखबार में सूचना

कहानी की शुरुआत अमृतसर के एक बाजार से होती है। लहना सिंह बारह साल का लड़का है और एक छोटी-सी लड़की, आठ साल की, जिससे उसकी छेड़छाड़ भरी बातचीत होती है। दोनों अपने-अपने मामा के घर रहते हैं; लड़का मामा के केश धोने के लिए दही और लड़की रसोई के लिए बड़ियाँ लेने बाजार आई है। लड़का पूछता है, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ (कुड़माई यानी सगाई), और लड़की ‘धत्’ कहकर भाग जाती है। यह सिलसिला लगभग एक महीने चलता है। फिर एक दिन लड़की जवाब देती है कि हाँ, हो गई, और कल ही हुई, ‘देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।’ यह दृश्य एकदम बचपन का, भोला-भाला दृश्य है, पर लड़के की मनोदशा बदल जाती है और वह गुस्से में रास्ते में आने वालों से बेवजह उलझ पड़ता है। इसके बाद कहानी अचानक 25 साल आगे कूद जाती है।

अब हम प्रथम विश्व युद्ध (World War I) के फ्रांस के मोर्चे (Front) पर हैं। वही लहना सिंह अब नंबर 77 सिख राइफल्स का जमादार है। साथ में हैं सूबेदार हजारा सिंह, उनका बेटा बोधा सिंह और सिपाही वजीरा सिंह। यहाँ पाठक को अभी यह नहीं बताया जाता कि यह जमादार वही अमृतसर वाला लड़का है; लेखक यह रहस्य बाद में खोलते हैं। खाई (Trench) की ठंड, बर्फ और सिपाहियों की आपसी हँसी-ठिठोली से मोर्चे का माहौल बनता है।

अब कहानी का सबसे नाटकीय हिस्सा शुरू होता है। बोधा सिंह बीमार है, और लहना उसकी देखभाल ही नहीं करता, उसकी पहरे की ड्यूटी भी खुद निभाता है। तभी खाई में एक नया पात्र आता है जो खुद को लपटन साहब (अंग्रेज अफसर) बताता है। वह सूबेदार हजारा सिंह को हुक्म देता है कि पास की जर्मन खाई पर धावा बोलो और दस सैनिकों को छोड़कर बाकी सबको साथ ले जाओ। बोधा की बीमारी को देखते हुए लहना खाई में ही रुक जाता है। लपटन साहब से बातचीत में लहना को शक होता है और वह समझ जाता है कि यह कोई अंग्रेज अफसर नहीं, जर्मन जासूस है जिसने बहरूपिया बनकर भेष धरा है। लहना होशियारी से उस पर हमला करके उसे बेहोश कर देता है। उसी समय लगभग 70 जर्मन सैनिक उस खाई पर हमला कर देते हैं। लहना वीरता से मुकाबला करता है और वजीरा सिंह को पीछे के रास्ते से सूबेदार को खबर देने भेज देता है। उधर हजारा सिंह की टुकड़ी लौट आती है और जर्मन दोनों तरफ से घिरकर खत्म हो जाते हैं। इस लड़ाई में लहना की पसली में गोली लगती है, पर वह घाव को हजारा सिंह और बोधा सिंह से छिपाए रखता है। जब डॉक्टर और घायलों को ढोने वाली गाड़ियाँ पहुँचती हैं, तब गंभीर रूप से घायल होकर भी लहना खुद न जाकर हजारा सिंह और बोधा सिंह को भेज देता है, और सूबेदार से कह देता है कि घर जाओ तो कह देना, जो उसने कहा था, वह मैंने कर दिया।

अंतिम खंड में कहानी चरमोत्कर्ष पर पहुँचती है। लहना खाई में गंभीर रूप से घायल पड़ा है और उसके साथ उसका साथी वजीरा सिंह है। मृत्यु के कुछ पल पहले उसकी स्मृति बहुत साफ हो जाती है। 12 साल का लहना, अमृतसर का बाजार, आठ साल की लड़की, ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ – सब परत-दर-परत खुलता है। फिर 25 साल बाद की वह घड़ी याद आती है जब वह सूबेदार के घर गया था और सूबेदारनी ने उससे पूछा था कि ‘मुझे पहचाना?’ सूबेदारनी वही आठ साल की लड़की है। वह अपनी व्यथा बताती है: एक ही बेटा बचा है, चार और हुए पर कोई जिया नहीं। फिर वह लहना को वह पुरानी घटना याद दिलाती है जब तांगे का घोड़ा दही की दुकान के आगे बिगड़ गया था और लहना ने उसके प्राण बचाए थे; और कहती है कि ऐसे ही इन दोनों (पति और बेटे) को बचाना। लहना यह बात गाँठ बाँध लेता है। वजीरा सिंह के आँसू टपक रहे होते हैं, और कुछ दिन बाद लोग अखबार में पढ़ते हैं – फ्रांस और बेल्जियम की 68वीं सूची में, ‘मैदान में घावों से मरा – नं. 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह।’ यही एक वाक्य उसकी मृत्यु को बलिदान बना देता है।

अमृतसर से फ्रांस और फिर स्मृति तक कथानक का प्रवाह-चित्र
‘उसने कहा था’ की पाँच खंडों की संरचना

परीक्षा की सावधानी: कई छात्र लिख देते हैं कि लहना अस्पताल में मरा या बोधा सिंह युद्ध में घायल हुआ। कहानी के अनुसार बोधा बीमार है और लहना की मृत्यु मोर्चे की खाई में होती है; उसकी मृत्यु की सूचना अखबार से मिलती है। इसी तरह सूबेदारनी से मुलाकात छावनी में नहीं, सूबेदार के घर पर हुई थी।

उसने कहा था: पात्र-चरित्र | Usne Kaha Tha: Characterization

इस कहानी में भीड़ नहीं है। गिने-चुने पात्र हैं, पर हर पात्र अपने आप में पूरा है। परीक्षा में पात्र-योजना पर सवाल जरूर बनता है।

1. लहना सिंह – कहानी का नायक। ध्यान दीजिए, यह कोई फिल्मी हीरो नहीं है। बाहर से वह एक हँसमुख, हाजिरजवाब और बेबाक फौजी है। पर भीतर से निष्ठावान प्रेमी और कर्तव्यनिष्ठ सैनिक है। वह बचपन के स्नेह को मन में दबाए रखता है, कभी कहता नहीं। उसका स्नेह कामना का नहीं, श्रद्धा और विश्वास का है। इसीलिए वह सूबेदारनी के पति और बेटे को बचाने के लिए जान दे देता है। इसके साथ वह चतुर और साहसी भी है: जर्मन जासूस को पहचान लेना और घायल होकर भी घाव छिपाए रखना इसी का प्रमाण है। उसका चरित्र त्याग (Sacrifice) और संयम (Restraint) का प्रतीक है।

2. सूबेदारनी – वह कहानी में बहुत कम देर के लिए आती है, पर पूरी कहानी उसी पर टिकी है। बचपन में चंचल लड़की और बाद में एक जिम्मेदार पत्नी और माँ, जिसने चार बच्चे खोए हैं। वह एक पारंपरिक भारतीय स्त्री का रूप है जो अपने पति और बेटे की रक्षा के लिए उस व्यक्ति पर भरोसा करती है जिसने कभी उसकी जान बचाई थी। उसका एक कथन ही कहानी का केंद्र है। (हाँ, कुछ आलोचक इस भरोसे को दूसरे नजरिए से भी देखते हैं; आगे ‘आलोचकों की दृष्टि’ में देखिए।)

3. सूबेदार हजारा सिंह और बोधा सिंह – ये दोनों लहना के लिए उस वचन को निभाने का माध्यम बनते हैं। हजारा सिंह एक अनुभवी, वरिष्ठ सिपाही है और बोधा सिंह एक युवा सैनिक है जो कहानी के इस हिस्से में बीमार है और लहना के विशेष स्नेह और देखभाल का पात्र बनता है।

4. वजीरा सिंह और अन्य सिपाही – वजीरा सिंह कहानी में एक भरोसेमंद साथी की तरह आता है: लहना उसे सूचना देने भेजता है और अंतिम समय में वही उसके पास होता है। इन सिपाहियों की पंजाबी मिली-जुली बोली और हँसी-ठिठोली से मोर्चे का माहौल जीवंत हो जाता है और कहानी में यथार्थ (Realism) आता है।

5. लपटन साहब (जर्मन जासूस) – यह पात्र छोटा है, पर कथानक के लिए निर्णायक है। उसी के बहाने लहना की सूझ-बूझ, साहस और फुर्ती सामने आती है।

कुल मिलाकर, गुलेरी जी ने कम पात्रों से गहरी मनोवैज्ञानिक कथा (Psychological Narrative) कह दी है।

उसने कहा था: केंद्रीय संवेदना | Usne Kaha Tha: Central Theme

अब देखिए, इस कहानी की केंद्रीय संवेदना (Central Theme) क्या है? ऊपर से देखने पर यह युद्ध की कहानी लगती है, पर अंदर से यह प्रेम, विश्वास और वचन की कहानी है। UGC-INFLIBNET की ई-पाठशाला के पाठ में इसकी संवेदना को इसी तरह पढ़ा गया है: किशोरावस्था का सहज आकर्षण पवित्र स्नेह में बदलता है और अंत में विशुद्ध कर्तव्य-भावना का रूप ले लेता है।

इसकी मुख्य संवेदना है – निष्काम प्रेम और कर्तव्य का मेल, और अंत में वचन के लिए प्राणों का बलिदान। लहना सिंह उस लड़की से स्नेह रखता है, पर वह कभी अपने प्रेम को व्यक्त नहीं करता। जब वह लड़की दूसरे की पत्नी बन जाती है, तो उसका स्नेह और भी मर्यादित हो जाता है। वह प्रेम को पाने की चीज नहीं, निभाने की चीज मानता है।

दूसरा बड़ा भाव है – कर्तव्य-बोध (Sense of Duty)। लहना सिंह एक सिपाही है। सिपाही का धर्म है अपने साथियों की रक्षा करना। पर यहाँ कर्तव्य दोहरा हो जाता है। एक सिपाही का कर्तव्य और एक वचन निभाने का व्यक्तिगत कर्तव्य। वह दोनों को एक साथ निभाता है। एक पाठ यह भी कहता है कि लहना की असली लड़ाई दो हैं: एक जर्मनों के विरुद्ध मोर्चे की, और दूसरी रिश्ते के विश्वास को बचाने की, और उसकी मृत्यु इसी दूसरे युद्ध में होती है।

तीसरा भाव है – भारतीय सैनिक का मानवीय चरित्र। गुलेरी जी ने दिखाया है कि भारतीय सिपाही केवल लड़ने वाला नहीं, भावनाओं वाला मनुष्य भी है। वह हँसता है, मजाक करता है, पर समय आने पर हँसते-हँसते प्राण दे देता है। साथ ही कहानी में युद्ध का वर्णन तटस्थ ढंग से हुआ है; लेखक युद्ध का समर्थन नहीं करते, केवल उसकी भयावहता दिखाते हैं।

तो परीक्षा में अगर पूछा जाए कि इस कहानी का संदेश क्या है, तो लिखिए – सच्चा प्रेम त्याग और विश्वास माँगता है, भोग नहीं, और निभाया गया वचन प्राणों से भी बड़ा हो सकता है। यही वह संवेदना है जो इस कहानी को अमर बनाती है।

उसने कहा था: शीर्षक की सार्थकता | Usne Kaha Tha: Appropriateness of Title

अक्सर छात्र सोचते हैं कि शीर्षक तो बस नाम है। पर अच्छी कहानी में शीर्षक ही कहानी की आत्मा होता है। और ‘उसने कहा था’ इसका सबसे बड़ा उदाहरण है।

यह शीर्षक प्रतीकात्मक (Symbolic) और उत्सुकता जगाने वाला है। ‘उसने’ कौन? ‘क्या कहा था’? – पाठक के मन में यही सवाल शुरू से अंत तक बना रहता है। गुलेरी जी ने बड़ी चतुराई से शीर्षक को कहानी के क्लाइमेक्स (Climax) से जोड़ा है, क्योंकि लहना के अंतिम शब्द भी यही हैं – ‘उसने कहा था’।

पूरी कहानी एक ही अनुरोध पर टिकी है – सूबेदारनी का लहना सिंह से कहना कि ऐसे ही इन दोनों को बचाना। लहना सिंह के आखिरी दिनों की हर क्रिया, युद्ध में उसकी वीरता, घाव को छिपाना और अंत में उसकी मृत्यु – सब कुछ इसी एक कथन से जुड़ा है। अगर यह वचन न होता, तो हम लहना की इस असाधारण निष्ठा को उस रूप में देख ही न पाते।

दूसरी बात, यह शीर्षक कहानी के फ्लैशबैक शिल्प को भी सार्थक करता है। ‘कहा था’ – मतलब अतीत में कहा गया था। यह अतीत ही वर्तमान को चला रहा है। लहना मरते समय भी उसी अतीत को याद करता है।

इसलिए यह शीर्षक न तो केवल घटना पर है, न पात्र पर। यह एक संवेदना पर आधारित शीर्षक है। यह बताता है कि किसी के कहे हुए एक छोटे-से वाक्य का मनुष्य के जीवन पर कितना बड़ा असर हो सकता है। इसीलिए यह शीर्षक पूरी तरह सार्थक और कलात्मक (Artistic) है।

पंच परमेश्वर: कथानक | Panch Parmeshwar: Plot

प्रेमचंद की कहानियों का कथानक (Plot) बिल्कुल सीधा, गाँव की पगडंडी जैसा होता है। ‘पंच परमेश्वर’ का कथानक भी बहुत सरल है।

शुरुआत: गहरी दोस्ती। कहानी दो दोस्तों की है – जुम्मन शेख और अलगू चौधरी। साझे में खेती होती है, लेन-देन में भी साझा है और दोनों को एक-दूसरे पर अटल विश्वास है। जब जुम्मन हज करने गए तो अपना घर अलगू को सौंप गए; अलगू बाहर जाते तो घर जुम्मन पर छोड़ जाते। दोनों में न खान-पान का व्यवहार था, न धर्म का नाता; केवल विचार मिलते थे, और कहानी के अनुसार मित्रता का मूलमंत्र भी यही है। इस मित्रता की जड़ें उस समय की हैं जब दोनों जुम्मन के पिता शेख जुमेराती से पढ़ा करते थे।

पहली पंचायत। जुम्मन की एक बूढ़ी विधवा खाला है। वह अपनी थोड़ी-सी संपत्ति इस वादे पर जुम्मन के नाम कर देती है कि वह उसे जीवन भर रोटी-कपड़ा देगा। रजिस्ट्री होते ही खातिरदारी बदल जाती है। जुम्मन की पत्नी रोटियों के साथ व्यवहार भी रूखा कर देती है, और खाला के पास शिकायत के सिवा कुछ नहीं बचता। जब जुम्मन टालमटोल करता है तो खाला पंचायत की धमकी देती है। जुम्मन हँस पड़ता है, क्योंकि उसे अपने रसूख पर पूरा भरोसा है। खाला कई दिन गाँव-गाँव घूमकर फरियाद करती है और अंत में अलगू चौधरी के पास आती है।

यहाँ पहला मोड़ है। अलगू पहले कतराता है: ‘जुम्मन मेरे पुराने दोस्त हैं, उनसे बिगाड़ नहीं कर सकता।’ तब खाला का वह तीर चलता है जो कहानी की जान है: क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे? अलगू के पास कोई जवाब नहीं रहता। पंचायत में खाला जब पंचों के नाम पर बात करती है, तो जुम्मन खुद खुश हो जाता है कि अलगू का नाम आया है, क्योंकि उसे लगता है कि दोस्ती के कारण फैसला उसके हक में ही जाएगा। (ध्यान रखिए: नोट्स में अक्सर उल्टा लिख दिया जाता है कि जुम्मन अलगू को पंच बनाने से मना करता है। कहानी में ऐसा नहीं है; जुम्मन तो अलगू के नाम पर प्रसन्न होता है।) अलगू चौधरी को सरपंच बनाया जाता है।

अब अलगू के सामने धर्म-संकट है। एक तरफ दोस्ती, दूसरी तरफ न्याय (Justice)। पर पंच की गद्दी पर बैठते ही अलगू बदल जाता है। वह जुम्मन से कहता है कि इस समय न तुम मेरे दोस्त हो, न मैं तुम्हारा; यह न्याय और ईमान का मामला है। अलगू को अदालती मामलों का अनुभव है, इसलिए वह जुम्मन से कड़ी जिरह करता है। फिर वह फैसला देता है कि जुम्मन खाला के माहवार गुजारे का इंतजाम करे, वरना उसका हिबानामा (दानपत्र) रद्द हो जाएगा। फैसला खाला के हक में जाता है। जुम्मन सन्नाटे में आ जाता है और अलगू से दुश्मनी मान लेता है। दोस्ती अब भी निभती दिखती है, पर जुम्मन के मन में दोस्त की ‘गद्दारी’ और बदले की इच्छा बैठ चुकी है।

बदले का मौका। अलगू ने पिछले साल मेले से पछाईं नस्ल के बैलों की एक अच्छी जोड़ी खरीदी थी। उस पंचायत के लगभग एक महीने बाद एक बैल मर जाता है। जुम्मन इसे दगाबाजी की सजा बताता है, और अलगू को शक होता है कि जुम्मन ने जहर दिलवाया है। अकेला बैल किस काम का, इसलिए अलगू उसे गाँव के समझू साहु को बेच देता है, पैसे का वादा एक महीने बाद का होता है। समझू बैल से दिन में तीन-चार खेपें कराता है, चारे-पानी की फिक्र नहीं करता, और एक दिन ज्यादा बोझ लादकर कोड़े बरसाता है; बैल रास्ते में गिरकर मर जाता है। उसी रात समझू के कुछ पैसे और माल भी चोरी हो जाते हैं, और वह सारा गुस्सा अलगू पर उतारता है। कुछ महीने बाद जब अलगू पैसे माँगता है तो समझू और उसकी पत्नी बिगड़ पड़ते हैं कि तुमने बीमार बैल बेचा था। गाँव के लोग पंचायत की सलाह देते हैं।

दूसरी पंचायत। अलगू पंच चुनने में पहली गलती से सबक लेकर सावधानी रखता है। समझू सरपंच के रूप में जुम्मन शेख का नाम रखता है। अलगू को झटका लगता है, पर वह मजबूरी में हामी भर देता है। अब जुम्मन इंसाफ की ऊँची गद्दी पर बैठता है, और कहानी का लेखक यहीं ‘उत्तरदायित्व के बोध’ की बात करता है कि जिम्मेदारी का एहसास हमारी तंगदिली को सुधार देता है। जुम्मन सोचता है कि मेरी आवाज इस वक्त खुदा का हुक्म है, इसलिए उसमें मेरी नीयत का कोई दखल नहीं होना चाहिए। वह फैसला देता है कि बैल बिकते समय बीमार नहीं था, इसलिए समझू को पूरी कीमत देनी होगी। पंच के रूप में जुम्मन अलगू के पक्ष में फैसला देता है।

अंत: मेल। अलगू खुशी से ‘पंच परमेश्वर की जय’ पुकारता है, और गाँव वाले जुम्मन के न्याय की प्रशंसा करते हैं। थोड़ी देर बाद जुम्मन खुद अलगू से लिपट जाता है और कहता है कि आज उसे समझ आया कि पंचायत की गद्दी पर बैठकर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। अलगू रोने लगता है, दिल साफ हो जाते हैं और दोस्ती का मुरझाया पेड़ फिर से हरा हो जाता है, अब रेत पर नहीं, सत्य और न्याय की जमीन पर।

पहली और दूसरी पंचायत में अलगू-जुम्मन की उलटी भूमिकाओं का आरेख
दोनों पंचायतों की समरूपता

पाठ-भेद की सूचना: यह सार उपलब्ध पाठ (Rekhta पर प्रेमचंद की कहानी ‘पंचायत’, जो इसी कहानी का उर्दू रूप है) और मानक सारांश से तैयार है। छोटे पात्रों के नाम और कुछ शब्द आपकी पाठ्य-पुस्तक के संस्करण में थोड़े भिन्न हो सकते हैं। उत्तर लिखते समय अपनी किताब के नाम और शब्द ही अपनाएँ।

पंच परमेश्वर: पात्र-चरित्र | Panch Parmeshwar: Characterization

प्रेमचंद पात्र गढ़ते नहीं, गाँव से उठा लाते हैं। इस कहानी के पात्र भी ऐसे ही हैं।

1. अलगू चौधरी – वह एक आम किसान है, पर उसके भीतर न्याय-बुद्धि (Judicial Conscience) है। वह पहले हिचकता है, क्योंकि दोस्ती उसकी कमजोरी है, पर खाला के सवाल के बाद पंच की गद्दी स्वीकार कर लेता है। जब वह पंच बनता है तो दोस्ती को भूल जाता है। यह उसका कमजोर पक्ष नहीं, बल्कि उसका सबसे मजबूत पक्ष है। वह दिखाता है कि व्यक्ति से बड़ा पद का धर्म होता है। बाद में जब वह खुद अन्याय के खतरे में होता है और सरपंच के रूप में जुम्मन का नाम सुनता है, तो उसकी बेचैनी हमें उसके मानवीय रूप से जोड़ती है।

2. जुम्मन शेख – कहानी का सबसे जटिल पात्र। शुरू में वह स्वार्थी और अहंकारी लगता है। खाला की संपत्ति लेकर उसकी उपेक्षा करता है और पंचायत से भी नहीं डरता। पर वह बुरा आदमी नहीं है। पहली पंचायत में हारने पर वह बदले की भावना से भर जाता है, पर जब वह खुद सरपंच बनता है और उसे न्याय करना होता है, तो उसके भीतर का जमीर (Conscience) जाग जाता है। वह बदला नहीं लेता। उसका यह परिवर्तन (Transformation) ही कहानी का सबसे बड़ा संदेश है। जुम्मन का चरित्र बताता है कि जिम्मेदारी का एहसास आदमी को सुधार सकता है, अगर उसमें पंच-परमेश्वर की भावना हो।

3. खाला जान – एक असहाय, बूढ़ी विधवा का प्रतीक। उसके माध्यम से प्रेमचंद ने उस समय के समाज में विधवा और बुजुर्गों की दशा दिखाई है। वह कमजोर है, पर पंचायत पर उसका अटूट विश्वास है। ध्यान दीजिए, कहानी की सबसे तीखी बात, कि बिगाड़ के डर से ईमान की बात क्यों न कही जाए, उसी के मुँह से आती है।

4. समझू साहु – वह साहूकार/व्यापारी वर्ग का प्रतिनिधि है जो अपने नुकसान का दोष दूसरों पर डालकर पैसा देने से मुकर जाता है। छोटा पात्र है, पर कथानक को आगे बढ़ाने के लिए जरूरी है, क्योंकि उसी की वजह से दूसरी पंचायत बैठती है।

5. अन्य पात्र – उपलब्ध पाठ में रामधन मिश्र जैसे गाँव के लोग भी हैं जो पंचायत में पक्ष-विपक्ष का माहौल बनाते हैं। जुम्मन और अलगू की पत्नियाँ भी आपसी नोंक-झोंक के जरिए ग्रामीण परिवेश को जीवंत करती हैं।

कुल मिलाकर, ये सभी पात्र यथार्थवादी (Realistic) होते हुए भी आदर्श की ओर जाते हैं।

पंच परमेश्वर: केंद्रीय संवेदना | Panch Parmeshwar: Central Theme

इस कहानी की केंद्रीय संवेदना (Central Theme) एक ही पंक्ति में है – न्याय का धर्म सबसे बड़ा धर्म है, मित्रता से भी बड़ा।

प्रेमचंद यहाँ एक बहुत बड़ा प्रश्न उठाते हैं – क्या होता है जब दोस्ती और न्याय आमने-सामने आ जाएँ? हम अक्सर अपने दोस्त, अपने रिश्तेदार का पक्ष ले लेते हैं। पर प्रेमचंद कहते हैं कि नहीं, जब आप पंच बनते हैं, तो आप व्यक्ति नहीं रहते, आप एक संस्था (Institution) बन जाते हैं।

दूसरी संवेदना है – उत्तरदायित्व का बोध (Sense of Responsibility)। यह कहानी का एक बहुत अहम, पर नोट्स में अक्सर छूट जाने वाला बिंदु है। प्रेमचंद खुद बताते हैं कि जिम्मेदारी का एहसास हमारी तंगदिली को सुधारता है। एक अखबार-नवीस, जो एकांत में बैठकर मंत्रिमंडल की बेलाग आलोचना करता है, खुद मंत्री बनते ही संयत हो जाता है; और एक लापरवाह नौजवान माता-पिता के न रहने के बाद जिम्मेदार बन जाता है। जुम्मन के साथ भी यही होता है।

तीसरी संवेदना है – भारतीय पंचायत-व्यवस्था पर विश्वास। उस समय अंग्रेजी अदालतें थीं, पर प्रेमचंद को गाँव की पंचायत पर भरोसा था। वे दिखाना चाहते थे कि गाँव के लोग आज भी यह मानते हैं कि पंच के मुँह से जो बात निकलती है, उसमें ईश्वर की वाणी होती है। यह प्रेमचंद का आदर्शवादी पक्ष है; आधुनिक पाठक चाहें तो पूछ सकते हैं कि क्या पंचायतें सचमुच इतनी निष्पक्ष होती थीं। (यह प्रश्न आलोचना में उठाया जा सकता है, पर कहानी का अपना आग्रह आदर्श की ओर है।)

चौथी और सबसे मानवीय संवेदना है – हृदय-परिवर्तन (Change of Heart)। जुम्मन बुरा नहीं है, परिस्थिति और अहंकार उसे स्वार्थी बना देते हैं। पर जब उसे खुद न्याय की गद्दी पर बैठना पड़ता है, तो उसे एहसास होता है कि अन्याय कितना दुखदायी होता है। यह हृदय-परिवर्तन ही प्रेमचंद के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद (Idealistic Realism) की पहचान है। वे दिखाते हैं कि मनुष्य बुरा नहीं, वह सुधर सकता है।

इसलिए यह कहानी सिर्फ दो दोस्तों की नहीं, पूरे भारतीय ग्रामीण न्याय-बोध की कहानी है।

पंच परमेश्वर: शीर्षक की सार्थकता | Panch Parmeshwar: Appropriateness of Title

‘पंच परमेश्वर’ – शीर्षक सुनते ही एक पवित्र भाव मन में आता है। प्रेमचंद ने यह शीर्षक बहुत सोच-समझकर रखा है।

सबसे पहले, यह शीर्षक कहानी के मूल विचार (Core Idea) को सीधे व्यक्त करता है। कहानी में दो पंचायतें बैठती हैं। पहली में अलगू सरपंच है, दूसरी में जुम्मन। दोनों बार पंच अपनी व्यक्तिगत भावना – दोस्ती या दुश्मनी – को भूलकर न्याय करते हैं। इससे सिद्ध होता है कि पंच की गद्दी पर बैठते ही मनुष्य अपने स्वार्थ से ऊपर उठकर ईश्वर-तुल्य निष्पक्षता तक पहुँचने की कोशिश करता है। वही शीर्षक को सार्थक करता है। कहानी के अंत में अलगू का ‘पंच परमेश्वर की जय’ पुकारना भी इसी शीर्षक को सीधा समर्थन देता है।

दूसरा, यह शीर्षक भारतीय संस्कृति से जुड़ा है। हमारे यहाँ पुरानी लोकोक्ति है – ‘पंच में परमेश्वर’। प्रेमचंद ने उसी लोक-विश्वास (Folk Belief) को कहानी का आधार बनाया। अगर शीर्षक कुछ और होता, जैसे ‘दो दोस्त’ या ‘न्याय’, तो वह इतना प्रभावशाली नहीं होता।

तीसरा, यह शीर्षक चरित्रों के परिवर्तन को भी स्पष्ट करता है। जुम्मन और अलगू दोनों पहले व्यक्ति हैं, फिर पंच बनते हैं और अंत में परमेश्वर के प्रतिनिधि के रूप में न्याय करते हैं। उनका यह रूपांतरण ही शीर्षक की व्याख्या है।

परीक्षा में आप लिख सकते हैं कि यह शीर्षक प्रतीकात्मक (Symbolic), सार्थक और भारतीय ग्रामीण जीवन के अनुकूल है। यह केवल नाम नहीं, बल्कि कहानी का सार (Essence) है। इसीलिए इसे हिन्दी के सार्थक कहानी-शीर्षकों में गिना जाता है।

प्रमुख कथन और उनकी व्याख्या | Key Passages with Explanation

परीक्षा में कभी-कभी कहानी के किसी अंश की संदर्भ-प्रसंग सहित व्याख्या माँगी जा सकती है। नीचे छह अंश उसी साँचे में दिए हैं: मूल पाठ, कठिन शब्दार्थ, भावार्थ, व्याख्या (संदर्भ, प्रसंग, व्याख्या, विशेष), शिल्प-सौंदर्य और Exam Point। उद्धरण कम और छोटे रखे गए हैं; पूरा पाठ अपनी किताब से पढ़िए और शब्द मिला लीजिए।

अंश 1 – ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ (उसने कहा था, खंड 1)

मूल पाठ: ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ – ‘धत्।’ … बाद में: ‘हाँ, हो गई।’ – ‘कब?’ – ‘कल, देखते नहीं, यह रेशम से कढ़ा हुआ सालू।’

शब्दअर्थ
कुड़माईसगाई (पंजाबी शब्द)
धत्झिझक या इनकार भरा उद्गार, जिसमें लज्जा भी है
सालूकढ़ा हुआ ओढ़ने का वस्त्र/दुपट्टा

भावार्थ: लड़का रोज यह सवाल पूछकर लड़की को छेड़ता है और लड़की हर बार लजाकर भाग जाती है। जिस दिन वह ‘हाँ’ कहती है, उसी दिन लड़के की दुनिया बदल जाती है।

व्याख्या: संदर्भ – गुलेरी की कहानी ‘उसने कहा था’ का पहला खंड। प्रसंग – अमृतसर के बाजार में बारह साल का लहना और आठ साल की लड़की रोज मिलते हैं; यह सवाल-जवाब उनके अनकहे लगाव की भाषा है। व्याख्या – दोनों बच्चे इस लगाव को समझते नहीं, पर ‘धत्’ का बार-बार दोहराया जाना बताता है कि यह खेल उन्हें अच्छा लगता है। जिस दिन उत्तर बदलता है, लड़के को आघात लगता है और वह रास्ते में बेवजह लोगों से उलझ पड़ता है। विशेष – यही छोटी-सी घटना आगे चलकर पूरे कथानक की नींव बनती है।

शिल्प-सौंदर्य: ‘कुड़माई’ और ‘धत्’ जैसे पंजाबी शब्द ‘सगाई’ से कहीं ज्यादा स्वाभाविक असर पैदा करते हैं; संवाद छोटे हैं और भाव बड़े।

Exam Point: भाषा की स्थानीयता और बाल-मनोविज्ञान, दोनों बिंदु लिखिए।

अंश 2 – सूबेदारनी का अनुरोध (उसने कहा था, खंड 5)

मूल पाठ: ‘…तुम्हें याद है, एक दिन टाँगे वाले का घोड़ा दही की दुकान के आगे बिगड़ गया था। तुमने उस दिन मेरे प्राण बचाए थे… ऐसे ही इन दोनों को बचाना…’ (वाक्य के अंतिम शब्द संस्करणों में अलग मिलते हैं; अपनी पुस्तक से मिला लें।)

शब्दअर्थ
टाँगाघोड़े से चलने वाली सवारी गाड़ी
बिगड़ना (घोड़े का)बेकाबू हो जाना
प्राण बचानाजान की रक्षा करना

भावार्थ: सूबेदारनी बचपन की उसी घटना की याद दिलाकर, जब लहना ने उसकी जान बचाई थी, अपने पति और बेटे की रक्षा का भार उसे सौंपती है।

व्याख्या: संदर्भ – ‘उसने कहा था’ का पाँचवाँ खंड, जो लहना की मृत्यु से पहले की स्मृति के रूप में आता है। प्रसंग – लहना सूबेदार के घर गया है; सूबेदारनी उसे पहचानती है और अकेले में अपनी विनती रखती है, क्योंकि चार बेटे खोने के बाद एक बेटा और पति ही बचे हैं। व्याख्या – यह कथन पूरी कहानी की धुरी है। सूबेदारनी लहना की पुरानी भलाई को याद दिलाकर उसके भीतर के विश्वास को जगाती है, और लहना इसे अधिकार से सौंपा गया दायित्व मानकर स्वीकार करता है। विशेष – इसी कथन से शीर्षक की सार्थकता भी जुड़ती है।

शिल्प-सौंदर्य: बचपन की घटना को वर्तमान के अनुरोध से जोड़कर लेखक अतीत और वर्तमान को एक सूत्र में बाँध देते हैं; यही पूर्वदीप्ति की सफलता है।

Exam Point: ‘विश्वास’ और ‘वचन’ जैसे शब्दों के साथ इस अंश को शीर्षक की सार्थकता से जोड़िए।

अंश 3 – लहना सिंह का अंतिम संदेश और अंतिम शब्द (उसने कहा था, खंड 4-5)

मूल पाठ: ‘…घर जाओ तो कह देना कि जो उसने कहा था, वह मैंने कर दिया।’ … अंत में: ‘वजीरा सिंह, पानी पिला… उसने कहा था।’ और अखबार की पंक्ति: ‘फ्रांस और बेल्जियम – 68वीं सूची – मैदान में घावों से मरा – नं. 77 सिख राइफल्स जमादार लहनासिंह।’

शब्दअर्थ
मत्था टेकनाआदरपूर्वक सिर झुकाकर प्रणाम करना
जमादारसेना में सूबेदार से नीचे का एक पद
सूचीहताहतों की सरकारी सूची

भावार्थ: लहना अपने पूरे बलिदान को एक सादे वाक्य में समेट देता है, और संसार को उसकी मृत्यु की खबर एक अखबारी पंक्ति के रूप में मिलती है।

व्याख्या: संदर्भ – ‘उसने कहा था’ का अंतिम भाग। प्रसंग – घायल लहना सूबेदार को विदा करता है और फिर अकेले वजीरा सिंह के पास अंतिम साँसें गिनता है। व्याख्या – लहना अपना घाव तक नहीं दिखाता और बलिदान को शब्दों में बड़ा नहीं बनाता; वह बस सूबेदारनी तक यह सूचना पहुँचाना चाहता है कि उसका कहा पूरा हो गया। अखबार की ठंडी, दर्ज सूची का वाक्य उसके व्यक्तिगत बलिदान को सरकारी रिकॉर्ड की एक पंक्ति में बदल देता है। विशेष – करुणा यहाँ मौन से पैदा होती है।

शिल्प-सौंदर्य: चरम क्षण में शब्द कम हैं और असर गहरा। अखबार की सूखी पंक्ति से करुण रस की तीव्रता और बढ़ती है।

Exam Point: ‘करुणा’ और ‘संयम’ जैसे शब्द और ‘मौन के माध्यम से भावव्यंजना’ जैसी बात लिखें।

अंश 4 – खाला का प्रश्न (पंच परमेश्वर)

मूल पाठ: ‘बेटा, क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?’

शब्दअर्थ
बिगाड़संबंध बिगड़ने या मनमुटाव का डर
ईमानसच्चाई, नैतिक निष्ठा

भावार्थ: खाला अलगू को याद दिलाती है कि दोस्ती टूटने के डर से सच बोलना छोड़ देना ईमान की हार है।

व्याख्या: संदर्भ – प्रेमचंद की कहानी ‘पंच परमेश्वर’। प्रसंग – अलगू जुम्मन से बिगाड़ न करने की बात कहकर पंचायत में बोलने से मना कर रहा है। व्याख्या – खाला का प्रश्न इतना सीधा है कि अलगू के पास जवाब नहीं बचता। यह प्रश्न मित्रता और न्याय के बीच की उस रेखा को दिखाता है जिस पर पूरी कहानी टिकी है। विशेष – कमजोर, असहाय खाला के मुँह से कहा गया यह वाक्य कहानी का नैतिक आधार बन जाता है।

शिल्प-सौंदर्य: प्रश्नात्मक शैली, छोटा वाक्य और सीधा चोट करने वाला स्वर, जो कहावत की तरह याद रह जाता है।

Exam Point: इसे ‘न्याय बनाम मित्रता’ के केंद्रीय द्वंद्व से जोड़िए।

अंश 5 – अलगू का पंच-धर्म (पंच परमेश्वर)

मूल पाठ (भावार्थ-आधारित; Rekhta पर उपलब्ध उर्दू रूप ‘पंचायत’ से): ‘…इस वक्त न तुम हमारे दोस्त हो, न हम तुम्हारे दोस्त। ये इंसाफ और ईमान का मामला है।’

शब्दअर्थ
इंसाफन्याय
ईमाननैतिक निष्ठा

भावार्थ: अलगू सरपंच की कुर्सी पर बैठते ही अपने और जुम्मन के बीच की दोस्ती को किनारे रख देता है।

व्याख्या: संदर्भ – ‘पंच परमेश्वर’ की पहली पंचायत। प्रसंग – अलगू सरपंच के रूप में जुम्मन से बात शुरू करता है। व्याख्या – वह अपनी पुरानी दोस्ती का सम्मान करता है, पर साफ बता देता है कि इस समय वह पंच है, मित्र नहीं। विशेष – यही वाक्य अलगू के भीतर ‘व्यक्ति’ से ‘संस्था’ बनने की प्रक्रिया को पकड़ता है।

शिल्प-सौंदर्य: संतुलित, नपे-तुले वाक्य जो न्यायाधीश की भाषा-सी गंभीरता रखते हैं।

Exam Point: ‘व्यक्ति से संस्था’ और ‘पद का धर्म’ जैसे पद लिखिए।

अंश 6 – जुम्मन का बोध (पंच परमेश्वर)

मूल पाठ (भावार्थ-आधारित; वही स्रोत): ‘…पंचायत की मसनद पर बैठकर न कोई किसी का दोस्त होता है, न दुश्मन। इंसाफ के सिवा उसे कुछ नहीं सूझता।’

शब्दअर्थ
मसनदआसन, गद्दी
इंसाफन्याय

भावार्थ: जुम्मन मानता है कि पंच की गद्दी पर बैठा व्यक्ति केवल न्याय देखता है।

व्याख्या: संदर्भ – ‘पंच परमेश्वर’ का अंतिम भाग। प्रसंग – दूसरी पंचायत में अलगू के पक्ष में फैसला देने के बाद जुम्मन अलगू से मिलने आता है। व्याख्या – वह स्वीकार करता है कि वह दिल से अलगू का दुश्मन था, पर गद्दी पर बैठकर उसे समझ आया कि पंच न दोस्त होता है, न दुश्मन। विशेष – यही कथन उसके हृदय-परिवर्तन की घोषणा है और कहानी के आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का निचोड़।

शिल्प-सौंदर्य: पहली पंचायत में अलगू के कथन की प्रतिध्वनि दूसरी पंचायत में जुम्मन के कथन में सुनाई देती है; इससे कहानी की संरचना में सुंदर समरूपता बनती है।

Exam Point: दोनों पंचायतों की समरूपता (symmetry) और हृदय-परिवर्तन को साथ-साथ लिखें।

आलोचकों की दृष्टि: ‘उसने कहा था’ पर बहस | Critical Debates

अच्छे उत्तर में सिर्फ कहानी की प्रशंसा नहीं, उस पर चली बहस का भी जिक्र होना चाहिए। ‘उसने कहा था’ के संदर्भ में ये बिंदु जरूर जोड़िए।

  • कथा-शिल्प की प्रशंसा: डॉ. नगेन्द्र ने गुलेरी की कहानियों पर लिखे अपने लेख में माना है कि कहानी का आरंभ चंचल-मधुर है, पर अंत तक पूरी कहानी रस में डूब जाती है; उनके अनुसार इसमें हास्य, ओज और करुणा का मिश्रण है।
  • नई कहानी की झलक: कुछ विद्वान इस कहानी की संवेदना और शिल्प में नई कहानी का ढाँचा देखते हैं और इसी के साथ हिन्दी कहानी के आधुनिक आरंभ की बात करते हैं।
  • ‘कथा-नाट्य’: पाँच खंडों में बँटी रचना सामान्यतः नाटक में होती है, इसलिए कुछ विद्वान इसे कथा-नाट्य भी कहते हैं।
  • स्त्री-दृष्टि से प्रश्न: रोहिणी अग्रवाल (‘साहित्य का स्त्री स्वर’) कहानी की कुछ चुप्पियों पर सवाल उठाती हैं: आठ साल की लड़की ने पच्चीस साल बाद, लगभग 37 साल के लहना सिंह को कैसे पहचाना, जबकि दोनों एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे? पति को अलग से बात करने पर शक क्यों नहीं हुआ? उनकी राय में यह रिश्ता प्रेम से ज्यादा ‘भावनात्मक ब्लैकमेलिंग’ जैसा दिखता है, जिसमें सूबेदारनी बलिदान माँगती है और लहना उसकी स्मृतियों में बँधे रहने का आश्वासन।

परीक्षा में इन बहसों को ‘कुछ आलोचकों के अनुसार…’ के रूप में लिखिए, और अंत में अपनी संतुलित राय दीजिए कि ये प्रश्न कहानी के भावात्मक असर को घटाते नहीं, बल्कि उसे आज भी बहस के योग्य बनाए रखते हैं।

Quick Summary : Usne Kaha Tha uses a non-linear, five-part flashback plot where Lahna Singh’s sacrifice is driven by a single request, and its title is justified because that request is the soul of the story. Its characters show restrained love and duty. Panch Parmeshwar has a linear plot of two friends, Algu and Jumman, who learn to rise above friendship and enmity when acting as Panch, and its title is justified as it embodies the belief that God speaks through the Panchayat. Its theme also includes the sense of responsibility and change of heart.

5. कहानी-कला और शिल्प | Craft and Technique

कथानक-संरचना और देशकाल-वातावरण | Plot Structure and Setting

कथानक-संरचना (Plot Structure) से पता चलता है कि लेखक ने कहानी को कैसे जोड़ा है, और देशकाल-वातावरण (Setting) से पता चलता है कि कहानी कहाँ और कब घट रही है। दोनों कहानियों में यहाँ बहुत बड़ा अंतर है।

‘उसने कहा था’ की संरचना – यह कहानी गैर-रैखिक (Non-linear) और फ्लैशबैक (Flashback) पद्धति पर बनी है और पाँच खंडों में बँटी है। ध्यान दीजिए, अनेक आलोचक इसे हिन्दी कहानी के आरंभिक सफल पूर्वदीप्ति-प्रयोगों में गिनते हैं। कहानी पहले अमृतसर के बाजार में ले जाती है, फिर अचानक लगभग 25 साल बाद फ्रांस के मोर्चे पर। अंत में मृत्यु के क्षण में स्मृति के टुकड़े जुड़ते हैं। यह संरचना पाठक को उलझाती नहीं, बल्कि उत्सुकता बनाए रखती है। इसका चरमोत्कर्ष (Climax) अंत में लहना सिंह की मृत्यु पर आता है, जहाँ अतीत और वर्तमान एक हो जाते हैं।

इसका देशकाल दोहरा है – एक तरफ पंजाब का अमृतसर शहर, दूसरी तरफ प्रथम विश्व युद्ध का यूरोप। खाई (Trench), ठंड, गोलाबारी का वर्णन इतना सजीव है कि आपको लगता है आप खुद मोर्चे पर खड़े हैं।

‘पंच परमेश्वर’ की संरचना – यह बिल्कुल रैखिक (Linear) और सरल है। कहानी सीधे क्रम में चलती है – दोस्ती, फिर खाला का मामला, पहली पंचायत, फिर दुश्मनी, दूसरी पंचायत और अंत में मेल। कोई उलझाव नहीं। यह घटना-प्रधान (Event-oriented) संरचना है, जिसकी खास बात दो पंचायतों की समरूपता (Symmetry) है: पहली में अलगू पंच है और जुम्मन अभियुक्त, दूसरी में स्थितियाँ उलट जाती हैं।

इसका देशकाल एक ही है – उत्तर भारत का एक आम गाँव। खेत, चौपाल, पेड़ के नीचे बैठी पंचायत, बैल और यक्का-गाड़ी – सब हमारा देखा हुआ वातावरण है। एक में युद्ध का असाधारण वातावरण है, दूसरे में गाँव का साधारण वातावरण, पर दोनों ही अपने-अपने में पूरी तरह प्रामाणिक हैं।

संवाद और भाषा-शैली | Dialogue and Language-Style

कहानी की जान उसके संवाद (Dialogue) और भाषा होते हैं। यहीं से पता चलता है कि लेखक का शिल्प कितना पक्का है।

‘उसने कहा था’ की भाषा-शैली – गुलेरी जी विद्वान थे, पर उन्होंने इस कहानी में विद्वता नहीं, सजीवता दिखाई है।

  • भाषा मिश्रित और यथार्थवादी है। हिन्दी के बीच में पंजाबी शब्द – ‘कुड़माई’, ‘धत्’, तांगेवालों की आशीष भरी चेतावनियाँ (‘बचो खालसा जी’, ‘हट जा जीण जोगिए…’)। फौजी शब्दावली – ‘जमादार’, ‘सूबेदार’, ‘खाई’, ‘मोर्चा’। उर्दू और अंग्रेजी शब्द भी यथास्थान आते हैं। यह मिश्रण कहानी को बनावटी नहीं, सच्चा बनाता है।
  • संवाद छोटे, चुटीले और चरित्र के अनुसार हैं। ‘कुड़माई’ शब्द ‘सगाई’ से कहीं ज्यादा असर रखता है और ‘धत्’ एक शब्द में पूरा संकोच कह देता है। ध्यान दीजिए, सूबेदारनी बहुत कम बोलती है, पर उसका एक अनुरोध पूरी कहानी पर भारी है।
  • शैली में पूर्वदीप्ति (Flashback) और वर्णनात्मकता (Descriptive) दोनों हैं। युद्ध का वर्णन तटस्थ और संयमित है।

‘पंच परमेश्वर’ की भाषा-शैली – प्रेमचंद की भाषा एकदम अलग है। वह सहज, ग्रामीण और मुहावरेदार (Idiomatic) है।

  • भाषा – कठिन संस्कृत शब्द नहीं। ‘पंचायत’, ‘सरपंच’, ‘फैसला’, ‘जायदाद’ जैसे आम शब्द। वाक्य छोटे-छोटे। गाँव का आदमी जैसे बोलता है, वैसे ही लिखा है।
  • संवाद – संवाद ही चरित्र को खोलते हैं। खाला का सवाल – ‘क्या बिगाड़ के डर से ईमान की बात न कहोगे?’ – और अलगू-जुम्मन के कथन नीति-वाक्य (Maxim) जैसे हैं, जो सीधे पाठक के मन में बैठ जाते हैं।
  • शैली वर्णनात्मक और उपदेशात्मक (Didactic) के बीच की है। प्रेमचंद कहानी कहते-कहते एक सीख भी दे देते हैं (जैसे उत्तरदायित्व-बोध वाली टिप्पणी), पर वह सीख ऊपर से थोपी हुई नहीं लगती।

परीक्षा में यह अंतर जरूर लिखिए – गुलेरी की भाषा कलात्मक और मिश्रित है, प्रेमचंद की भाषा जनवादी और सरल है।

दोनों कहानियों का तुलनात्मक अध्ययन | Comparative Study of the Two Stories

अब देखिए, दोनों कहानियाँ द्विवेदी युग के उत्तरार्ध में ‘सरस्वती’ के दौर में सामने आईं, पर दोनों का रास्ता बिल्कुल अलग है। तुलना करने से यह अंतर और साफ हो जाता है।

तुलना का आधार‘उसने कहा था’ (गुलेरी)‘पंच परमेश्वर’ (प्रेमचंद)
कथानक संरचना (Structure)गैर-रैखिक, फ्लैशबैक, पाँच खंडों वालीरैखिक, सरल, दो पंचायतों पर आधारित
देशकाल (Setting)अमृतसर और फ्रांस का युद्ध-मोर्चा, असाधारणएक भारतीय गाँव, चौपाल, साधारण और जाना-पहचाना
केंद्रीय भाव (Theme)प्रेम से उपजा विश्वास, कर्तव्य और बलिदानन्याय, पंच-धर्म, उत्तरदायित्व और हृदय-परिवर्तन
चरित्र (Character)भीतर से जीने वाला, मनोवैज्ञानिक पात्र – लहना सिंहबाहर से दिखने वाले, सामाजिक पात्र – जुम्मन, अलगू
भाषा (Language)मिश्रित – हिन्दी+पंजाबी+उर्दू+फौजी शब्दावलीसहज ग्रामीण हिन्दी, मुहावरेदार, सरल
प्रवृत्ति (Trend)आदर्श और यथार्थ का संगम, कलात्मकता प्रधान; नई कहानी की झलकआदर्शोन्मुख यथार्थवाद का बहुचर्चित उदाहरण
अंतदुखांत, बलिदानसुखांत, मेल

तो निष्कर्ष क्या निकला? अगर एक वाक्य में कहना हो तो – गुलेरी ने हिन्दी कहानी को शिल्प (Craft) सिखाया और प्रेमचंद ने उसे विचार (Thought) और जमीन दी। गुलेरी की कहानी व्यक्ति के मन की गहराई में जाती है, प्रेमचंद की कहानी समाज की सच्चाई को सामने लाती है। (यह एक सुविधाजनक सूत्र है; दोनों के यहाँ दोनों गुण कुछ मात्रा में मिलते हैं, यह भी लिखिए।)

परीक्षा में अगर तुलनात्मक प्रश्न आए तो यही दो पंक्तियाँ आपकी भूमिका बन सकती हैं – एक कहानी कला की दृष्टि से मोड़ लाने वाली है, दूसरी विचार की दृष्टि से आधार-स्तंभ है। दोनों के बिना हिन्दी कहानी का इतिहास अधूरा है।

Quick Summary : Usne Kaha Tha has a non-linear flashback structure set between Amritsar and WWI France with mixed Punjabi-Urdu-Hindi language, while Panch Parmeshwar has a simple linear structure with a symmetrical double-panchayat plot set in a village, in easy rural Hindi. Guleri gave the Hindi story artistic craft and psychological depth; Premchand gave it social idealism and folk justice.

6. हिन्दी कहानी में योगदान | Contribution to Hindi Kahani

गुलेरी का योगदान | Guleri’s Contribution

गुलेरी जी ने कुल तीन ही कहानियाँ लिखीं, पर उनका योगदान मात्रा से नहीं, गुण से नापा जाता है। ध्यान दीजिए, हिन्दी कहानी के इतिहास में कुछ लेखक ऐसे होते हैं जो रास्ता बनाते हैं, गुलेरी जी उन्हीं में से हैं।

पहला और सबसे बड़ा योगदान है – हिन्दी को एक कलात्मक रूप से परिपक्व कहानी देना। ‘उसने कहा था’ से पहले की कहानियों में घटना सुनाने और उपदेश देने की प्रवृत्ति ज्यादा थी। गुलेरी जी ने कहानी को शिल्प (Craft) और तकनीक (Technique) से जोड़ा: पूर्वदीप्ति (फ्लैशबैक) पद्धति और स्मृति-संयोजन का प्रयोग, पाँच खंडों की नाटकीय बनावट। यह आज सामान्य लगता है, पर 1915 में यह बहुत नया था।

दूसरा योगदान है – मनोवैज्ञानिक चित्रण (Psychological Portrayal)। लहना सिंह ऐसा पात्र है जो भीतर से जीता है। वह हँसता है, मजाक करता है, पर मन में बचपन का एक अनकहा लगाव छिपाए रखता है। यह अंतर्द्वंद्व (Inner Conflict) हिन्दी कहानी में इतने गहरे रूप में कम दिखता था।

तीसरा – विषय का विस्तार। उस समय तक अधिकांश कहानियाँ घर-परिवार तक सीमित थीं। गुलेरी जी युद्ध, सिख सिपाहियों का जीवन और अंतरराष्ट्रीय पृष्ठभूमि को कहानी में ले आए। उन्होंने बताया कि हिन्दी कहानी केवल गाँव की चौपाल की ही नहीं, फ्रांस के मोर्चे की भी हो सकती है।

और अंतिम बात, उन्होंने भाषा को नया रूप दिया। हिन्दी के बीच पंजाबी, उर्दू और फौजी शब्दों को मिलाकर उन्होंने भाषा को जीवंत बनाया। इसीलिए कहा जाता है कि गुलेरी जी ने हिन्दी कहानी को शैशव से किशोरावस्था की परिपक्वता की ओर बढ़ाया।

प्रेमचंद का योगदान | Premchand’s Contribution

अगर गुलेरी जी ने कहानी को शिल्प सिखाया, तो प्रेमचंद ने उसे जनता से जोड़ा। प्रेमचंद के बिना हिन्दी कहानी की कल्पना ही नहीं हो सकती। इसीलिए उन्हें ‘कहानी का सम्राट’ और ‘उपन्यास सम्राट’ दोनों कहा जाता है।

उनका पहला बड़ा योगदान है – कहानी को सामाजिक उद्देश्य देना। उन्होंने किसान, मजदूर, विधवा, दलित, कर्ज में डूबा हुआ ग्रामीण – इन सबको कहानी का नायक बनाया। ‘पंच परमेश्वर’ से लेकर ‘कफन’ तक यही यात्रा है।

दूसरा योगदान – आदर्शोन्मुख यथार्थवाद (Idealistic Realism) से यथार्थवाद (Realism) तक की यात्रा। शुरुआती कहानियों में वे आदर्श की जीत दिखाते हैं, जैसे ‘पंच परमेश्वर’ में न्याय की जीत। बाद की कहानियों में वे कठोर यथार्थ दिखाते हैं, जैसे ‘पूस की रात’ और ‘कफन’ में। यह विकास हिन्दी कहानी को प्रौढ़ बनाता है।

तीसरा – कहानी को जन-भाषा देना। प्रेमचंद ने भारी-भरकम भाषा छोड़कर सरल, मुहावरेदार, बोलचाल की हिन्दी को अपनाया। इसीलिए उनकी कहानियाँ गाँव-गाँव तक पहुँचीं।

चौथा – परिमाण और प्रभाव। लगभग 250-300 कहानियाँ और एक दर्जन से अधिक उपन्यास। ‘मानसरोवर’ के आठ भागों में उनकी कहानियाँ संकलित हैं। उन्होंने ‘हंस’ और ‘जागरण’ के माध्यम से हिन्दी में नई पीढ़ी के लिए जमीन तैयार की, और बाद के कथाकार प्रायः उनकी परंपरा से खुद को जोड़ते हैं।

संक्षेप में, गुलेरी ने हिन्दी कहानी को कला बनाई, प्रेमचंद ने उसे जनता की आवाज बनाया। परीक्षा में यह पंक्ति आप सीधे लिख सकते हैं।

Quick Summary : Guleri contributed only three stories but gave Hindi a mature artistic story with flashback technique, psychological depth and a war background. Premchand contributed roughly 250-300 stories, made the story a tool for social realism, gave it simple folk language and moved it from idealism to hard realism.

7. निष्कर्ष | Conclusion

इस यूनिट की दोनों कहानियाँ एक-दूसरे की पूरक हैं। ‘उसने कहा था’ में एक सिपाही अपने कहे बिना कहे प्रेम को, एक वचन की रक्षा के रूप में, प्राणों की कीमत पर निभाता है। ‘पंच परमेश्वर’ में दो दोस्त सीखते हैं कि दोस्ती से बड़ा धर्म न्याय है, और जिम्मेदारी का एहसास इंसान को बेहतर बना सकता है। एक कहानी का अंत करुण है, दूसरी का आश्वस्त करने वाला; एक का जोर शिल्प पर है, दूसरी का समाज पर। परीक्षा में दोनों को अलग-अलग भी पढ़िए और तुलना की दृष्टि से भी, क्योंकि DU में अक्सर कथानक, पात्र, संवेदना और शीर्षक पर ही सवाल बनते हैं।

दोनों कहानियों के प्रमुख बिंदुओं का सारांश-इन्फोग्राफिक
एक नज़र में Unit 1

त्वरित सारांश | Quick Summary

This unit covers two foundational stories of Hindi Kahani – Usne Kaha Tha (1915) by Chandradhar Sharma Guleri and Panch Parmeshwar (June 1916) by Premchand, both associated with the journal Saraswati.

Background: Modern Hindi short story emerged around 1900-1915 from the Katha tradition and Western influence. The “first story” is debated: Indumati (1900), Ek Tokri Bhar Mitti (1901), Gyarah Varsh Ka Samay (1903), Dulaiwali (1907).

Authors: Guleri (1883-1922), a scholar of Sanskrit, Pali, Prakrit and linguistics who wrote only three stories. Premchand (1880-1936), originally Dhanpat Rai / Nawab Rai, resigned from government service in 1921 and wrote roughly 250-300 stories and a dozen-plus novels, including Godan (1936).

Usne Kaha Tha: A five-part, non-linear story with flashback. Set between Amritsar and WWI France, it shows Lahna Singh, a Sikh Jamadar, who keeps a childhood bond with a girl (now Subedarni) and dies fulfilling her request to protect her husband and son. Theme: love as trust, duty and sacrifice.

Panch Parmeshwar: A linear story of Jumman Sheikh and Algu Chaudhary. Algu as Sarpanch rules against his friend Jumman in his aunt’s case; later Jumman as Sarpanch rules in Algu’s favour. Theme: justice above friendship and enmity, sense of responsibility, change of heart; the best-known example of idealistic realism.

Craft comparison: Guleri gave Hindi story craft, psychological depth and mixed language; Premchand gave it social purpose, folk language and village realism.

8. University of Delhi Previous Year Questions

DU Previous Year Questions

Frequently asked questions from DU exam papers on this topic. Tap a question to view a quick-answer guide.

1 ‘उसने कहा था’ कहानी की मूल संवेदना पर प्रकाश डालिए। +
गुलेरी जी की इस कहानी की मूल संवेदना प्रेम, विश्वास और कर्तव्य-बलिदान है। किशोरावस्था का निश्छल आकर्षण 12 साल बाद पवित्र स्नेह में बदलता है और प्रथम विश्व युद्ध के मोर्चे पर लहना सिंह अपने प्राण देकर वचन निभाता है। दो युद्धों का चित्रण और अंतिम वाक्य ‘तेरी कुड़माई हो गई?’ ही संवेदना का केंद्र है। Long Answer
2 कहानी-तत्त्वों के आधार पर ‘उसने कहा था’ की तात्त्विक समीक्षा कीजिए। +
6 तत्वों पर उत्तर लिखें: 1. कथानक – तीन खंडों में विभाजित, फ्लैशबैक शैली, 2. पात्र – लहना सिंह, सूबेदारनी, बोधा, 3. संवाद – संक्षिप्त, स्वाभाविक, पंजाबी रंग, 4. देशकाल – अमृतसर और युद्ध-मोर्चा, 5. भाषा-शिल्प – पूर्वदीप्ति और चरमोत्कर्ष, 6. उद्देश्य – प्रेम का कर्तव्य में पर्यवसान। हर तत्व पर कहानी से उदाहरण अनिवार्य। Long Answer
3 ‘पंच परमेश्वर’ की केंद्रीय संवेदना स्पष्ट कीजिए। +
प्रेमचंद की इस कहानी की केंद्रीय संवेदना न्याय-बोध और उत्तरदायित्व का हृदय-परिवर्तन है। जुम्मन और अलगू की मित्रता, खाला के बेदखल होने पर पंचायत, और पंच के आसन पर बैठते ही व्यक्तिगत राग-द्वेष से ऊपर उठना – यही ‘पंच में परमेश्वर’ की भावना है। यह आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का श्रेष्ठ उदाहरण है। Long Answer
4 ‘उसने कहा था’ और ‘पंच परमेश्वर’ का तुलनात्मक अध्ययन कीजिए। +
तुलना तालिका में करें: संरचना – गुलेरी में पूर्वदीप्ति, प्रेमचंद में रैखिक; देशकाल – युद्ध-मोर्चा vs ग्रामीण पंचायत; संवेदना – व्यक्तिगत प्रेम-बलिदान vs सामाजिक न्याय; भाषा – कसी हुई चुस्त भाषा vs सरल पंचायती हिंदी। निष्कर्ष – गुलेरी शिल्प में श्रेष्ठ, प्रेमचंद विचार और सामाजिक उद्देश्य में। Long Answer
5 हिन्दी कहानी के उद्भव और विकास पर प्रकाश डालिए। +
चार चरणों में लिखें: 1. परंपरा – कथा-साहित्य, 2. विवाद – रानी केतकी की कहानी (1803), इंदुमती (1900), दुलाईवाली (1907), उसने कहा था (1915), 3. विकास – प्रेमचंद-पूर्व (गोस्वामी, सप्रे), प्रेमचंद युग (स्वर्ण युग), प्रेमचंदोत्तर, 4. नई कहानी (1950 के बाद)। प्रत्येक चरण की प्रवृत्तियाँ और प्रमुख कहानीकार। Long Answer
6 हिन्दी कहानी में गुलेरी और प्रेमचंद के योगदान का मूल्यांकन कीजिए। +
गुलेरी का योगदान – एक ही कहानी ‘उसने कहा था’ से शिल्प, मनोवैज्ञानिकता और पूर्वदीप्ति की नई तकनीक दी। प्रेमचंद का योगदान – विषय-विस्तार (किसान, दलित, नारी), जनभाषा, यथार्थवाद से आदर्शोन्मुख यथार्थवाद तक की यात्रा। दोनों ने मिलकर हिंदी कहानी को कला और सामाजिक उद्देश्य का संगम बनाया। Long Answer

9. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न | FAQs

‘उसने कहा था’ को हिन्दी की पहली कहानी क्यों नहीं माना जाता, फिर भी इसे इतना महत्त्व क्यों मिलता है?

क्योंकि ‘पहली’ का दावा 1900-1903 की कहानियों (इन्दुमती, एक टोकरी भर मिट्टी आदि) के पास अधिक माना जाता है। ‘उसने कहा था’ को महत्त्व इसके शिल्प, पूर्वदीप्ति-प्रयोग और मनोवैज्ञानिक चित्रण की परिपक्वता के कारण मिलता है।

लहना सिंह की मृत्यु कहाँ और कैसे होती है?

वह फ्रांस के मोर्चे की खाई में, वजीरा सिंह के पास, पसली के घाव से मरता है। उसकी मृत्यु की खबर बाद में अखबार की सूची से मिलती है। अस्पताल में मृत्यु वाली बात गलत है।

क्या बोधा सिंह युद्ध में घायल होता है?

नहीं, कहानी के इस हिस्से में बोधा सिंह बीमार है और लहना उसकी देखभाल करता है।

आठ साल की लड़की ने 25 साल बाद लहना को कैसे पहचाना, यह क्या कमजोरी है?

रोहिणी अग्रवाल जैसी आलोचक यही प्रश्न उठाती हैं। परीक्षा में इसे आलोचकों के प्रश्न की तरह लिखिए और जोड़िए कि कथा का भावात्मक सत्य इस तर्क से अधिक प्रभावी माना जाता है।

‘पंच परमेश्वर’ में जुम्मन अलगू से बदला क्यों नहीं लेता?

क्योंकि सरपंच की गद्दी पर बैठकर उसे उत्तरदायित्व का बोध होता है। कहानी के अनुसार जिम्मेदारी का एहसास तंगदिली को सुधार देता है।

‘पंच परमेश्वर’ में कुल कितनी पंचायतें होती हैं और उनमें क्या अंतर है?

दो। पहली खाला और जुम्मन के बीच, जिसमें अलगू सरपंच है और फैसला जुम्मन के खिलाफ जाता है; दूसरी अलगू और समझू साहु के बीच, जिसमें जुम्मन सरपंच है और फैसला अलगू के पक्ष में जाता है।

‘पंच परमेश्वर’ आदर्शवादी कहानी है या यथार्थवादी?

इसे आम तौर पर आदर्शोन्मुख यथार्थवाद का उदाहरण कहा जाता है: यथार्थ (दोस्ती में दरार, स्वार्थ, बदले की भावना) से शुरू होकर आदर्श (न्याय और हृदय-परिवर्तन) पर समाप्त होती है।

तुलनात्मक प्रश्न का उत्तर किस ढाँचे में लिखें?

भूमिका की दो पंक्तियाँ (गुलेरी = शिल्प, प्रेमचंद = विचार), फिर संरचना, देशकाल, संवेदना, चरित्र, भाषा के बिंदु क्रम से, और अंत में संतुलित निष्कर्ष।

10. संदर्भ ग्रंथ | References

इस इकाई के लिए उपयोगी संदर्भ | Suggested References for this Unit

परीक्षा की तैयारी के लिए केवल कहानी पढ़ना काफी नहीं है, उसके बारे में अच्छी आलोचना (Criticism) और इतिहास भी पढ़ना चाहिए। ध्यान दीजिए, आपको सब कुछ खरीदने की जरूरत नहीं है, लाइब्रेरी में देखकर नोट्स बना लीजिए।

1. मूल पाठ (Original Texts) के लिए –

  • ‘पंच परमेश्वर’ – प्रेमचंद: ‘मानसरोवर’ के खंडों में संकलित है। किस खंड में है, यह अपने कॉलेज की निर्धारित किताब से देख लें।
  • ‘उसने कहा था’ – चन्द्रधर शर्मा गुलेरी: ‘सरस्वती’ (1915) में छपी थी और कई संकलनों में मिलती है, जैसे जैनेन्द्र कुमार द्वारा संपादित ‘तेईस हिंदी कहानियाँ’। गुलेरी की रचनाओं का संकलन ‘गुलेरी रचनावली’ नाम से भी मिलता है।

2. DU सिलेबस में सुझाई गई पुस्तकें – (DU हिन्दी विभाग के DSC-3 पाठ्यक्रम से)

  • कहानी : नई कहानी – नामवर सिंह
  • नई कहानी की भूमिका – कमलेश्वर
  • एक दुनिया समानांतर – राजेंद्र यादव
  • हिन्दी कहानी : अंतरंग पहचान – रामदरश मिश्र
  • हिन्दी कहानी का इतिहास – गोपाल राय
  • नई कहानी : संदर्भ और प्रकृति – देवीशंकर अवस्थी
  • हिन्दी कहानी का विकास – मधुरेश
  • हिन्दी कहानी : प्रक्रिया और पाठ – सुरेंद्र चौधरी
  • साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित मोनोग्राफ (गुलेरी, प्रेमचंद आदि); ‘कहानी का लोकतंत्र’ – पल्लव; पत्रिकाएँ (पहल, हंस, नया ज्ञानोदय, समकालीन भारतीय साहित्य) और ई-स्रोत हिन्दी समय व गद्य कोश।

3. अन्य उपयोगी पुस्तकें –

  • हिन्दी साहित्य का इतिहास – आचार्य रामचंद्र शुक्ल (कहानी के आरंभिक विकास पर शुक्ल जी का मत समझने के लिए)
  • प्रेमचंद और उनका युग – रामविलास शर्मा (प्रेमचंद के यथार्थवाद को समझने के लिए)
  • साहित्य का स्त्री स्वर – रोहिणी अग्रवाल (‘उसने कहा था’ पर स्त्री-दृष्टि से टिप्पणी के लिए)
  • विचार और अनुभूति – डॉ. नगेन्द्र (इसमें गुलेरी की कहानियों पर लेख है)

परीक्षा में उत्तर लिखते समय एक-दो आलोचकों के नाम और किताबों के नाम लिख देंगे तो आपका उत्तर और प्रामाणिक लगेगा।

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About the Author

Sawan Chauhan is the Political Science and History content lead at Delhi Pathshala. He completed his BA and MA in Hindi (Honours) from the University of Delhi and prepares study notes aligned with the DU BA (Hons.) syllabus.

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