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रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल) नोट्स: युगीन पृष्ठभूमि, काव्य-प्रवृत्तियाँ और साहित्यिक महत्व | Ritikal Notes for DU BA Hindi Hons

Contents

पाठ्यक्रम: BA (Hons.) Hindi, Semester 1 · DSC-2 “हिन्दी साहित्य का इतिहास (आदिकाल एवं मध्यकाल)” · Unit 4: रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल) · University of Delhi

रीतिकाल हिंदी साहित्य के इतिहास का वह उत्तरमध्यकाल है, जिसे आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने विक्रम संवत 1700 से 1900 तक माना है, यानी लगभग 1643 से 1843 ईस्वी। इसका नाम “रीति” यानी काव्य-रीति (काव्यशास्त्र के नियम और लक्षण-ग्रंथों की परंपरा) से पड़ा। यह दरबारों का युग था, इसलिए कविता भक्ति से हटकर शृंगार और अलंकरण की ओर बढ़ी। फिर भी यह काल केवल शृंगार का नहीं है। इसमें रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त, वीरकाव्य, भक्तिकाव्य और नीतिकाव्य, ये छह धाराएँ साथ-साथ चलती दिखती हैं। इस लेख में आप इन सबको एक-एक करके, परीक्षा की दृष्टि से पढ़ेंगे।

इस यूनिट में क्या पढ़ें | What You Will Learn

  • काल-सीमा और नामकरण: शुक्ल का “रीतिकाल”, मिश्रबंधुओं का “अलंकृत काल”, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र का “शृंगार काल”
  • युगीन पृष्ठभूमि: राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक परिवेश और साहित्य, संगीत, चित्रकला की स्थिति
  • काव्य-प्रवृत्तियाँ: रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त, वीरकाव्य, भक्तिकाव्य, नीतिकाव्य, साथ में तुलना-तालिका
  • साहित्यिक महत्व: हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल का स्थान, उपलब्धियाँ और सीमाएँ
  • परीक्षा-तैयारी: DU-pattern प्रश्न, उत्तर-लेखन के संकेत और FAQs

युगीन पृष्ठभूमि | Yugin Prishthbhumi

रीतिकाल: समय-सीमा और नामकरण | Time-Span and Naming of Ritikal

सबसे पहले यह तय कर लीजिए कि “रीतिकाल” कहने का आधार क्या है, क्योंकि DU में यह प्रश्न बार-बार किसी न किसी रूप में घूमकर आता है।

शुक्ल के चार काल-विभाजन में रीतिकाल की संवत और ईस्वी अवधि दर्शाती टाइमलाइन
शुक्ल के अनुसार रीतिकाल: संवत 1700-1900

समय-सीमा: आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य का इतिहास में रीतिकाल (उत्तरमध्यकाल) को संवत 1700 से 1900 माना है। विक्रम संवत में से लगभग 57 वर्ष घटाने पर यह अवधि 1643 से 1843 ईस्वी के आसपास बैठती है। ध्यान रखिए, 1700-1900 संवत है, ईस्वी नहीं, और यही भूल परीक्षा में सबसे ज्यादा होती है। शुक्ल का चार-भाग वाला विभाजन इस प्रकार है: वीरगाथाकाल (संवत 1050-1375), भक्तिकाल (1375-1700), रीतिकाल (1700-1900) और गद्यकाल/आधुनिक काल (1900-1984)। डॉ. रामकुमार वर्मा ने भी अपने इतिहास में रीतिकाल के लिए यही नाम और यही अवधि रखी है।

नामकरण के मत:

विद्वानदिया गया नामआधार
आचार्य रामचंद्र शुक्लरीतिकालइस काल की मुख्य प्रवृत्ति रीति-निरूपण, यानी लक्षण-ग्रंथों की रचना
मिश्रबंधुअलंकृत कालकविता में अलंकारों और बाहरी सजावट की प्रधानता
विश्वनाथ प्रसाद मिश्रशृंगार कालरीतिबद्ध हों या रीतिमुक्त, लगभग सभी कवियों की मूल प्रेरणा शृंगार रस
शुक्ल, मिश्रबंधु और विश्वनाथ प्रसाद मिश्र के दिए नामों की तुलना-तालिका
रीतिकाल, अलंकृत काल, शृंगार काल

इनके अलावा कुछ आलोचकों ने “कला-काल” जैसा नाम भी सुझाया है, पर उसके प्रस्तावक के बारे में मुझे विश्वसनीय स्रोत में स्पष्ट पुष्टि नहीं मिली, इसलिए परीक्षा-उत्तर में उसका नाम किसी के साथ जोड़कर न लिखें।

बहस कहाँ है? “रीतिकाल” नाम पर आपत्ति यह है कि इस काल के सभी कवि रीति-ग्रंथकार नहीं थे। घनानंद, बोधा, आलम जैसे कवि रीति से बँधे ही नहीं थे। दूसरी ओर, “शृंगार काल” नाम इसलिए जँचता है कि वीर, भक्ति और नीति की रचनाओं में भी शृंगार का रंग कहीं न कहीं झाँक जाता है। एक रोचक बात और: शुक्ल ने स्वयं रीति-ग्रंथकारों के उपविभाजन का कोई ठोस आधार न मिलने की बात लिखी थी, और बाद के विद्वानों ने उसी संकेत को आगे बढ़ाया। यानी आज जो तीन-फाँक वाला वर्गीकरण (रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त) हम पढ़ते हैं, वह शुक्ल के बाद का विकास है।

एक और बारीकी: केशवदास (1555-1617 के आसपास) कालक्रम में रीतिकाल की संवत-सीमा से पहले के हैं, फिर भी रीतिबद्ध परंपरा की भूमिका बाँधने वाले आचार्य कवि के रूप में उन्हें रीतिकाल में पढ़ा जाता है। शुक्ल ने रीति-ग्रंथों की अविच्छिन्न परंपरा का प्रवर्तक चिंतामणि को माना है।

राजनीतिक परिवेश | Political Context

रीतिकाल का राजनीतिक माहौल भक्तिकाल के उत्तरार्ध से बिल्कुल उलटा था। भक्तिकाल के उत्तरार्ध में मुगल सत्ता अपने शिखर पर थी, पर रीतिकाल में वही सत्ता टूटने-बिखरने लगी थी। यही वह समय है जब दिल्ली का तख्त डगमगा रहा था।

  • मुगल साम्राज्य का पतन: औरंगजेब की मृत्यु (1707) के बाद साम्राज्य तेजी से कमजोर हुआ। उसके उत्तराधिकारी केंद्र को सँभाल नहीं पाए और केंद्र में कोई मजबूत सत्ता नहीं बची। (आम तौर पर इन्हें “कमजोर उत्तरवर्ती मुगल” कहा जाता है; “निकम्मे बादशाह” जैसी भाषा इतिहास-लेखन की नहीं, भावुक टिप्पणी की भाषा है, इसलिए उत्तर में संयत शब्द चुनिए।)
  • बाहरी आक्रमण: इस कमजोरी का लाभ उठाकर नादिरशाह (1739) और बाद में अहमदशाह अब्दाली ने उत्तर भारत और दिल्ली पर आक्रमण किए और दिल्ली को लूटा। अकबर-शाहजहाँ के समय की वह चमक नहीं बची।
  • छोटे-छोटे राज्यों का उदय: मुगल शक्ति के ढीली पड़ते ही भारत फिर छोटे-छोटे दरबारों में बँट गया। अवध, हैदराबाद, बंगाल, मराठा, सिख और राजपूताना की रियासतें अपने-अपने स्तर पर स्वतंत्र शक्ति बन गईं।
  • अंग्रेजों का प्रवेश: इसी राजनीतिक खालीपन में ईस्ट इंडिया कंपनी (East India Company) ने पहले बंगाल में, फिर आगे उत्तर भारत में अपना प्रभाव जमाया। 1757 का प्लासी का युद्ध (Battle of Plassey) इसी काल की घटना है।

तो ध्यान दीजिए: कोई बड़ा राष्ट्रीय संघर्ष हिंदी-क्षेत्र के कवियों के सामने नहीं था। छोटे राजा अपनी छोटी रियासतों में अपनी शान बनाए रखने में लगे थे, और कवि का काम अब ज्यादातर जनता को जगाना नहीं, आश्रयदाता को प्रसन्न करना हो गया था। (अपवाद आगे वीरकाव्य में मिलेंगे।)

सामाजिक-सांस्कृतिक-आर्थिक परिवेश | Social-Cultural-Economic Context

जब राजनीति बिखरती है तो असर समाज और संस्कृति पर सीधा पड़ता है। रीतिकाल का समाज वैभव और विलास में डूबा हुआ समाज था।

1. सामाजिक स्थिति: सामंती विलास

समाज में दो वर्ग साफ दिखते थे। एक छोटा-सा सामंत वर्ग (Feudal Class), जो ऐशो-आराम में डूबा था, और दूसरा बड़ा आम किसान-मजदूर वर्ग, जिसकी हालत कमजोर थी। राजदरबारों में नैतिकता की जगह भोग-विलास (Luxury) ने ले ली थी।

  • नारी को सम्मान की दृष्टि से कम और विलास की वस्तु (Object of Pleasure) के रूप में ज्यादा देखा जाने लगा। नायिका-भेद में नारी के अंगों का इतना सूक्ष्म वर्णन इसी मानसिकता से जुड़ा माना जाता है। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी ने भी रीतिकालीन शृंगार की आलोचना करते हुए कहा है कि इसमें जीवन की संतुलित दृष्टि का अभाव है और नारी व्यक्ति नहीं, भोग का उपकरण बनकर रह गई।
  • जाति-व्यवस्था पहले जैसी कठोर बनी रही, पर भक्तिकाल जैसा सुधार का जोश ठंडा पड़ चुका था।

2. आर्थिक स्थिति: दिखावे की समृद्धि

ऊपर से देखने पर रियासतें समृद्ध लगती थीं, राजाओं के पास हीरे-जवाहरात भी थे। पर यह समृद्धि आम जनता तक नहीं पहुँचती थी। जमींदारी प्रथा (Zamindari System) और भारी लगान किसानों पर बोझ थे। राजा का धन कला, नाच-गाने और कवि-सम्मानों पर खर्च होता था, प्रजा के विकास पर कम।

3. सांस्कृतिक स्थिति: कला की बारीकी, पर प्राण कम

यह विरोधाभास का समय था। एक तरफ नैतिक शिथिलता थी, दूसरी तरफ कला बहुत बारीक रूप में निखर रही थी।

  • ताजमहल जैसे विशाल निर्माण का दौर बीत चुका था, पर छोटे महलों और हवेलियों में नक्काशी और सजावट बहुत सूक्ष्म हो गई थी।
  • लोगों में भाग्यवाद और अंधविश्वास का असर बढ़ा। ज्योतिष और शकुन-अपशकुन पर काफी भरोसा किया जाता था।

सार यह कि यह “दीपक बुझने से पहले ज्यादा भड़कता है” वाला समय था: बाहर चमक-दमक, भीतर खोखलापन।

साहित्य एवं संगीत आदि कलाओं की स्थिति | State of Sahitya, Music and Other Arts

इसी दरबारी माहौल ने साहित्य और दूसरी कलाओं का रूप तय किया। कला अब जनता की कम, राजा की रुचि की ज्यादा हो गई।

1. साहित्य की स्थिति

साहित्य मूलतः दरबारी (Court Literature) हो गया। कवि अब भक्त कम, राजाश्रित कवि ज्यादा था।

  • लक्षण-ग्रंथों (Lakshan Granth) की परंपरा: कवियों ने कविता के नियमों पर ग्रंथ लिखे। संस्कृत काव्यशास्त्र (Poetics) को हिंदी में उतारा गया। केशवदास, चिंतामणि, मतिराम, भूषण, देव, भिखारीदास जैसे कवियों ने अलंकार, रस और नायिका-भेद पर ग्रंथ रचे।
  • ब्रजभाषा (Brajbhasha) का वर्चस्व: उत्तर भारत की प्रमुख काव्य-भाषा ब्रजभाषा बन गई। अवधी और अन्य बोलियाँ काव्य-जगत में पीछे चली गईं।
  • शृंगार रस की प्रधानता: भक्ति और वीर रस भी थे, पर मुख्य रस शृंगार (Shringar) था, और उसमें भी ज्यादातर संयोग-शृंगार। राधा-कृष्ण कई जगह भक्ति के प्रतीक न रहकर साधारण नायक-नायिका जैसे बरते गए।

2. संगीत और नृत्य की स्थिति

  • संगीत में ध्रुपद (Dhrupad) के बाद ख्याल (Khayal), ठुमरी (Thumri) और टप्पा जैसी शैलियाँ लोकप्रिय हुईं। दरबारों में संगीतकारों को सम्मान मिलता था।
  • नृत्य में कथक (Kathak) को राजदरबारों का संरक्षण मिला। अवध के नवाबों के दरबार का कथक के विकास में विशेष योगदान माना जाता है, यद्यपि लखनऊ घराने का शिखर-काल इस संवत-सीमा के बाद का है।

(टिप्पणी: संगीत-नृत्य वाले बिंदु पाठ्यक्रम में “अन्य कलाओं” के अंतर्गत आते हैं। इनके सटीक कालक्रम पर मैंने हिंदी-साहित्य के मानक इतिहासों में विस्तृत पुष्टि नहीं पाई, इसलिए भाषा संयत रखी है। उत्तर में इन्हें एक-दो पंक्तियों में, मुख्य बात के रूप में लिखना काफी है।)

3. चित्रकला की स्थिति

चित्रकला में राजस्थानी और पहाड़ी लघु-चित्रशैली (Miniature Painting) का उल्लेखनीय विकास हुआ। कांगड़ा और बसोहली शैलियों में राधा-कृष्ण की प्रेम-लीलाएँ और नायिका-भेद बार-बार चित्रित हुए। कविता और चित्रकला का विषय लगभग एक ही था: शृंगार।

तो आप देख रहे हैं, रीतिकाल में कला बारीक तो बहुत हुई, पर उसका उद्देश्य बहुत हद तक मनोरंजन और विलास तक सिमट गया।


काव्य-प्रवृत्तियाँ | Kavya-Pravrittiyan

रीतिकालीन कविता की धाराओं को समझने से पहले यह जान लीजिए कि वर्गीकरण खुद एक बहस रहा है।

आलोचकवर्गीकरण
आचार्य शुक्लरीति-ग्रंथकार कवि और अन्य कवि (रीति-ग्रंथकारों का आगे कोई उपविभाजन नहीं)
विश्वनाथ प्रसाद मिश्ररीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त (आज का सर्वाधिक प्रचलित त्रिविध वर्गीकरण)
डॉ. नगेंद्रआचार्य कवि (लक्षण-ग्रंथकार) आदि; बिना लक्षण-ग्रंथ लिखे भी रीति से बँधे कवियों को वे रीतिबद्ध में गिनते हैं

आपके पाठ्यक्रम में इन धाराओं का क्रम है: रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त, वीरकाव्य, भक्तिकाव्य, नीतिकाव्य। हम वही क्रम रखेंगे।

रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध, रीतिमुक्त, वीर, भक्ति और नीति काव्य का माइंड-मैप
रीतिकाल की छह प्रमुख धाराएँ

रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध काव्य | Ritibaddh and Ritisiddh Kavya

रीतिकाल का सबसे बड़ा हिस्सा इसी प्रवृत्ति का है। इन्हें समझने के लिए एक बात याद रखिए: रीति का मतलब है काव्य-शास्त्र के नियम (Poetics)।

रीतिबद्ध काव्य (Ritibaddh Kavya) का अर्थ है: जो कवि काव्य-रीति में बँधकर रचना करें। ये पहले लक्षण (परिभाषा) देते थे, फिर उसका उदाहरण अपनी कविता में रचते थे। इन्हें आचार्य कवि (Acharya Kavi) भी कहा जाता है। इनका उद्देश्य कविता करने के साथ-साथ काव्य-शास्त्र समझाना और अपना पांडित्य दिखाना भी था। रीतिबद्धता का भाव कवियों के अपने कथन में भी झलकता है। चिंतामणि लिखते हैं कि बुद्धिमान लोग काव्य की रीति का वर्णन अपने-अपने अनुसार करते हैं (“रीति सुभाषा कवित की वरनत बुध अनुसार”)।

  • प्रमुख कवि और ग्रंथ: नीचे की तालिका देखिए।
  • विशेषता: इनके ग्रंथों में अलंकार (Alankar), रस (Ras), नायिका-भेद (Nayika Bhed) की परिभाषा और उदाहरण दोनों मिलते हैं। कला-पक्ष बहुत मजबूत है, पर कई जगह भाव-पक्ष दब जाता है।
कविप्रमुख ग्रंथविशेष
केशवदासरसिकप्रिया (1591), कविप्रिया (1601), रामचंद्रिकारसिकप्रिया को हिंदी में रस-विवेचन का पहला लक्षण-ग्रंथ माना जाता है; कविप्रिया अलंकार-निरूपण का ग्रंथ
चिंतामणिकविकुलकल्पतरु, रसविलास, छंदविचार पिंगलशुक्ल की दृष्टि में रीति-ग्रंथों की अखंड परंपरा के प्रवर्तक
महाराजा जसवंत सिंहभाषाभूषणअलंकार-निरूपक आचार्य कवि
मतिरामललित ललाम, रसराजचिंतामणि के भाई
भूषणशिवराज भूषणअलंकार-ग्रंथ, पर पहचान वीर रस से
देवभावविलास, रसविलास, अष्टयामबिहारी के बाद सर्वाधिक चर्चित; “बिहारी-देव” तुलनात्मक विवाद
कुलपति मिश्ररस रहस्यपिंगल-परंपरा के आचार्य के रूप में ख्यात
भिखारीदासकाव्य निर्णयकाव्यशास्त्रीय ज्ञान और कवित्व का अपेक्षाकृत संतुलन
पद्माकरजगद्विनोद, पद्माभरणरस-अलंकार निरूपण; वीरकाव्य व भक्ति-रचनाएँ भी

रीतिबद्ध काव्य की सामान्य प्रवृत्तियाँ (संक्षेप में):

  1. शास्त्रीयता का आधार: संस्कृत काव्यशास्त्र की परंपरा पर टिकी रचना।
  2. आचार्यत्व और पांडित्य-प्रदर्शन: आश्रयदाता को प्रभावित करने और विद्वत्ता दिखाने की प्रवृत्ति। केशव की रसिकप्रिया और कविप्रिया का संबंध ओरछा की राजनर्तकी प्रवीणराय को काव्य-शिक्षा देने से बताया जाता है।
  3. शृंगार की प्रधानता और नारी-सौंदर्य का चित्रण: नारी इन कविताओं के केंद्र में है, पर अधिकतर बाह्य, विलासपरक रूप में।
  4. प्रकृति का उद्दीपन रूप: प्रकृति स्वतंत्र विषय नहीं, नायक-नायिका के भाव जगाने का उपादान है।
  5. अलंकारों का आकर्षण और कई जगह शब्द-चमत्कार।
  6. राजाश्रित प्रतिस्पर्धा: दरबारों में समस्यापूर्ति जैसी काव्य-प्रतियोगिताओं का चलन।
  7. मुक्तक शैली: कवित्त, सवैया और दोहे जैसे छोटे छंद।
  8. ब्रजभाषा का लालित्य।

आलोचना का एक बिंदु भी जोड़ लीजिए, परीक्षक इसे पसंद करते हैं: शुक्ल ने लिखा है कि हिंदी में लक्षण-ग्रंथ लिखने वाले अधिकांश कवि सच्चे अर्थ में आचार्य नहीं थे। वे कवि थे, और उनके लक्षण अपर्याप्त थे। संस्कृत में आचार्य और कवि अलग-अलग होते थे, हिंदी में दोनों एक ही व्यक्ति बन गए, और इसका लाभ दोनों में से किसी को पूरा नहीं मिला।

रीतिसिद्ध काव्य (Ritisiddh Kavya) थोड़ा अलग है। ये कवि रीति के नियम भली-भाँति जानते थे, पर उन्होंने लक्षण-ग्रंथ नहीं लिखे। उन्होंने सीधे कविता लिखी, और वह कविता रीति के साँचे में पूरी तरह फिट बैठती है।

  • सबसे बड़ा नाम बिहारी (Bihari) का है। उनकी बिहारी सतसई (Bihari Satsai) को रीतिसिद्ध काव्य का सर्वश्रेष्ठ उदाहरण माना जाता है। सतसई में लगभग सात सौ दोहे हैं (संस्करणों के अनुसार संख्या में थोड़ा अंतर मिलता है, जैसे 719)। बिहारी ने दोहे जैसे छोटे छंद में अलंकार, रस, नायिका-भेद सब साध दिया, बिना कोई लक्षण-ग्रंथ लिखे। पाठ्यपुस्तकों में प्रचलित परंपरा के अनुसार वे आमेर के राजा जयसिंह के आश्रित थे।
  • बिहारी की प्रशंसा में एक लोक-प्रचलित उक्ति बहुत उद्धृत की जाती है। भावार्थ यह है कि सतसई के दोहे नावक (एक छोटे तीर) जैसे हैं: देखने में छोटे, पर घाव गहरा करने वाले। (ध्यान दें: यह उक्ति पाठ्यपुस्तकों और परीक्षा-प्रश्नों में खूब आती है, पर इसके रचयिता का नाम मुझे किसी विश्वसनीय स्रोत में स्पष्ट रूप से नहीं मिला, इसलिए इसे “प्रचलित उक्ति” ही लिखें, किसी कवि के नाम से नहीं।)
  • सेनापति को कुछ सूचियों में रीतिसिद्ध गिना जाता है, जबकि कुछ विद्वान उन्हें रीतिबद्ध कवियों में रखते हैं। यह विभाजन विवादित है, इसलिए उत्तर में “कुछ विद्वानों के अनुसार” लिखना सुरक्षित रहता है।
  • एक और विवाद: डॉ. नगेंद्र जिन कवियों को मिश्र जी की तरह “रीतिसिद्ध” नहीं कहते, उन्हें रीतिबद्ध में गिनते हैं, क्योंकि बिना लक्षण-ग्रंथ लिखे भी वे रीति से पूरी तरह बँधे हुए हैं।

परीक्षा में पूछा जाता है कि दोनों में अंतर क्या है, तो याद रखिए:

आधाररीतिबद्धरीतिसिद्ध
रचना का स्वरूपलक्षण (परिभाषा) + उदाहरणकेवल उदाहरण, लक्षण मन में
लक्षण-ग्रंथलिखेनहीं लिखे
उपनामआचार्य कविरीति-निपुण कवि (शब्दावली विद्वानों में भिन्न)
प्रमुख नामकेशवदास, चिंतामणि, मतिराम, देव, भिखारीदासबिहारी (केंद्रीय नाम)
मुख्य रसशृंगारशृंगार
लक्षण-उदाहरण और केवल-उदाहरण के आधार पर दोनों धाराओं की तुलना
रीतिबद्ध बनाम रीतिसिद्ध एक नज़र में

Exam Point: “रीतिसिद्ध” वर्ग का सबसे सुरक्षित उदाहरण बिहारी हैं। दूसरे नाम लिखने हों तो “कुछ विद्वानों के अनुसार” जैसा वाक्यांश जोड़ें, क्योंकि सूचियाँ पुस्तक-दर-पुस्तक बदलती हैं।

रीतिमुक्त काव्य | Ritimukt Kavya

अब यह रीतिकाल की सबसे दिलचस्प धारा है। रीतिमुक्त (Ritimukt) का मतलब है: रीति के बंधन से मुक्त। इन्हें स्वच्छंद कवि (Free-Spirited Poets) भी कहते हैं। कह सकते हैं कि रीतिबद्ध कवि अधिकतर बुद्धि और कौशल से लिख रहे थे, तो रीतिमुक्त कवि हृदय की पुकार से।

  • प्रमुख कवि: घनानंद (Ghananand), बोधा (Bodha), ठाकुर (Thakur) और आलम (Alam); कुछ सूचियों में द्विजदेव का नाम भी आता है। घनानंद इस धारा के शिखर माने जाते हैं और उन्हें “प्रेम की पीर” का कवि कहा जाता है।
  • जीवन से जुड़ी परंपरागत मान्यता: परंपरा के अनुसार घनानंद का प्रेम “सुजान” नामक दरबारी नर्तकी से था, बोधा का “सुभान” से, और आलम का शेख नाम की रंगरेजिन से। इन कथाओं की ऐतिहासिक पुष्टि के प्रश्न पर विद्वानों में पूरी एकमतता नहीं है, इसलिए इन्हें “परंपरा के अनुसार” कहकर लिखिए। इतना निश्चित है कि इनके काव्य में प्रेम दरबारी औपचारिकता नहीं, व्यक्तिगत और पीड़ादायक अनुभव के रूप में आता है।
  • घनानंद की प्रमुख रचनाएँ: सुजानहित (सुजान सागर), विरहलीला, वियोगबेली, कृष्ण कौमुदी, इश्कलता आदि।

प्रवृत्तियाँ

  • व्यक्तिगत प्रेम की पीड़ा और वियोग: यहाँ नायिका-भेद का खेल नहीं है, कवि स्वयं प्रेमी है। शुक्ल ने घनानंद को वियोग-शृंगार का प्रधान मुक्तक कवि कहा है।
  • लाक्षणिकता और भावों की गहराई: भाषा में लक्षण-ग्रंथों की जटिलता कम, लाक्षणिकता, मुहावरेदार प्रयोग और अनुभूति की सघनता ज्यादा है।
  • भक्ति का पुट: लौकिक प्रेम में पीड़ा के बाद कई कवि कृष्ण-भक्ति की ओर मुड़ते दिखते हैं (घनानंद का वृंदावन-प्रवास और कृष्ण-भक्ति इसका उदाहरण माना जाता है), और वहाँ भी प्रेम का ही स्वर बना रहता है।
  • मुक्तक शैली: कवित्त-सवैया जैसे मुक्तकों में एक-एक छंद अपने-आप में पूरी भाव-कथा कह देता है।

अब घनानंद की एक प्रसिद्ध पंक्ति देखिए, जो इस पूरी धारा का सार लगती है:

मूल पाठकठिन शब्दार्थभावार्थविशेष
अति सूधो सनेह को मारग है, जहाँ नेकु सयानप बाँक नहीं। (घनानंद, सवैया की आरंभिक पंक्तियाँ)सूधो = सीधा; सनेह = प्रेम; मारग = मार्ग; नेकु = ज़रा-सा; सयानप = चतुराई; बाँक = टेढ़ापनप्रेम का मार्ग बिल्कुल सीधा है, उसमें चतुराई और टेढ़ेपन के लिए जरा भी जगह नहीं।रीतिबद्ध कवियों के कलात्मक चमत्कार के सामने यहाँ सहज, निश्छल प्रेम की घोषणा है। भाषा सरल, भाव गहरा।

Exam Point: आचार्य शुक्ल की घनानंद पर टिप्पणी (वियोग-शृंगार के प्रधान मुक्तक कवि) और ऊपर की पंक्ति, ये दो चीजें उत्तर में लिख दें तो रीतिमुक्त धारा का प्रतिनिधित्व पूरा हो जाता है।

वीरकाव्य | Veer Kavya

यह सोचना गलत है कि रीतिकाल में सिर्फ शृंगार लिखा गया। इस काल में भी वीरकाव्य की एक सशक्त धारा बह रही थी, क्योंकि मुगल सत्ता से टकराने वाले नए नायक उभर रहे थे। इस धारा के कवियों ने शिवाजी और छत्रसाल जैसे समकालीन नायकों को अपना चरित-नायक बनाया।

  • प्रमुख कवि और रचनाएँ:
कविनायक / आश्रयदाताप्रमुख रचना
भूषणशिवाजी, छत्रसालशिवराज भूषण, शिवा बावनी, छत्रसाल दशक
लाल कविछत्रसाल बुंदेलाछत्रप्रकाश
सूदनसूरजमल जाटसुजान चरित
पद्माकरहिम्मत बहादुर (गोसाईं)हिम्मत बहादुर विरुदावली
  • भूषण को रीतिबद्ध कवियों में वीर रस का प्रमुख और सबसे लोकप्रिय कवि माना गया है। उनके लिए प्रचलित “वीर रस का एकमात्र कवि” वाली बात को शब्दशः न लिखें; “वीर रस के सर्वप्रमुख और लोकप्रिय कवि” लिखना अधिक सटीक है। यह भी याद रखें कि शिवराज भूषण एक अलंकार-ग्रंथ है, यानी भूषण रीतिबद्ध भी हैं और वीरकाव्य के कवि भी। कहा जाता है कि “भूषण” उन्हें मिली उपाधि थी और असली नाम घनश्याम (त्रिपाठी) माना जाता है।

प्रवृत्तियाँ

  • समकालीन इतिहास पर आधारित वर्णन: आश्रयदाता और युद्धों का चित्रण समय के वास्तविक नायकों और घटनाओं पर टिका है, इसलिए इनका ऐतिहासिक मूल्य अधिक है। (यह कहना कि रासो-काव्य बिल्कुल काल्पनिक थे, ठीक नहीं; रासो की प्रामाणिकता एक अलग और अब भी चलती बहस है, जिसे आदिकाल की यूनिट में पढ़ा जाता है।)
  • राष्ट्रीय/जातीय चेतना का स्वर: भूषण की रचनाओं में शिवाजी को धर्म और स्वाभिमान के रक्षक के रूप में उभारा गया है। आलोचकों में इस पर मतभेद है कि इसे “राष्ट्रीय चेतना” कहा जाए या मुख्यतः हिंदू-जातीय स्वाभिमान। उत्तर में दोनों दृष्टियाँ संक्षेप में लिख देना अच्छा रहता है।
  • शृंगार के बीच वीर रस और ओज: युग शृंगार का था, फिर भी इन कवियों ने ओज गुण (Oj Gun) और वीर रस को जीवित रखा।
  • आश्रयदाता की प्रशंसा फिर भी है: यह भी दरबारी परंपरा से अलग नहीं, पर प्रशंसा का आधार यहाँ विलास नहीं, वीरता है।

तो वीरकाव्य रीतिकाल की वह धारा है जो याद दिलाती है कि तलवारें पूरी तरह म्यान में नहीं गई थीं।

भक्तिकाव्य | Bhakti Kavya

रीतिकाल में भक्ति समाप्त नहीं हुई थी, वह नए रूप में चल रही थी। यह जान लीजिए कि इस समय की भक्ति में सूर-तुलसी जैसी तड़प और आंदोलन-जैसी ऊर्जा कम है, और वह अधिकतर परंपरा-निर्वाह (Traditional) और संप्रदाय-केंद्रित है।

  • प्रमुख कवि: नागरीदास (किशनगढ़ के सावंत सिंह), चाचा हितवृंदावनदास, गुरु गोविंद सिंह आदि। कई रीतिबद्ध कवियों ने भी भक्ति की रचनाएँ कीं। उदाहरण के लिए पद्माकर की गंगालहरी, और कई रीतिकालीन कवि अपने ग्रंथों के अंत में या अलग से कृष्ण-विषयक रचनाएँ देते हैं।
  • गुरु गोविंद सिंह की रचनाओं में चंडी चरित्र का उल्लेख प्रायः मिलता है। कुछ इतिहासों में गोविंद रामायण का भी नाम आता है। ये रचनाएँ दशम ग्रंथ की परंपरा से जुड़ी हैं और दशम ग्रंथ की रचनाओं के कर्तृत्व पर सिख विद्वत्ता में चर्चा रही है, इसलिए परीक्षा में इन्हें “गुरु गोविंद सिंह के नाम से प्रसिद्ध” या “उनसे संबद्ध” कहना ज्यादा सुरक्षित है।

प्रवृत्तियाँ

  • राधा-कृष्ण ही मुख्य आराध्य: अधिकतर भक्त कवि कृष्ण-भक्त हैं। शृंगार का पुट यहाँ भी है, पर भक्ति के आवरण में।
  • ब्रजभाषा में भक्ति: भाषा वही ब्रजभाषा है, पर रीतिबद्ध कवियों की तरह सजी-सँवरी।
  • सांप्रदायिकता: कई कवि किसी न किसी संप्रदाय से जुड़े थे (जैसे राधावल्लभ या निम्बार्क संप्रदाय), इसलिए भक्ति पर संप्रदाय की छाप साफ दिखती है।
  • संयमित भाव-भूमि: भक्तिकाल की सहज आत्मसमर्पण-वाली भावुकता की जगह यहाँ कला, भाषा-सज्जा और परंपरा का निर्वाह ज्यादा है।

यह धारा बताती है कि भक्तिकाल की जड़ें इतनी गहरी थीं कि शृंगार के सबसे घने दौर में भी वे पूरी तरह सूखी नहीं।

नीतिकाव्य | Niti Kavya

रीतिकाल का दरबार सिर्फ प्रेम और वीरता का नहीं, व्यवहार-कुशलता का भी दरबार था। राजा को सलाह देने और आम आदमी को जीवन का व्यवहार सिखाने के लिए नीति-काव्य लिखा गया। नीतिकाव्य (Niti Kavya) का अर्थ है: जीवन के व्यवहार, नैतिकता और लोक-व्यवहार की शिक्षा देने वाला काव्य।

  • प्रमुख कवि: वृंद (वृंद सतसई), गिरधर कविराय (कुंडलियाँ), रहीम (रहीम दोहावली); इनके साथ लोक-नीतिकार घाघ और भड्डरी (कृषि और मौसम-संबंधी कहावती नीति)। बिहारी के भी कई दोहे नीति-परक हैं।
  • रहीम के बारे में सावधानी: रहीम (1556-1627) अकबर-काल के दरबारी थे, यानी कालक्रम में वे शुक्ल की रीतिकाल-सीमा (1643 ई. से) से पहले आते हैं। नीति-काव्य की परंपरा के प्रसंग में उनका नाम अक्सर साथ लिया जाता है, पर उन्हें रीतिकाल का कवि कहना एक विवादित/सुविधा-आधारित वर्गीकरण है। पाठ्यक्रम में नीतिकाव्य के उदाहरण के रूप में मुख्यतः वृंद और गिरधर का नाम है, इसलिए परीक्षा में इन्हीं को आगे रखिए और रहीम का उल्लेख टिप्पणी के साथ कीजिए।

प्रवृत्तियाँ

  • अनुभव-जन्य ज्ञान: यह किताबी उपदेश नहीं, जीवन-अनुभव से निकली बातें हैं। जैसे रहीम की प्रसिद्ध पंक्ति है “रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय”, यानी प्रेम के नाजुक धागे को झटके से मत तोड़ो।
  • मुक्तक शैली, दोहा और कुंडलिया: कम शब्दों में बड़ी बात कहने के लिए ये छंद सबसे उपयुक्त हैं।
  • सरल, मुहावरेदार भाषा: भाषा ब्रजभाषा-आधारित है, पर बोलचाल के करीब, कहीं-कहीं अन्य बोलियों के प्रभाव के साथ (घाघ-भड्डरी की भाषा में लोक-बोलियों की छाप साफ मिलती है)।
  • सर्वकालिकता: नीति की बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक लगती हैं, इसी कारण गिरधर की कुंडलियाँ और वृंद के दोहे लोक-स्मृति में बने रहे।

नीतिकाव्य रीतिकाल का वह संतुलन है जो शृंगार और विलास के बीच आम आदमी को जीना सिखाता है।

रीतिकाल की प्रवृत्तियों का तुलनात्मक अध्ययन | Comparative Study of Ritikal Pravrittiyan

अब छहों धाराओं को एक साथ रखकर तुलना करते हैं। 10 अंक का प्रश्न यहीं से बनता है।

आधाररीतिबद्धरीतिसिद्धरीतिमुक्तवीरकाव्यभक्तिकाव्यनीतिकाव्य
मुख्य उद्देश्यकाव्यशास्त्र का निरूपण, दरबार को प्रभावित करनारीति के अनुरूप कलात्मक रचनाव्यक्तिगत प्रेम की अभिव्यक्तिसमकालीन नायकों की वीरता का वर्णनईश्वर-भक्ति, परंपरा का निर्वाहलोक-व्यवहार की शिक्षा
प्रमुख रसशृंगार (प्रायः संयोग)शृंगार (संयोग-वियोग)शृंगार (वियोग-प्रधान)वीरशांत, भक्ति (शृंगार का पुट)शांत
नायक / विषयपरंपरागत नायक-नायिका, राधा-कृष्ण, आश्रयदातानायक-नायिका, राधा-कृष्णकवि स्वयं (प्रेमी)शिवाजी, छत्रसाल, सूरजमल आदिराधा-कृष्ण, देवी-देवतासामान्य जन
भाषा-शैलीसजी-सँवरी, अलंकार-बहुल ब्रजभाषाकसी हुई, सूक्ति-जैसी ब्रजभाषाभाव-प्रधान, लाक्षणिक ब्रजभाषाओज-गुण वाली ब्रजभाषासरल से अलंकृत ब्रजभाषासरल, मुहावरेदार दोहा-कुंडलिया
प्रमुख कविकेशव, चिंतामणि, मतिराम, देव, भिखारीदासबिहारीघनानंद, बोधा, ठाकुर, आलमभूषण, लाल कवि, सूदननागरीदास, चाचा हितवृंदावनदासवृंद, गिरधर कविराय

इस तालिका से साफ है कि रीतिकाल केवल शृंगार का काल नहीं है। यह मुख्यतः शृंगार-प्रधान है, पर उसके भीतर वीर, भक्ति, नीति और स्वच्छंद प्रेम की धाराएँ भी साथ-साथ बह रही थीं। यही विविधता उसे एकांगी होने से बचाती है, भले ही अधिकांश रचना दरबारी परिवेश से बँधी रही।


रीतिकाल का साहित्यिक महत्व | Literary Significance of Ritikal

हिंदी साहित्य के इतिहास में रीतिकाल का स्थान | Place of Ritikal in Hindi Sahitya ka Itihas

रीतिकाल को अक्सर छात्र यह कहकर खारिज कर देते हैं कि यह तो सिर्फ नायिका-भेद और शृंगार का काल है। परीक्षा में अगर आपने यही लिखा तो आधे अंक ही मिलेंगे। साहित्य के इतिहास में रीतिकाल का स्थान बहुत महत्वपूर्ण है।

पहली बात: काव्य-कला और काव्यशास्त्र का व्यवस्थित अध्ययन। भक्तिकाल में कविता का उद्देश्य मुख्यतः भक्ति या सुधार था, आदिकाल में प्रशस्ति, युद्ध या धर्म-साधना। रीतिकाल में कवियों ने पहली बार इतने बड़े पैमाने पर कविता की कला और उसके शास्त्र पर ध्यान दिया। कुछ आलोचक इसे “कला के लिए कला” की प्रवृत्ति कहते हैं। यह कथन एक आलोचकीय मत है, निर्विवाद तथ्य नहीं, क्योंकि कवि दरबारी अपेक्षाओं से भी बँधे थे। केशवदास, चिंतामणि, भिखारीदास जैसे आचार्य कवियों ने संस्कृत काव्यशास्त्र की रस, अलंकार और नायिका-भेद की परंपरा को हिंदी में स्थापित करने का प्रयत्न किया। ध्यान रखिए, शुक्ल की राय में इनका सैद्धांतिक योगदान मौलिक चिंतन की दृष्टि से सीमित था, पर परंपरा-निर्माण की दृष्टि से इसे हिंदी काव्यशास्त्र की नींव कहा जा सकता है। इस संतुलित बात को उत्तर में लिखेंगे तो प्रभाव अच्छा पड़ेगा।

दूसरी बात: ब्रजभाषा का चरम परिष्कार। भक्तिकाल में ब्रजभाषा मधुर थी, पर रीतिकाल में वह सबसे सधी हुई, अलंकृत काव्य-भाषा के रूप में परिपक्व हुई। देव, मतिराम, पद्माकर जैसे कवियों में ब्रजभाषा का माधुर्य और अर्थ-गांभीर्य साफ दिखता है, और बिहारी के दोहे कम शब्दों में अधिक कहने की कला का नमूना हैं। उनके लिए प्रचलित वह उक्ति (नावक के तीर वाली) इसी बात की ओर संकेत करती है। मुहावरों और लोकोक्तियों के प्रयोग ने भी इस भाषा को संप्रेषणीय बनाया।

तीसरी बात: साहित्य का संरक्षण। यह राजनीतिक पतन का काल था। मुगल कमजोर पड़ रहे थे, अंग्रेज आ रहे थे। ऐसे समय में छोटे-छोटे राजदरबारों ने कवियों को आश्रय दिया, जिससे काव्य-रचना की परंपरा निरंतर बनी रही, भले ही उसके उद्देश्य में विलास भी शामिल था।

हाँ, सीमाएँ भी थीं: सामाजिक चेतना की कमी, नारी का विलास-वस्तु के रूप में चित्रण, दरबारीपन, पांडित्य-प्रदर्शन और कई जगह भाव पर शिल्प का हावी हो जाना। इसीलिए आचार्य शुक्ल और हजारीप्रसाद द्विवेदी जैसे आलोचकों ने इसकी तीखी आलोचना की। फिर भी आज के आलोचक इसे केवल निंदा से नहीं, ऐतिहासिक परिस्थितियों के संदर्भ में समझने पर जोर देते हैं।

संक्षेप में, भक्तिकाल ने हिंदी कविता को भाव और आस्था की ऊँचाई दी, तो रीतिकाल ने उसके शिल्प, भाषा और काव्यशास्त्र को सँवारा। इस अर्थ में इसे भक्तिकाल और आधुनिक काल के बीच की एक कड़ी (Bridge) कहा जा सकता है।

उत्तर कैसे लिखें: (1) एक पंक्ति में काल-सीमा और नामकरण, (2) तीन उपलब्धियाँ: काव्यशास्त्र, ब्रजभाषा, संरक्षण, (3) दो सीमाएँ, (4) एक निष्कर्ष-वाक्य। इतना ढाँचा 10 अंक के उत्तर के लिए पर्याप्त है।


निष्कर्ष | Conclusion

रीतिकाल को समझने की कुंजी यह है कि इसे केवल एक लेबल (“शृंगार काल”) में बंद न किया जाए। इसकी पृष्ठभूमि में मुगल सत्ता का पतन, छोटे दरबारों का उदय और अंग्रेजी प्रभाव का प्रवेश है। उसी पृष्ठभूमि ने कवि को आश्रयदाता का कवि बनाया, काव्यशास्त्र को हिंदी में उतारा और शृंगार को मुख्य रस बनाया। फिर भी घनानंद का स्वच्छंद प्रेम, भूषण का वीर स्वर, भक्ति की धीमी लौ और वृंद-गिरधर की नीति यह दिखाते हैं कि यह काल अपने भीतर कई स्वरों को समेटे हुए था। परीक्षा में आपका काम इन धाराओं को नाम, कवि, रचना और विशेषता के साथ एक सूत्र में रखना है।

रीतिकाल की धाराओं के प्रमुख कवियों और ग्रंथों का सारांश चित्र
रीतिकाल के प्रमुख कवि और ग्रंथ

Quick Summary

  • Background: Ritikal (c. 1643-1843 CE; Shukla’s Vikram Samvat 1700-1900) emerged during Mughal decline and the rise of regional courts and early British power. Politically fragmented and socially marked by feudal luxury, display of wealth and decline of moral values, it was economically burdensome for common people. Literature became fully court-centric, dominated by Lakshan Granths, Shringar Rasa and Brajbhasha, while music (Khayal, Thumri), Kathak dance and Rajasthani-Pahari miniature painting also reached high artistic refinement despite limited social purpose.
  • Tendencies: Ritikal’s poetry is not only Shringar but has multiple streams. Ritibaddh poets like Keshavdas and Ritisiddh like Bihari wrote with Shringar at the core; Ritimukt poets like Ghananand expressed personal, painful love freely. Alongside them, Veer Kavya by Bhushan and Lal Kavi praised contemporary heroes like Shivaji and Chhatrasal, Bhakti Kavya continued the devotional tradition in a sectarian, traditional form, and Niti Kavya by Vrind and Girdhar Kaviray (with Rahim often discussed alongside) gave practical life-wisdom in Doha and Kundaliya forms.
  • Significance: Ritikal is often seen as decadent but holds key importance for systematizing Hindi poetics, bringing Brajbhasha to its peak refinement, and preserving literary tradition during political decline. It acts as a bridge between Bhaktikal and the modern period, despite its limitations of courtliness and excessive Shringar.

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यह यूनिट पूरे DSC-2 का एक हिस्सा है। पहले और बाद के संदर्भ के लिए ये पन्ने काम आएँगे:


University of Delhi Previous Year Questions | DU प्रश्न-अभ्यास

DU Previous Year Questions – Unit 4: रीतिकाल

University of Delhi B.A. (Hons.) Hindi Sem 1 DSC-2 (Paper Code: 2052101102) के Official PYQs से। Source: Ramanujan College Library DU – Q.P. 5186

1 रीतिबद्ध धारा की साहित्यिक प्रवृत्तियों का उल्लेख कीजिए। [Q.P. 5186 – Q4 – 15 Marks] +
Answer Guide: प्रस्तावना – रीतिबद्ध का अर्थ लक्षण-ग्रंथ लिखने वाले आचार्य कवि। प्रमुख कवि: केशवदास, चिंतामणि, मतिराम, भूषण, देव। प्रवृत्तियाँ: 1) लक्षण-ग्रंथ परम्परा 2) श्रृंगार प्रधानता 3) आश्रयदाताओं की प्रशंसा 4) अलंकार-प्रियता 5) ब्रजभाषा का उत्कर्ष 6) चमत्कार प्रदर्शन। निष्कर्ष में आचार्यत्व की सीमाएं बताएं। Long Answer – 15 Marks – Most Repeated
2 रीतिकाल की सामान्य विशेषताओं पर प्रकाश डालिए। [Q.P. 5186 – Q4 OR – 15 Marks] +
Answer Guide: रीतिकाल (1700-1900 वि.) उत्तर-मध्यकाल है। सामान्य विशेषताएँ: 1) श्रृंगारिकता केंद्रीय भाव 2) दरबारी संस्कृति और आश्रयदाता-प्रवृत्ति 3) रीति-निरूपण और काव्यशास्त्रीय चिंतन 4) ब्रजभाषा की प्रधानता 5) वीर, नीति, भक्ति का मिश्रण 6) मुक्तक काव्य-रूप की प्रधानता। अंत में शुक्ल जी के मत से मूल्यांकन। Long Answer – 15 Marks – Q.P. 5186
3 रीतिमुक्त काव्य पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए। [Q.P. 5186 – Q5(घ) – 10 Marks] +
Answer Guide: रीतिमुक्त = रीति के बंधन से मुक्त स्वच्छंद धारा। प्रमुख कवि: घनानंद, बोधा, ठाकुर, आलम। विशेषताएँ: 1) स्वानुभूति-प्रेरित प्रेम (सुजान) 2) वियोग की प्रधानता 3) लोक-हृदय की स्वच्छंदता 4) लाक्षणिक ब्रजभाषा। घनानंद का उदाहरण – “अति सूधो सनेह को मारग है…”। Short Note – 10 Marks – Official PYQ
4 रीतिबद्ध, रीतिसिद्ध और रीतिमुक्त – तीनों धाराओं का अंतर सोदाहरण स्पष्ट कीजिए। [Q.P. 3042 + 7574] +
Answer Guide: रीतिबद्ध = लक्षण-लक्ष्य दोनों (केशव, देव), रीतिसिद्ध = लक्षण नहीं पर रीति में सिद्ध (बिहारी), रीतिमुक्त = रीति से मुक्त (घनानंद)। तुलना तालिका बनाएं: उद्देश्य, प्रेम-दृष्टि, काव्यशास्त्र, भाषा। ये DU में सबसे ज्यादा repeated वर्गीकरण वाला प्रश्न है। Long Answer – Most Expected
5 रीतिकाल के नामकरण की सार्थकता पर विचार कीजिए। [DU Official Repository 6088 / 7574] +
Answer Guide: मिश्रबंधु – अलंकृत काल, शुक्ल – रीतिकाल, विश्वनाथ प्रसाद मिश्र – श्रृंगार काल। शुक्ल का तर्क – इस काल में ‘रीति’ ग्रंथ लिखने की प्रवृत्ति सबसे प्रमुख थी इसलिए ‘रीतिकाल’ नाम सबसे सार्थक है। अन्य नामों की सीमाएं भी बताएं। Long Answer
6 बिहारी की सतसई / घनानंद के स्वच्छंद प्रेम का विश्लेषण कीजिए। [DU Hons III Paper 7574 – Ritikaaleen Kavya] +
Answer Guide: बिहारी के लिए – गागर में सागर, श्रृंगार-नीति-भक्ति का संगम, दोहा की चमत्कृति, ब्रजभाषा। घनानंद के लिए – सुजान-प्रेम, विरह-वेदना, लाक्षणिकता, “लोग हैं लागि कवित्त बनावत…” से स्वच्छंदता सिद्ध करें। DSC-2 में ये 10 marks के short note के रूप में भी आ सकता है। Short Note / Analysis

सामान्य प्रश्न | FAQs

रीतिकाल की समय-सीमा क्या है, और इसे ईस्वी में कैसे लिखें?

आचार्य शुक्ल के अनुसार संवत 1700 से 1900। ईस्वी में इसे लगभग 1643 से 1843 लिखा जाता है। उत्तर में हमेशा “वि.सं.” या “संवत” जरूर लिखें।

इस काल को “रीतिकाल” ही क्यों कहा गया?

शुक्ल ने इस काल की मुख्य प्रवृत्ति रीति-निरूपण, यानी लक्षण-ग्रंथों की रचना को माना, इसलिए नाम रीतिकाल रखा। मिश्रबंधुओं ने इसे अलंकृत काल और विश्वनाथ प्रसाद मिश्र ने शृंगार काल कहा।

रीतिबद्ध और रीतिसिद्ध कवियों को कैसे पहचानें?

देखिए कि कवि ने लक्षण-ग्रंथ लिखा या नहीं। लिखा हो तो आम तौर पर रीतिबद्ध (केशव, चिंतामणि, देव), न लिखा हो पर रीति का पूरा पालन हो तो रीतिसिद्ध (मुख्यतः बिहारी)। कुछ नामों पर विद्वानों में मतभेद है, इसलिए वहाँ “कुछ विद्वानों के अनुसार” लिखें।

रीतिमुक्त कवि कौन-कौन हैं, और उनमें सबसे प्रमुख कौन?

घनानंद, बोधा, ठाकुर और आलम; घनानंद को शिखर माना जाता है और उन्हें “प्रेम की पीर” का कवि कहा जाता है।

क्या रीतिकाल में केवल शृंगार रस की कविता लिखी गई?

नहीं। शृंगार प्रधान है, पर वीर (भूषण, लाल, सूदन), भक्ति (नागरीदास आदि) और नीति (वृंद, गिरधर) की धाराएँ भी हैं। वीर और भक्ति रचनाओं में भी शृंगार का हल्का रंग कहीं-कहीं मिलता है।

भूषण को रीतिबद्ध कवि मानें या वीरकाव्य का कवि?

दोनों। शिवराज भूषण अलंकार-ग्रंथ है, इसलिए वे रीतिबद्ध परंपरा में आते हैं, जबकि उनकी पहचान शिवाजी और छत्रसाल पर रचे वीर काव्य से है। उत्तर में दोनों बातें एक वाक्य में लिख देना बेहतर है।

क्या रहीम रीतिकाल के कवि हैं?

कालक्रम में रहीम (1556-1627) अकबर-काल से जुड़े हैं, यानी शुक्ल की रीतिकाल-सीमा से पहले। नीति-काव्य की चर्चा में उनका नाम आता है, पर पाठ्यक्रम में वृंद और गिरधर आगे हैं, इसलिए रहीम का उल्लेख टिप्पणी के साथ करें।

10 अंक के उत्तर में इस यूनिट की कौन-सी चीजें जरूर होनी चाहिए?

काल-सीमा और नामकरण, पृष्ठभूमि के चार बिंदु (राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, सांस्कृतिक), छह धाराओं का नाम-कवि-ग्रंथ, एक तुलना-तालिका और दो सीमाएँ। साथ में 2-3 आलोचकों (शुक्ल, मिश्र, द्विवेदी) का नाम जोड़ दें तो उत्तर भारी लगता है।

References

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About the Author

Sawan Chauhan is the Political Science and History content lead at Delhi Pathshala. He completed his BA and MA in Hindi (Honours) from the University of Delhi and prepares study notes aligned with the DU BA (Hons.) syllabus.

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